राजनीति

तमिलनाडु चुनाव नतीजे बाद में आएंगे, सीट बंटवारे में द्रविड़ पार्टियों की बड़ी जीत

Metroheadlines मार्च 26, 2026 0

 

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए AIADMK और बीजेपी के बीच जो समझौता हुआ है, बीजेपी की कई मांगें नहीं मानी गई हैं. तमिलनाडु के दोनों गठबंधनों में एक बात कॉमन जरूर देखने को मिल रही है - डीएमके हो या AIADMK राष्ट्रीय दलों के साथ व्यवहार एक जैसा ही कर रहे हैं.

 

तमिलनाडु में AIADMK और बीजेपी के बीच सीटों का बंटवारा आखिरकार फाइनल हो गया. सीटों के बंटवारे में यह देखना भी दिलचस्प है कि बीजेपी को भी AIADMK नेता  ई. पलानीस्वामी ने चुनावी गठबंधन में लगभग उतनी ही सीटें दी हैं, जितनी डीएमके नेता एमके स्टालिन ने सत्ताधारी गठबंधन में कांग्रेस के लिए छोड़ी है.

 

मुद्दे की बात यह भी है कि बीजेपी को गठबंधन में पसंद की सीटों पर समझौता करना पड़ा है. क्योंकि, ई. पलानीस्वामी अपने रुख पर वैसे ही कायम रहे, जैसे चुनाव  जीतने पर सत्ता में हिस्सेदारी से पहले ही मना कर चुके हैं. बीजेपी ही नहीं, ई. पलानीस्वामी दूसरे सहयोगी दलों की मांगों के भी खिलाफ नजर आए, और गठबंधन में सहयोगियों को ऐसी सीटें दीं जो उनके लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण मानी जा रही हैं. 

 

बीजेपी को कोयंबटूर की भी सीट नहीं मिल पाई है, जिसमें ई. पलानीस्वामी  की बीजेपी नेता के. अन्नामलाई से पुरानी चिढ़ समझ में आ रही है. अन्नामलाई की राजनीति शुरू से ही आक्रामक रही है, और AIADMK नेतृत्व को यह बात बिल्कुल भी  बर्दाश्त नहीं हो पाती है - बेशक ई. पलानीस्वामी बीजेपी के साथ गठबंधन को अमली जामा पहना दिया है, लेकिन सब कुछ वैसा ही किया है जैसा वो चाहते थे.

 

तमिलनाडु में ऐसे हुआ सीटों का बंटवारा

 

24-25 मार्च को अंतिम रूप दिए गए समझौते के मुताबिक, गठबंधन में  AIADMK ने तमिलनाडु की 234 सीटों में से 169  सीटें अपने पास रखी हैं. एनडीए के सात सहयोगी दलों को सीटों के बंटवारे में 65 सीटें दी गई हैं, जिनमें बीजेपी के हिस्से में 27 सीटें आई हैं. गठबंधन में शामिल तमिलनाडु के बाकी राजनीतिक दलों में पट्टाली मक्कल काची (PMK) को 18 और अम्मा मक्कल मुनेत्र कझगम (AMMK) को 11 सीटें मिली हैं.  

 

तमिलनाडु के चुनावी  गठबंधन एक खास राजनीतिक पैटर्न की तरफ इशारा करता है. कोई भी गठबंधन वैसे भी मजबूरी का समझौता ही होता है. जिस पक्ष का दबदबा ज्यादा होता है, मनमानी खुलकर  करता है. यूपी और बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक ये सब देखने को मिलता रहा है. 

 

बीजेपी और AIADMK के बीच हुए गठबंधन पर प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की  की रिपोर्ट में बताया गया है कि दबाव कोई एकतरफा नहीं था. दबाव दिल्ली की तरफ से भी था, और क्षेत्रीय पार्टी AIADMK की तरफ से भी. बल्कि दोनों ने काफी मोलभाव किया. जो जहां भारी पड़ा अपनी बात मनवा ली. 

 

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में AIADMK के एक नेता का कहना है, यह ऐसा समझौता है, जहां गठबंधन जरूरी था. लेकिन, शर्तें नहीं छोड़ी गईं. AIADMK नेता ने बताया है, दिल्ली से एक सीनियर नेता के लिए कोयंबटूर की सीट को लेकर विशेष अनुरोध भी था, लेकिन ऐसा करना मुश्किल था. 

 

AIADMK नेता ने महत्वपूर्ण बात और कही है, गठबंधन शायद टाला नहीं जा सकता था, लेकिन इसकी रूपरेखा चेन्नई में ही तैयार हुई है. 

एक खास बात जो समझ आती है, रिपोर्ट के अनुसार, सीटों का बंटवारा एक व्यापक राजनीतिक पैटर्न की तरफ इशारा करता है. हो सकता है, गठबंधन दिल्ली के दबाव में हुआ हो, लेकिन सीट बंटवारे में AIADMK नेतृत्व ने अपनी चलाई है. 

 

गठबंधन हुआ, लेकिन अन्नामलाई पर रुख नहीं बदला

 

तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई को AIADMK नेतृत्व बीजेपी के साथ गठबंधन के रास्ते का कांटा मानकर चल रहा था, और सीटों के बंटवारे के बाद भी मामला खत्म नहीं हो सका है. बीजेपी अपने लिए सिंगनल्लूर विधानसभा सीट सहित कोयंबटूर की तीन सीटें चाहती थी, लेकिन ई. पलानीस्वामी उसके लिए तैयार नहीं हुए. 

 

के. अन्नामलाई, 2024 के आम चुनाव में बीजेपी के टिकट पर कोयंबटूर लोकसभा  सीट से चुनाव मैदान में थे. अन्नामलाई को करीब 4.5 लाख वोट भी मिले थे, लेकिन 11,788 वोटों से डीएमके उम्मीदवार से चुनाव हार गए थे. बाद में, अप्रैल 2025 में बीजेपी ने तमिलनाडु की कमान एन. नागेंद्रन को सौंप दी थी. बीजेपी का इस फैसले में AIADMK नेतृत्व के दबाव माना गया था. 

 

बीजेपी की तरफ से सिंगनल्लूर के साथ साथ सुलूर और कवुंडमपलायम विधानसभा सीटों की मांग भी की गई थी, लेकिन ई. पलानीस्वामी सिर्फ एक और वह भी कोयंबटूर नॉर्थ सीट के लिए ही राजी हुए. चेन्नई में भी बीजेपी कम से कम तीन सीटें चाहती थी, लेकिन मायलापुर की सिर्फ एक ही सीट मिल पाई. 

 

दिल्ली के साथ चेन्नई का व्यवहार एक जैसा

 

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मुख्य लड़ाई तो दो गठबंधनों के बीच ही है. केंद्र में सत्ताधारी एनडीए और तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA). दोनों गठबंधनों के बीच अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी टीवीके भी मैदान में कूद पड़ी है. डीएमके नेता एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले एसपीए में 19 राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं, और एनडीए में 16 जिसका नेतृत्व राज्य स्तर पर EPS के नाम से मशहूर AIADMK नेता ई.पलानीस्वामी कर रहे हैं.  

 

AIADMK-बीजेपी गठबंधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में एक कॉमन चीज यह नजर आती है कि राष्ट्रीय पार्टियों को तमिलनाडु के नेता  एक ही नजर से देखते हैं. बिल्कुल बराबर. और, यह बात दोनों गठबंधनों को ध्यान से देखने पर मालूम होता है. बीजेपी को AIADMK ने गठबंधन में 27 सीटें दी हैं.  बिल्कुल वैसे ही एमके स्टालिन ने डीएमके के पास 165 सीटें रखी हैं - और कांग्रेस को SPA में 28 सीटें मिली हैं.

 

मतलब, बीजेपी और कांग्रेस दोनों को तमिलनाडु में बराबरी का ट्रीटमेंट मिल रहा है - और तमिलनाडु में दोनों गठबंधनों के आपसी मुकाबले के अलावा एक अलग लड़ाई  तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच भी होनी है 

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UP News: होली से पहले सरकारी कर्मचारियों की होगी बल्ले-बल्ले, योगी सरकार ने लिया बड़ा फैसला

UP News In Hindi: सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राज्य के शिक्षकों समेत लाखों को कर्मचारियों के लिए बड़े तोहफे का ऐलान कर दिया है. इसके लिए सरकार की तरफ से आदेश जारी किया गया है   होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह पर्व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को और रंगों की होली 4 मार्च को पड़ रही है। सामान्यतः सरकारी कर्मचारियों का वेतन महीने के अंतिम या अगले महीने के प्रारंभिक दिनों में जारी होता है, लेकिन इस बार त्योहार और अवकाश के कारण वेतन भुगतान की तिथि प्रभावित हो रही थी। रविवार (1 मार्च) को साप्ताहिक अवकाश तथा 2 मार्च को होलिका दहन होने के कारण नियमित प्रक्रिया से वेतन जारी करना संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए शनिवार (28 फरवरी) को ही वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर त्वरित समन्वय और संवेदनशीलता को दर्शाता है।   शिक्षा विभाग की भूमिका   स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय की ओर से 2 मार्च से पहले वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए। यह आदेश उत्तर प्रदेश स्कूल शिक्षा महानिदेशक मोनिका रानी द्वारा जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि सभी संबंधित अधिकारी और वित्तीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करें कि होलिका दहन से पहले शिक्षकों और कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंच जाए।   शिक्षा विभाग राज्य का एक बड़ा विभाग है, जिसमें बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, राजकीय इंटर कॉलेज, सहायता प्राप्त विद्यालय और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से पहले वेतन देने के लिए विभाग को वित्तीय और तकनीकी स्तर पर व्यापक तैयारी करनी पड़ी। ट्रेजरी, बैंकिंग प्रणाली और जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित कर भुगतान प्रक्रिया को तेज किया गया।     वित्त विभाग ने भी इस संबंध में शासनादेश जारी किया। आदेश में स्पष्ट किया गया कि अवकाश के कारण नियमित तिथि पर वेतन भुगतान संभव नहीं था, इसलिए विशेष अनुमति के तहत अग्रिम भुगतान का निर्णय लिया गया है। इस फैसले को राज्यपाल Anandiben Patel की मंजूरी प्राप्त होने के बाद लागू किया गया।   राज्यपाल की स्वीकृति का उल्लेख इस बात का संकेत है कि यह निर्णय केवल विभागीय स्तर का नहीं बल्कि उच्च प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया है। इससे आदेश की वैधता और गंभीरता स्पष्ट होती है।   प्रशासनिक समन्वय और कार्यान्वयन   राज्य सरकार की ओर से सभी जिलाधिकारियों और विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया कि वे अपने-अपने विभागों में तैनात कर्मचारियों का वेतन 28 फरवरी तक हर हाल में जारी करें। साथ ही आदेश के पालन को लेकर सख्त हिदायत दी गई। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी को गंभीरता से लिया जाएगा।   वेतन भुगतान की प्रक्रिया में निम्नलिखित स्तरों पर कार्य हुआ: वेतन बिलों की समयपूर्व तैयारी – संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) को समय से पहले वेतन बिल तैयार करने के निर्देश दिए गए। ट्रेजरी की सक्रियता – कोषागार कार्यालयों को अतिरिक्त समय तक कार्य कर बिल पास करने को कहा गया। बैंकिंग समन्वय – बैंकों के साथ समन्वय कर यह सुनिश्चित किया गया कि भुगतान समय से कर्मचारियों के खातों में पहुंचे। डिजिटल प्रक्रिया का उपयोग – ई-भुगतान प्रणाली के माध्यम से प्रक्रिया को त्वरित और पारदर्शी बनाया गया कर्मचारियों में खुशी की लहर   इस निर्णय के बाद सरकारी कर्मचारियों में व्यापक खुशी देखी गई। त्योहारों के समय परिवारों की जरूरतें बढ़ जाती हैं—नए कपड़े, मिठाइयां, रंग-गुलाल, बच्चों के लिए उपहार, रिश्तेदारों के यहां आने-जाने का खर्च आदि। ऐसे समय यदि वेतन में देरी हो जाए तो असुविधा होती है। सरकार द्वारा समय से पहले वेतन जारी करने से कर्मचारियों को आर्थिक रूप से राहत मिली है।   विशेष रूप से शिक्षकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक अक्सर स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उनके पास वेतन आने से स्थानीय बाजारों में भी रौनक बढ़ती है।   आर्थिक प्रभाव राज्य के लाखों कर्मचारियों को एक साथ वेतन जारी होने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा। होली के अवसर पर खरीदारी बढ़ने की संभावना है, जिससे व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को भी लाभ होगा। वस्त्र, मिठाई, रंग-गुलाल, घरेलू सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि हो सकती है। यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाला भी माना जा सकता है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से छोटे व्यापारियों की आय में वृद्धि होती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधि में तेजी आती है।   राजनीतिक और सामाजिक संदेश   Yogi Adityanath की सरकार का यह निर्णय कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है। त्योहारों के समय इस प्रकार के निर्णय कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाते हैं और सरकार के प्रति सकारात्मक भावना उत्पन्न करते हैं। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे संतुष्ट और प्रेरित हों तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से होता है। समय पर वेतन भुगतान कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान भी है।   पहले भी मिल चुकी हैं ऐसी सौगातें   पिछले वर्षों में भी त्योहारों से पहले बोनस या अग्रिम वेतन जैसी घोषणाएं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की जाती रही हैं। हालांकि हर बार परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इस बार अवकाश और त्योहार की तिथियों के कारण यह निर्णय आवश्यक हो गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि समय से पहले वेतन देने का निर्णय प्रशासनिक कुशलता का परिचायक है, क्योंकि इसमें बजटीय प्रबंधन और नकदी प्रवाह का संतुलन बनाए रखना होता है।   संभावित चुनौतियां   हालांकि आदेश जारी कर दिया गया है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि किसी विभाग में तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजी कमी या बैंकिंग समस्या उत्पन्न होती है तो कुछ कर्मचारियों को असुविधा हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।   कर्मचारियों की अपेक्षाएं   इस निर्णय के बाद कर्मचारियों में यह अपेक्षा भी बढ़ी है कि भविष्य में भी त्योहारों के समय इसी प्रकार की संवेदनशीलता दिखाई जाएगी। साथ ही वे नियमित वेतन भुगतान, महंगाई भत्ता, पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से संबंधित मुद्दों पर भी सरकार से सकारात्मक रुख की आशा रखते हैं।   UP NEWSYogi AdityanathHoli 2026  

हिंदी न्यूज़बिजनेसGold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमत आज घटी या बढ़ी? जानें 28 फरवरी को दिल्ली से मुंबई तक क्या हैं ताजा भाव

Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमत आज घटी या बढ़ी? जानें 28 फरवरी को दिल्ली से मुंबई तक क्या हैं ताजा भाव     सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज का ताजा भाव क्या है?     Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से बाजार में लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज शनिवार 28 फरवरी के कारोबारी दिन सोने-चांदी का ताजा भाव क्या है?     सोने के आउटलुक पर जेपी मॉर्गन का अपडेट     वैश्विक बाजार में सोने को लेकर नई उम्मीदें जताई जा रही हैं. जेपी मॉर्गन ने अपना लॉन्ग-टर्म प्राइस टारगेट बढ़ाकर 4,500 डॉलर प्रति औंस कर दिया है. जबकि 2026 के अंत के लिए 6,300 डॉलर प्रति औंस का अनुमान पहले की तरह कायम रखा है.   जेपी मॉर्गन के अनुसार निवेशकों के पोर्टफोलियो में स्ट्रक्चरल डायवर्सिफिकेशन का रुझान अभी जारी है. जिससे आगे भी सोने में तेजी की संभावना बनी रह सकती है.     चांदी के ताजा भाव     दिल्ली, मंबई, कोलकाता और चेन्नई में चांदी की कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है. दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में 10 ग्राम चांदी आज 2,950 रुपये की दर पर बिक रहा है. वहीं, 100 ग्राम चांदी खरीदने के लिए ग्राहकों को 29,500 रुपये खर्च करने होंगे. चेन्नई में 10 ग्राम चांदी की कीमत 3,000 रुपये चल रही है.     आपके शहर में सोने का भाव (गुड रिटर्न के अनुसार)     दिल्ली में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए     मुंबई में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए     चेन्नई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,65,820 रुपए 22 कैरेट - 1,52,000 रुपए 18 कैरेट - 1,30,100 रुपए     कोलकाता में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए     अहमदाबाद में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए     लखनऊ में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए     पटना में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए     हैदराबाद में सोने के दाम  (प्रति 10 ग्राम)   24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए    

ये हैं सबसे गलत और खतरनाक फूड कॉम्बिनेशन, आयुर्वेद में भी है इनका जिक्र

  Causes Of Bloating And Gas: हम क्या खाते हैं, इसका हमारी सेहत पर काफी असर होता है. चलिए आपको बताते हैं कि किन फूड कॉम्बिनेशन से आपको बचना चाहिए और आयुर्वेद इसको लेकर क्या कहता है   Which Foods Should Not Be Eaten Together: खाना खाते समय हमें कुछ चीजों का ध्यान रखने की जरूरत होती है. हम क्या खाते हैं और किन चीजों को साथ में मिलाकर खाते हैं, इसका सीधा असर हमारे डाइजेशन शक्ति पर पड़ता है. गलत फूड कॉम्बिनेशन पाचन को बिगाड़ सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक तत्व जमा कर सकते हैं. इसका नतीजा गैस, पेट फूलना, एसिडिटी, त्वचा संबंधी समस्याएं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ सकता है. चलिए आपको आयुर्वेद के हिसाब से बताते हैं कि किन कॉम्बिनेशन से हमें बचना चाहिए.      क्या कहता है आयुर्वेद?     आयुर्वेद के बारे में जानकारी देने वाली संस्था kevaayurveda के अनुसार, आयुर्वेद मानता है कि हर व्यक्ति की वात, पित्त, कफ और पाचन क्षमता अलग होती है कुछ खानें की चीजें एक-दूसरे के विपरीत गुण रखते हैं. यदि इन्हें बार-बार साथ में खाया जाए तो डाइजेशन सिस्टम पर अतिरिक्त प्रेशर पड़ता है. इससे गैस, कब्ज, सीने में जलन, मुंहासे, कमजोर इम्यूनिटी और डाइजेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं.     किन फूड कॉम्बिनेशन से बचना चाहिए?     kevaayurveda के अनुसार, कुछ प्रमुख गलत फूड कॉम्बिनेशन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है, उनमें सबसे पहले आता है दूध और मछली. आयुर्वेद के अनुसार दूध ठंडा और भारी होता है, जबकि मछली गर्म तासीर वाली मानी जाती है. दोनों को साथ लेने से पाचन गड़बड़ा सकता है और स्किन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसी तरह दूध के साथ खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू या अनानास भी ठीक नहीं माने जाते, क्योंकि ये पेट में दूध को फाड़ सकते हैं और गैस या एसिडिटी बढ़ा सकते हैं.   गरम भोजन के साथ शहद मिलाना भी आयुर्वेद में हानिकारक बताया गया है. शहद को गर्म करने से उसके गुण बदल सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक प्रभाव पैदा हो सकता है. भारी भोजन के तुरंत बाद फल खाना भी उचित नहीं माना जाता, क्योंकि फल जल्दी पचते हैं और भारी भोजन के साथ पेट में फर्मेंटेशन शुरू कर सकते हैं. दही और चीनी का मेल भी पाचन के लिए अनुकूल नहीं माना जाता. दही पहले से ही खट्टा और ठंडा होता है, जबकि रिफाइंड चीनी शरीर में असंतुलन बढ़ा सकती है. रात में दही को फल या ठंडी चीजों के साथ लेना कफ बढ़ा सकता है, जिससे सर्दी-खांसी या साइनस की समस्या हो सकती है. बासी भोजन के साथ दूध लेना भी पाचन के लिए सही नहीं माना गया.     किन चीजों का सेवन करना चाहिए?     आयुर्वेद सलाह देता है कि मौसमी आहार लें, जरूरत से ज्यादा न खाएं और अदरक, जीरा, सौंफ जैसे मसालों का उपयोग करें, जो डाइजेशन को मजबूत बनाते हैं. सही फूड कॉम्बिनेशन अपनाने से डाइजेशन मजबूत रहती है, न्यूट्रिशन तत्वों का ऑब्जर्वेशन बेहतर होता है और शरीर संतुलित रहता है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए यह नियम और भी लाभकारी माने जाते हैं.  

राजनीति

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तमिलनाडु चुनाव नतीजे बाद में आएंगे, सीट बंटवारे में द्रविड़ पार्टियों की बड़ी जीत

  तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए AIADMK और बीजेपी के बीच जो समझौता हुआ है, बीजेपी की कई मांगें नहीं मानी गई हैं. तमिलनाडु के दोनों गठबंधनों में एक बात कॉमन जरूर देखने को मिल रही है - डीएमके हो या AIADMK राष्ट्रीय दलों के साथ व्यवहार एक जैसा ही कर रहे हैं.   तमिलनाडु में AIADMK और बीजेपी के बीच सीटों का बंटवारा आखिरकार फाइनल हो गया. सीटों के बंटवारे में यह देखना भी दिलचस्प है कि बीजेपी को भी AIADMK नेता  ई. पलानीस्वामी ने चुनावी गठबंधन में लगभग उतनी ही सीटें दी हैं, जितनी डीएमके नेता एमके स्टालिन ने सत्ताधारी गठबंधन में कांग्रेस के लिए छोड़ी है.   मुद्दे की बात यह भी है कि बीजेपी को गठबंधन में पसंद की सीटों पर समझौता करना पड़ा है. क्योंकि, ई. पलानीस्वामी अपने रुख पर वैसे ही कायम रहे, जैसे चुनाव  जीतने पर सत्ता में हिस्सेदारी से पहले ही मना कर चुके हैं. बीजेपी ही नहीं, ई. पलानीस्वामी दूसरे सहयोगी दलों की मांगों के भी खिलाफ नजर आए, और गठबंधन में सहयोगियों को ऐसी सीटें दीं जो उनके लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण मानी जा रही हैं.    बीजेपी को कोयंबटूर की भी सीट नहीं मिल पाई है, जिसमें ई. पलानीस्वामी  की बीजेपी नेता के. अन्नामलाई से पुरानी चिढ़ समझ में आ रही है. अन्नामलाई की राजनीति शुरू से ही आक्रामक रही है, और AIADMK नेतृत्व को यह बात बिल्कुल भी  बर्दाश्त नहीं हो पाती है - बेशक ई. पलानीस्वामी बीजेपी के साथ गठबंधन को अमली जामा पहना दिया है, लेकिन सब कुछ वैसा ही किया है जैसा वो चाहते थे.   तमिलनाडु में ऐसे हुआ सीटों का बंटवारा   24-25 मार्च को अंतिम रूप दिए गए समझौते के मुताबिक, गठबंधन में  AIADMK ने तमिलनाडु की 234 सीटों में से 169  सीटें अपने पास रखी हैं. एनडीए के सात सहयोगी दलों को सीटों के बंटवारे में 65 सीटें दी गई हैं, जिनमें बीजेपी के हिस्से में 27 सीटें आई हैं. गठबंधन में शामिल तमिलनाडु के बाकी राजनीतिक दलों में पट्टाली मक्कल काची (PMK) को 18 और अम्मा मक्कल मुनेत्र कझगम (AMMK) को 11 सीटें मिली हैं.     तमिलनाडु के चुनावी  गठबंधन एक खास राजनीतिक पैटर्न की तरफ इशारा करता है. कोई भी गठबंधन वैसे भी मजबूरी का समझौता ही होता है. जिस पक्ष का दबदबा ज्यादा होता है, मनमानी खुलकर  करता है. यूपी और बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक ये सब देखने को मिलता रहा है.    बीजेपी और AIADMK के बीच हुए गठबंधन पर प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की  की रिपोर्ट में बताया गया है कि दबाव कोई एकतरफा नहीं था. दबाव दिल्ली की तरफ से भी था, और क्षेत्रीय पार्टी AIADMK की तरफ से भी. बल्कि दोनों ने काफी मोलभाव किया. जो जहां भारी पड़ा अपनी बात मनवा ली.    इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में AIADMK के एक नेता का कहना है, यह ऐसा समझौता है, जहां गठबंधन जरूरी था. लेकिन, शर्तें नहीं छोड़ी गईं. AIADMK नेता ने बताया है, दिल्ली से एक सीनियर नेता के लिए कोयंबटूर की सीट को लेकर विशेष अनुरोध भी था, लेकिन ऐसा करना मुश्किल था.    AIADMK नेता ने महत्वपूर्ण बात और कही है, गठबंधन शायद टाला नहीं जा सकता था, लेकिन इसकी रूपरेखा चेन्नई में ही तैयार हुई है.  एक खास बात जो समझ आती है, रिपोर्ट के अनुसार, सीटों का बंटवारा एक व्यापक राजनीतिक पैटर्न की तरफ इशारा करता है. हो सकता है, गठबंधन दिल्ली के दबाव में हुआ हो, लेकिन सीट बंटवारे में AIADMK नेतृत्व ने अपनी चलाई है.    गठबंधन हुआ, लेकिन अन्नामलाई पर रुख नहीं बदला   तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई को AIADMK नेतृत्व बीजेपी के साथ गठबंधन के रास्ते का कांटा मानकर चल रहा था, और सीटों के बंटवारे के बाद भी मामला खत्म नहीं हो सका है. बीजेपी अपने लिए सिंगनल्लूर विधानसभा सीट सहित कोयंबटूर की तीन सीटें चाहती थी, लेकिन ई. पलानीस्वामी उसके लिए तैयार नहीं हुए.    के. अन्नामलाई, 2024 के आम चुनाव में बीजेपी के टिकट पर कोयंबटूर लोकसभा  सीट से चुनाव मैदान में थे. अन्नामलाई को करीब 4.5 लाख वोट भी मिले थे, लेकिन 11,788 वोटों से डीएमके उम्मीदवार से चुनाव हार गए थे. बाद में, अप्रैल 2025 में बीजेपी ने तमिलनाडु की कमान एन. नागेंद्रन को सौंप दी थी. बीजेपी का इस फैसले में AIADMK नेतृत्व के दबाव माना गया था.    बीजेपी की तरफ से सिंगनल्लूर के साथ साथ सुलूर और कवुंडमपलायम विधानसभा सीटों की मांग भी की गई थी, लेकिन ई. पलानीस्वामी सिर्फ एक और वह भी कोयंबटूर नॉर्थ सीट के लिए ही राजी हुए. चेन्नई में भी बीजेपी कम से कम तीन सीटें चाहती थी, लेकिन मायलापुर की सिर्फ एक ही सीट मिल पाई.    दिल्ली के साथ चेन्नई का व्यवहार एक जैसा   तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मुख्य लड़ाई तो दो गठबंधनों के बीच ही है. केंद्र में सत्ताधारी एनडीए और तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA). दोनों गठबंधनों के बीच अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी टीवीके भी मैदान में कूद पड़ी है. डीएमके नेता एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले एसपीए में 19 राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं, और एनडीए में 16 जिसका नेतृत्व राज्य स्तर पर EPS के नाम से मशहूर AIADMK नेता ई.पलानीस्वामी कर रहे हैं.     AIADMK-बीजेपी गठबंधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में एक कॉमन चीज यह नजर आती है कि राष्ट्रीय पार्टियों को तमिलनाडु के नेता  एक ही नजर से देखते हैं. बिल्कुल बराबर. और, यह बात दोनों गठबंधनों को ध्यान से देखने पर मालूम होता है. बीजेपी को AIADMK ने गठबंधन में 27 सीटें दी हैं.  बिल्कुल वैसे ही एमके स्टालिन ने डीएमके के पास 165 सीटें रखी हैं - और कांग्रेस को SPA में 28 सीटें मिली हैं.   मतलब, बीजेपी और कांग्रेस दोनों को तमिलनाडु में बराबरी का ट्रीटमेंट मिल रहा है - और तमिलनाडु में दोनों गठबंधनों के आपसी मुकाबले के अलावा एक अलग लड़ाई  तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच भी होनी है 

Metroheadlines मार्च 26, 2026 0

जम्मू को 3 संभागों में बांटने का प्रस्ताव, 27 अप्रैल को शुरू हो रहे बजट सत्र में PDP को बिल पेश करने को मिली मंजूरी ?

पांच राज्यों में चुनाव के एलान के बाद आदर्श आचार संहिता के निर्देश जारी, MCC लागू होने पर क्या होता है?

'जहां बेटियां जन्म से आजीवन पूजी जाती हैं, वह है अपना MP'- महिला सम्मेलन में बोले सीएम मोहन

बिहार चुनाव में किसके बटुए से कितना पैसा निकला? BJP की जमापूंजी का 2%, तो कांग्रेस का 28%

बिहार विधानसभा चुनाव नतीजे आने के तकरीबन चार महीने के बाद राजनीतिक दलों ने अपने खर्च का लेखा-जोखा चुनाव आयोग को सौंपा है. बीजेपी ने बिहार में सबसे  ज्यादा पैसा खर्च किया है तो कांग्रेस ने बीजेपी की तुलना में भले ही कम खर्च किया हो, लेकिन अपनी जमापूंजी का बड़ा हिस्सा लगा दिया है.    बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जीतने के लिए बीजेपी ने सभी पार्टियों से ज्यादा खर्च किया है. बीजेपी ने 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं तो कांग्रेस ने कुल 35.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. बीजेपी ने जमा पूंजी का 2 फीसदी खर्च किया तो कांग्रेस ने अपनी कुल जमा पूंजी का 28 फीसदी पैसा खर्च कर दिया है.   बीजेपी ने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार तीन से ज्यादा पैसा चुनाव प्रचार पर खत्म किया है. 2020 में बीजेपी ने करीब 54 करोड़ रुपये खर्च किए थे, लेकिन इस बार 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.    बिहार में बीजेपी का खर्च करना इस बार कामयाब रहा और राज्य में 89 विधायकों के साथ सबसे बड़ी  पार्टी बनकर उभरी है. वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस ने बीजेपी की तुलना में भले ही पैसा कम खर्च किया हो, लेकिन अपनी जमा पूजी का बहुत बड़ा हिस्सा बिहार में  खर्च कर दिया है   बिहार चुनाव में किस पार्टी ने कितना खर्च किया   चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बाद अपने खर्च की हिसाब देती हैं. इसी मद्देनज  बिहार चुनाव में खर्च किए पैसे का लेखा-जोखा सियासी दलों ने चुनाव आयोग को दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने बिहार चुनाव खर्च की रिपोर्ट 10 फरवरी को चुनाव आयोग को सौंपी है, जिसमें पार्टी ने बताया है कि उसने 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.     वहीं, बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 35 करोड़ रुपये खर्च किए हैं तो सीपीआई (एम) ने महज 26.75 लाख रुपये खर्च किए हैं. बहुजन समाज पार्टी ने बिहार चुनाव में सिर्फ 9.01 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. आरजेडी और जेडीयू सहित दूसरे दलों के खर्च का लेखा-जोखा अभी चुनाव आयोग को उपलब्ध नहीं कराया गया है , जिसके चलते उन्होंने कितना खर्च किया है, उसका आंकड़ा पता नहीं चल सका.   बीजेपी और कांग्रेस ने कहां कितना पैसा खर्च किया   बिहार चुनाव में बीजेपी ने 146 करोड़ रुपये जो खर्च किए हैं, उसमें 117 करोड़ रुपये सियासी माहौल बनाने के लिए प्रचार और स्टार कैंपेनर के ट्रैवेल पर खर्च किए हैं. बीजेपी ने चुनाव प्रचार और विज्ञापन पर 43.53 करोड़ रुपये खर्च किए तो स्टार कैंपेनर्स की यात्रा पर 37.28 करोड़ रुपये खर्च किए और साथ में दूसरे नेताओं के यात्रा पर 4.44 करोड़ रुपये खर्च किए गए.    बीजेपी ने चुनाव प्रचार के विज्ञापन पर खर्च किए हैं, जिसमें पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए आर्थिक मदद के तौर पर देखा जाता है.  कांग्रेस ने बिहार चुनाव में खर्च किए गए 35 करोड़ रुपये में से 12.83 करोड़ रुपये स्टार कैंपेनर्स की यात्रा पर लगे. इसके अलावा कांग्रेस ने सोशल मीडिया  कैंपने के लिए 11.24 करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अलावा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बिहार में निकाली गई वोटर अधिकार यात्रा पर भी खर्च किए    बीजेपी ने जमापूंजी का 2% खर्चा तो कांग्रेस ने 28%   रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले साल नवंबर में बिहार चुनाव खत्म होने पर बीजेपी का क्लोजिंग बैलेंस 7,088.58 करोड़ रुपये था. इसके मुताबिक चुनाव से पूर्व बीजेपी के पास 7235.26 करोड़ रुपये था, जिसमें से 146.71 करोड़ खर्च किया गया. इसके बाद 7,088.58 करोड रुपये बचे थे. इस तरह बीजेपी ने अपनी जमापूंजी का करीब 2 फीसदी पैसा ही बिहार चुनाव में खर्च किया है.    वहीं, कांग्रेस के पास बिहार चुनाव के बाद कुल 89.13 करोड़ रुपये बचे थे. कांग्रेस ने चुनाव में 35.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इस लिहाज से कांग्रेस के चुनाव से पहले 124.2 करोड़ रुपये था, जिसमें से 35.07 करोड़ रुपये खर्च करने का मतलब साफ है कि पार्टी ने अपनी जमापूंजी का 28.23 फीसदी पैसा बिहार चुनाव में खर्च किया.     कांग्रेस-बीजेपी का एक विधायक पर कितना खर्च     बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सबसे ज्यादा 89 विधायक जीतने में सफल रही जबकि कांग्रेस को महज 6 सीटें मिली हैं. बिहार चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के द्वारा खर्च किए गए पैसे को विधायकों की संख्या के लिहाज से देखें तो बीजेपी को एक विधायक 1 करोड़ 64 लाख का पड़ा. कांग्रेस के सिर्फ 6 विधायक जीते हैं,ऐसे में कांग्रेस को एक विधायक 5 करोड़ 83 लाख का पड़ा   2020 के चुनाव की तुलना में तीन गुना खर्च किया   बिहार के पिछले यानी 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कुल 54.72 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जिसमें से  लगभग 28.02 करोड़ रुपये बिहार राज्य इकाई द्वारा और 26.69 करोड़ रुपये केंद्रीय मुख्यालय द्वारा खर्च किए गए थे. बीजेपी इस चुनाव में सबसे अधिक खर्च करने वाली पार्टी थी.    वहीं, 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 12.35 करोड़ रुपये खर्च किए थे, इसमें से बड़ा हिस्सा 11.69 करोड़ रुपये दिल्ली केंद्रीय मुख्यालय से आया था, जबकि राज्य इकाई का खर्च काफी कम दिखाया गया है. इस हिसाब से देखें तो इस बार कांग्रेस और बीजेपी तीन गुना पैसा चुनाव कैंपेन  पर खर्च किया है.

Metroheadlines मार्च 11, 2026 0

बंगाल चुनाव: 2 से 3 फेज में हो सकता है मतदान, BJP ने EC को सौंपा 17 सूत्रीय ज्ञापन

मध्यप्रदेश की सियासत में बड़ी हलचल, कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस का 1 विधायक कम, BJP की बल्ले-बल्ले!

शराबबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को लगाई फटकार, कहा- सभी आरोपितों को क्यों न जमानत दे दें

हिंदी न्यूज़ न्यूज़इंडियाबिहार में SIR को लेकर जनता की क्या है राय? सर्वे में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

   बिहार में SIR को लेकर जनता की क्या है राय? सर्वे में हुआ चौंकाने वाला खुलासा      Bihar SIR: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की जारी प्रक्रिया के बीच कांग्रेस सांसद राहुल गांधी चुनाव आयोग (ECI) पर आरोप लगाते हुए पूरे राज्य में वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं.   बिहार में इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए सभी सियासी दल अपनी-अपनी राजनीति को भुनाने की कोशिशों में लगे हुए हैं. वहीं, विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय चुनाव आयोग (ECI) बिहार की मतदाता सूची से सभी त्रुटियों को दूर करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान चला रही है. जिसे लेकर बिहार में राजनीतिक गहमा-गहमी जारी है और सभी विपक्षी दलों के नेता बिहार एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं.   लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी चुनाव आयोग पर वोट चोरी और मतदाता सूची में हेराफेरी करने के आरोप लगाते हुए बिहार में वोटर अधिकार यात्रा कर रहे हैं. राहुल गांधी के साथ बिहार विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव भी उनके साथ यात्रा कर रहे हैं. इस बीच बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर एक सर्वे हुआ हैं. जिसमें बिहार की जनता ने चौंका देने वाले खुलासे किए हैं   बिहार की जनता ने एसआईआर को लेकर दिए जवाब   बिहार में चुनाव आयोग के एसआईआर प्रक्रिया के बीच वोट वाइब ने एक सर्वे किया है. सर्वे में बिहार की जनता से एसआईआर प्रक्रिया से संबंधित कुछ सवाल किए गए हैं. जिस पर बिहार की जनता ने अपनी राय रखी है.   सवाल- क्या आपको वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने को लेकर किसी तरह की कोई परेशानी हुई?   जवाब- इस पर राज्य के 37.2 प्रतिशत लोगों ने हां में जवाब दिया. वहीं, 42.2 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई, जबकि 20.6 परसेंट लोगों ने कहा कि कह नहीं सकते.   सवाल- क्या आप मानते हैं कि SIR सही और पारदर्शी तरीके से किया गया है?   जवाब- इस पर बिहार के 39.9 परसेंट लोगों ने हां में अपनी प्रतिक्रिया दी है. वहीं, 39.9 परसेंट लोगों ने नहीं में जवाब दिया है. जबकि 20.4 प्रतिशत ने कह नहीं सकते पर अपनी राय दी है.   सवाल- क्या वोटर लिस्ट पर आपत्ति उठाने के लिए दिया गया एक महीने का समय पर्याप्त है?   जवाब- इस सवाल पर 38.3 परसेंट लोगों ने कहा कि हां, इतना समय पर्याप्त है और पर्याप्त से ज्यादा है. वहीं, 40.9 परसेंट लोगों ने नहीं में प्रतिक्रिया दी. जबकि 20.8 परसेंट लोगों ने कहा कि कह नहीं सकते.   सवाल- वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को देखते हुए देशव्यापी SIR पर आपकी क्या राय है?   जवाब- बिहार के 49.2 परसेंट लोगों ने इस सवाल पर कहा कि इसे तुरंत लागू होना चाहिए. वहीं, 39.1 प्रतिशत लोगों ने कहा कि जरूरत नहीं है. जबकि 11.6 फीसद लोगों ने कहा कह नहीं सकते.   सवाल- क्या आपके पास ECI के लिए पेश किए जाने वाले 11 दस्तावेजों में कोई भी है?   जवाब- बिहार के 74.7 परसेंट लोगों ने कहा कि हां में अपनी प्रतिक्रिया दी. वहीं, मात्र 11.8 परसेंट लोगों ने नहीं में अपना जवाब दिया. जबकि 13.5 परसेंट लोगों ने कहा कि कह नहीं सकते.  

Metroheadlines मार्च 7, 2026 0

नीतीश का बिहार से सियासी प्रस्थान 'एक युग का अंत'... 5 दशकों के बदलाव की कहानी

कांग्रेस ने राज्यसभा द्विवार्षिक चुनावों के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी की है। इसमें अभिषेक मनु सिंघवी को तेलंगाना से फिर नामित किया गया है, साथ ही वेम नरेंद्र रेड्डी भी उम्मीदवार हैं।

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Metroheadlines मार्च 20, 2026 0

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क्या नीतीश के दिल्ली शिफ्ट के बाद जेडीयू बिहार में दबदबा बरकरार रख पाएगी?