Mallikarjun Kharge on PM Modi: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पीएम नरेंद्र मोदी को लेकर दिए बयान के बाद राजनीतिक हलकों में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिया गया विवादित बयान भारतीय राजनीति में एक नए टकराव का कारण बन गया है, खासकर जब देश Assembly Elections 2026 की तैयारी के दौर से गुजर रहा है। मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 को दिए गए अपने बयान में खरगे ने पीएम मोदी को “आतंकवादी” तक कह दिया, जिससे सियासी माहौल अचानक गरमा गया। इस बयान के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे बेहद आपत्तिजनक, गैर-जिम्मेदाराना और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के खिलाफ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया हो, बल्कि उनके अनुसार, अब तक कांग्रेस द्वारा मोदी के खिलाफ 175 से अधिक अपमानजनक टिप्पणियां की जा चुकी हैं। यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटे हैं। ऐसे संवेदनशील समय में इस तरह के व्यक्तिगत हमले राजनीतिक विमर्श के स्तर को गिराने वाले माने जा रहे हैं। भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि कांग्रेस मुद्दों पर बहस करने के बजाय व्यक्तिगत आरोपों और अपशब्दों का सहारा ले रही है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। पार्टी ने यह भी मांग की कि खरगे को अपने बयान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। दूसरी ओर, कांग्रेस की तरफ से इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ नेताओं ने इसे खरगे की व्यक्तिगत राय बताया, जबकि कुछ ने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से हटाकर पेश किया जा रहा है। कांग्रेस का तर्क है कि वह सरकार की नीतियों और फैसलों की आलोचना करती रही है और आगे भी करती रहेगी, लेकिन भाजपा इस आलोचना को व्यक्तिगत हमले के रूप में पेश कर रही है ताकि असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके। पार्टी के प्रवक्ताओं ने यह भी कहा कि भाजपा बार-बार पुराने बयानों को गिनाकर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान चुनावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकते हैं, जहां नेताओं द्वारा तीखी भाषा का इस्तेमाल कर अपने समर्थकों को सक्रिय करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है, क्योंकि आम मतदाता अब विकास, रोजगार, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। ऐसे में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप कई बार उल्टा असर भी डाल सकते हैं और जनता में राजनीतिक दलों के प्रति निराशा बढ़ा सकते हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में राजनीतिक संवाद का स्तर हमेशा से चर्चा का विषय रहा है। समय-समय पर नेताओं द्वारा एक-दूसरे पर तीखे हमले किए जाते रहे हैं, लेकिन जब यह भाषा मर्यादा की सीमा पार करती है, तो व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ता है। इस मामले में भी कई गैर-राजनीतिक हस्तियों और सामाजिक संगठनों ने संयमित भाषा के इस्तेमाल की अपील की है। उनका कहना है कि नेताओं को अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि उनके बयान समाज पर व्यापक प्रभाव डालते हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारतीय राजनीति में स्वस्थ और मुद्दा-आधारित बहस की जगह कम होती जा रही है? जहां एक ओर सत्तारूढ़ दल विपक्ष पर आरोप लगाता है कि वह केवल नकारात्मक राजनीति कर रहा है, वहीं विपक्ष का कहना है कि सरकार आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर पा रही और हर असहमति को देशविरोध या व्यक्तिगत हमले के रूप में पेश करती है। इस टकराव के बीच असली मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मल्लिकार्जुन खरगे अपने बयान पर कायम रहते हैं या किसी तरह की सफाई या माफी सामने आती है। साथ ही, भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को चुनावी प्रचार में किस तरह इस्तेमाल करती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल इतना तय है कि इस बयान ने राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है और चुनावी माहौल को और अधिक तीखा बना दिया है।
9 अप्रैल को असम, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव है. 23 अप्रैल को तमिलनाडु और 23-29 को पश्चिम बंगाल में वोटिंग है.जानिए ओपिनियन पोल में किसे बढ़त मिल रही है. 2026 विधानसभा चुनाव ओपिनियन पोल: असम, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में किसकी बनेगी सरकार? भारत में 2026 का चुनावी माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका है। असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद अब ओपिनियन पोल ने सियासी समीकरणों को और भी दिलचस्प बना दिया है। हर राज्य में अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियां देखने को मिल रही हैं, जहां कहीं सीधी टक्कर है तो कहीं गठबंधन निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। सबसे पहले बात करें असम की, जहां 9 अप्रैल 2026 को एक ही चरण में मतदान होना है। यहां का ओपिनियन पोल भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर की ओर इशारा करता है। चाणक्य स्ट्रेटेजी के सर्वे के मुताबिक बीजेपी को 83 से 90 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि कांग्रेस 30 से 36 सीटों पर सिमट सकती है। अन्य दलों को 3 से 6 सीटें मिल सकती हैं। वोट शेयर के आंकड़े भी दिलचस्प हैं, जहां बीजेपी को 45 से 48 प्रतिशत और कांग्रेस को 39 से 44 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। यह साफ संकेत देता है कि असम में बीजेपी गठबंधन एक बार फिर सत्ता में वापसी कर सकता है, हालांकि कांग्रेस भी पूरी तरह मुकाबले में बनी हुई है। केरल की बात करें तो यहां का चुनावी समीकरण पूरी तरह अलग नजर आता है। Matrize ओपिनियन पोल के अनुसार, केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) को 67 से 73 सीटें मिल सकती हैं, जबकि लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) को 62 से 68 सीटें मिलने का अनुमान है। बीजेपी यहां 5 से 8 सीटों तक सीमित रह सकती है। केरल विधानसभा में कुल 140 सीटें हैं और बहुमत के लिए 71 सीटों की जरूरत होती है। इस हिसाब से देखा जाए तो UDF हल्की बढ़त के साथ सरकार बना सकता है। पिछले एक दशक से केरल में LDF का शासन रहा है, लेकिन इस बार सत्ता परिवर्तन की संभावना दिखाई दे रही है। पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव बेहद रोमांचक होने वाला है। यहां 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा। ओपिनियन पोल के अनुसार बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। MATRIZE के सर्वे के मुताबिक बीजेपी को 140 से 160 सीटें मिल सकती हैं, जबकि TMC को 130 से 150 सीटों का अनुमान है। अन्य दलों को 8 से 16 सीटें मिल सकती हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं और बहुमत के लिए 148 सीटें जरूरी हैं। वोट शेयर की बात करें तो बीजेपी को 41 प्रतिशत और TMC को 43 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि TMC भले ही बढ़त में हो, लेकिन बीजेपी बहुत पीछे नहीं है और आखिरी नतीजे बेहद चौंकाने वाले हो सकते हैं। तमिलनाडु में इस बार मुकाबला गठबंधनों के बीच दिलचस्प होता जा रहा है। 23 अप्रैल को यहां एक ही चरण में मतदान होगा। MATRIZE के ओपिनियन पोल के अनुसार NDA गठबंधन को 107 से 120 सीटें मिल सकती हैं, जबकि DMK गठबंधन को 102 से 115 सीटें मिलने का अनुमान है। TVK को 5 से 12 और अन्य को 1 से 6 सीटें मिल सकती हैं। तमिलनाडु विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं और बहुमत का आंकड़ा 118 है। इस हिसाब से NDA गठबंधन हल्की बढ़त के साथ सरकार बना सकता है, हालांकि मुकाबला बेहद करीबी रहने की संभावना है। इन सभी राज्यों के ओपिनियन पोल को मिलाकर देखा जाए तो 2026 के चुनाव में किसी एक पार्टी का दबदबा नहीं दिख रहा है, बल्कि हर राज्य में अलग-अलग राजनीतिक समीकरण बनते नजर आ रहे हैं। असम में बीजेपी मजबूत दिख रही है, केरल में UDF को बढ़त मिलती दिख रही है, पश्चिम बंगाल में TMC और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर है, जबकि तमिलनाडु में NDA और DMK गठबंधन के बीच मुकाबला बेहद करीबी है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ओपिनियन पोल सिर्फ अनुमान होते हैं, वास्तविक नतीजे इससे अलग भी हो सकते हैं। चुनावी माहौल, उम्मीदवारों की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे और मतदान प्रतिशत जैसे कई फैक्टर अंतिम परिणाम को प्रभावित करते हैं। इसलिए अंतिम नतीजों के लिए वोटिंग के बाद ही स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।
प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद विपक्ष ने इसे “भ्रामक और गैर-जरूरी” बताया. TMC सांसद सागरिका घोष ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह पीएम मोदी का पूरी तरह बेतुका बयान है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाषा, पहचान और इतिहास को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूचबिहार में दिए गए बयान के बाद TMC ने तीखा पलटवार किया है. मुद्दा है-‘इश्तेहार’, लेकिन इसके बहाने अब बंगाल की अस्मिता पर सीधी राजनीतिक लड़ाई छिड़ गई है. पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में इस बार मुद्दा विकास या रोजगार नहीं, बल्कि एक शब्द बन गया है-‘इश्तेहार’. यह शब्द अब सिर्फ घोषणापत्र का पर्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बन चुका है. भाजपा ने इसे सीधे 1905 के बंगाल के विवादित इतिहास से जोड़कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) को घेरना शुरू कर दिया है. “PM मातृभाषा का सम्मान नहीं जानते”—कुणाल घोष का हमला बेलेघाटा सीट से TMC उम्मीदवार कुणाल घोष ने प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री को मातृभाषा में बोलना नहीं आता. अगर उन्हें हिंदी में भाषण देना नहीं आता, तो उनकी बात का कोई महत्व नहीं है. वह बंगाल का अपमान कर रहे हैं. वह पूरी तरह बंगाली भाषा का अपमान कर रहे हैं. यह सही नहीं है. वह हद पार कर रहे हैं.” PM मोदी का आरोप-“तुष्टिकरण के खेल में मिट रही बंगाल की पहचान” कूचबिहार की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने TMC के घोषणापत्र पर सवाल उठाते हुए बड़ा आरोप लगाया. उन्होंने कहा- “तुष्टिकरण के इस खेल में बंगाल की महान पहचान को धूमिल किया जा रहा है. आपने देखा होगा कि TMC ने अभी अपना घोषणापत्र जारी किया है, लेकिन उसे बंगाली भाषा में नाम नहीं दिया गया, बल्कि ‘इश्तेहार’ कहा जा रहा है. जरा सोचिए, कैसे बंगाल की पहचान बदली जा रही है.” प्रधानमंत्री ने ‘इश्तेहार’ शब्द को इतिहास से जोड़ते हुए और भी गंभीर आरोप लगाए-“1905 में बंगाल में धार्मिक ताकतों ने ‘रेड इश्तेहार’ जारी किया था, जिसके बाद हिंदुओं का नरसंहार हुआ. TMC हमें उसी की याद दिलाना चाहती है… ऐसा घिनौना तुष्टिकरण का खेल, बंगाल के सम्मान और संस्कृति को मिटाने की साजिश है.” उन्होंने जनता से अपील की कि अब “बहुत हो चुका” और बंगाल को अपनी पहचान बचाने के लिए फैसला लेना होगा. ‘इश्तेहार’ पर सियासी संग्राम-विपक्ष का पलटवार प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद विपक्ष ने इसे “भ्रामक और गैर-जरूरी” बताया. TMC सांसद सागरिका घोष ने सोशल मीडिया पर लिखा- “यह पीएम मोदी का पूरी तरह बेतुका बयान है. ‘इश्तेहार’ सिर्फ ‘मेनिफेस्टो’ का बंगाली शब्द है. एक सामान्य शब्द जो कई भाषाओं में इस्तेमाल होता है. यह राजनीति नहीं है-यह बौद्धिक दिवालियापन और अज्ञानता का प्रदर्शन है. यह मूर्खतापूर्ण, खतरनाक और भ्रमित करने वाला है.” वहीं, कीर्ति आजाद ने भी इसी मुद्दे पर पीएम को घेरा और कहा- “मैं आपको ‘सपना सपना’ पेश करता हूं. पीएम मोदी का एक अशिक्षित और बेतुका बयान है. यह राजनीति नहीं है.यह बौद्धिक दिवालियापन और अज्ञानता का प्रदर्शन है. यह मूर्खतापूर्ण, खतरनाक और भ्रमित करने वाला है.” BJP का वार-“शब्द नहीं, संकेत है” भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि ‘इश्तेहार’ का इस्तेमाल यूं ही नहीं किया गया. उनके मुताबिक यह शब्द इतिहास की एक संवेदनशील घटना की याद दिलाता है. उन्होंने सवाल किया, “टीएमसी को साफ करना चाहिए कि उसने अपने घोषणा पत्र के लिए ‘इश्तेहार’ शब्द क्यों चुना? क्या यह बांग्ला का मूल शब्द है? यह तो फारसी से आया हुआ शब्द है, जिसका इस्तेमाल उर्दू में ज्यादा होता है.” BJP ने दावा किया कि 1905 में ढाका के नवाब के दौर में इसी शब्द का इस्तेमाल ऐसे पर्चों के लिए हुआ था, जिनका मकसद समाज को बांटना और एक समुदाय के खिलाफ माहौल बनाना था. 1905 का संदर्भ—इतिहास से वर्तमान तक अगर इतिहास पर नजर डालें तो 1905 से 1907 के बीच का दौर बंगाल के लिए बेहद उथल-पुथल भरा था. लॉर्ड कर्जन के बंगाल विभाजन के बाद ‘स्वदेशी आंदोलन’ और ‘वंदे मातरम’ की लहर तेज हो चुकी थी. इसी समय ‘लाल इश्तेहार’ नाम का एक पर्चा सामने आया, जिसे इब्राहिम खान ने लिखा था. यह दस्तावेज ढाका के नवाब के प्रभाव वाले इलाकों में बांटा गया था. इतिहासकारों के मुताबिक, इस पर्चे का मकसद मुस्लिम समाज को स्वदेशी आंदोलन और हिंदुओं के खिलाफ लामबंद करना था. भाजपा अब इसी ऐतिहासिक संदर्भ को आज की राजनीति से जोड़ रही है. भाषा बनाम राजनीति, चुनाव से पहले बढ़ी गर्मी बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद महज शब्दों का नहीं रह गया है. ‘इश्तेहार’ को लेकर छिड़ी बहस अब भाषा, इतिहास और पहचान की राजनीति में बदल चुकी है. एक तरफ भाजपा इसे “तुष्टिकरण और सांस्कृतिक बदलाव” का मुद्दा बना रही है, तो दूसरी तरफ TMC इसे “बंगाली अस्मिता और भाषा के सम्मान” से जोड़कर पेश कर रही है.
शाह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक गढ़ में शक्ति प्रदर्शन के दौरान पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अधिकारी के साथ मौजूद रहेंगे. West Bengal में 2026 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। राजधानी Kolkata की हाई-प्रोफाइल भवानीपुर सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इस सीट से नेता प्रतिपक्ष Suvendu Adhikari के नामांकन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah खुद मौजूद रहेंगे और रोड शो में भी हिस्सा लेंगे। भाजपा नेताओं के मुताबिक, यह रोड शो हाजरा क्रॉसिंग से शुरू होकर भवानीपुर के कई इलाकों से गुजरेगा और ‘सर्वे बिल्डिंग’ तक पहुंचेगा, जहां शुभेंदु अधिकारी अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। बताया जा रहा है कि काफिला बिल्डिंग से कुछ दूरी पहले रुक जाएगा, जिसके बाद अमित शाह और अधिकारी पैदल चलते हुए नामांकन स्थल तक जाएंगे। भवानीपुर सीट को मुख्यमंत्री Mamata Banerjee का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। ऐसे में भाजपा इस सीट पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। शाह की मौजूदगी को पार्टी के लिए एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है। इस रोड शो में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष Samik Bhattacharya भी शामिल होंगे। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस आयोजन के जरिए कार्यकर्ताओं में जोश भरने और मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति बनाई गई है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री Narendra Modi के भी भवानीपुर में चुनाव प्रचार करने की संभावना जताई जा रही है। अमित शाह देर रात कोलकाता पहुंचे, जिससे साफ संकेत मिलता है कि भाजपा इस सीट को लेकर पूरी तरह गंभीर है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भवानीपुर सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है, क्योंकि यह सिर्फ एक सीट नहीं बल्कि प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है। आने वाले दिनों में यहां और भी बड़े नेताओं के दौरे देखने को मिल सकते हैं।
केरल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है, जब प्रधानमंत्री Narendra Modi ने Thrissur में एक भव्य रोड शो कर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। इस रोड शो की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी साफ तौर पर देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री ने खुद इस रोड शो की झलकियां साझा करते हुए लोगों का आभार व्यक्त किया और इसे “अविस्मरणीय” बताया। उनके इस संदेश ने साफ कर दिया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस बार केरल में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। 🔸 रोड शो में उमड़ा जनसैलाब Thrissur की सड़कों पर प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत के लिए हजारों लोग जुटे। हर तरफ पार्टी के झंडे, पोस्टर और नारों की गूंज सुनाई दे रही थी। लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला, खासकर युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के बीच। रोड शो के दौरान प्रधानमंत्री का काफिला धीरे-धीरे आगे बढ़ा, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों का अभिवादन कर सकें। लोग सड़क के दोनों ओर खड़े होकर उनका स्वागत कर रहे थे, वहीं कई जगहों पर फूलों की वर्षा भी की गई। यह रोड शो केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि BJP अब केरल जैसे राज्य में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है। 🔸 सोशल मीडिया पर छाया रोड शो प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर इस रोड शो के वीडियो और तस्वीरें साझा कीं। उन्होंने लिखा कि यह अनुभव उनके लिए बेहद खास और यादगार रहा। इस पोस्ट के सामने आते ही लाखों लोगों ने इसे लाइक और शेयर किया। ट्विटर (अब X) पर यह पोस्ट तेजी से ट्रेंड करने लगी। इससे साफ जाहिर होता है कि यह रोड शो सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी काफी सफल रहा। 🔸 केरल में BJP की रणनीति केरल पारंपरिक रूप से Bharatiya Janata Party के लिए चुनौतीपूर्ण राज्य रहा है, जहां मुख्य मुकाबला वामपंथी दलों और कांग्रेस के बीच होता रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में BJP ने यहां अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री का यह रोड शो भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। Thrissur को खास तौर पर इसलिए चुना गया क्योंकि यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जाता है। BJP का लक्ष्य इस बार केरल में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाना और राज्य की राजनीति में एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में उभरना है। 🔸 चुनावी संकेत और राजनीतिक संदेश इस रोड शो के जरिए प्रधानमंत्री मोदी ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि BJP अब केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत में भी अपनी जड़ें मजबूत कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बड़े रोड शो मतदाताओं पर सीधा प्रभाव डालते हैं और पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरते हैं। इसके अलावा, यह रोड शो विपक्षी दलों के लिए भी एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि BJP अब केरल में भी गंभीरता से चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। 🔸 जनता की प्रतिक्रिया रोड शो के दौरान लोगों की भारी भीड़ यह संकेत देती है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता अभी भी बरकरार है। खासकर युवा वर्ग में उनका क्रेज साफ नजर आया। कई लोगों ने इसे “ऐतिहासिक” बताया, वहीं कुछ ने इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा माना। हालांकि, इसमें कोई शक नहीं कि इस आयोजन ने केरल की राजनीति में नई ऊर्जा भर दी है। തൃശ്ശൂർ, നന്ദി! ഇന്നലെ നടന്ന റോഡ് ഷോ മറക്കാനാവാത്തതായിരുന്നു. ഇതാ പ്രധാന ഹൈലൈറ്റുകൾ… pic.twitter.com/DAiMyO1JLT — Narendra Modi (@narendramodi) March 30, 2026
उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर 'दलबदल' की बयार तेज हो गई है. नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित एक बड़े शक्ति प्रदर्शन के दौरान भाजपा और निर्दलीय खेमे के कई दिग्गज चेहरों ने कांग्रेस का 'हाथ' थाम लिया. कांग्रेस पार्टी में बड़ी राजनीतिक जॉइनिंग देखने को मिली, जहां कांग्रेस मुख्यालय नई दिल्ली में आयोजित प्रेस वार्ता के बाद कई नेताओं ने पार्टी की सदस्यत ग्रहण की. उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी ने प्रेस वार्ता को संबोधित किया, जिसके बाद सदस्यता कार्यक्रम आयोजित हुआ. इस दौरान रुद्रपुर से 2 बार के विधायक राजकुमार ठुकराल, भीमताल से चर्चित चेहरा लखन सिंह, घनसाली से भाजपा विधायक रहे भीम लाल आर्य, मसूरी के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष अनुज गुप्ता और सितारगंज से 2 बार के विधायक नारायण पाल ने कांग्रेस का दामन थामा. वहीं, भाजपा से रुड़की के पूर्व मेयर गौरव गौयल भी कांग्रेस में शामिल हुए. कार्यक्रम में उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी ने सभी नेताओं को पटका पहनाकर सदस्यता दिलाई. इस मौके पर CWC सदस्यों समेत उत्तराखंड कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहे पूर्व सीएम हरीश रावत क्यों हैं नाराज़? इसके साथ ही सूत्र यह भी बताते हैं कि एक व्यक्ति के कांग्रेस में शामिल न होने से नाराज हैं और उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से अपनी नाराजगी भी जाहिर की है. बताया जा रहा है कि रामनगर से निर्दलीय विधायक का चुनाव लड़ चुके संजय नेगी कांग्रेस में शामिल होते-होते रह गए, जिन्हें हरीश रावत का करीबी माना जाता है. BJP अध्यक्ष ने क्या कहा? उधर, उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस अब चार लोगों की पार्टी बनकर रह गई उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि चाहे देहरादून में ज्वाइनिंग हो या दिल्ली में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस पहले आरोप लगाती थी कि भाजपा के पास लोग नहीं हैं और कांग्रेस के नेताओं को मंत्री बनाया गया, लेकिन अब वही कांग्रेस भाजपा से निकले नेताओं को दिल्ली में सदस्य बना रही है महेंद्र भट्ट ने यह भी कहा, "हमारा निकाला हुआ माल कांग्रेस ले रही है तो हम क्या कर सकते हैं?"
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए AIADMK और बीजेपी के बीच जो समझौता हुआ है, बीजेपी की कई मांगें नहीं मानी गई हैं. तमिलनाडु के दोनों गठबंधनों में एक बात कॉमन जरूर देखने को मिल रही है - डीएमके हो या AIADMK राष्ट्रीय दलों के साथ व्यवहार एक जैसा ही कर रहे हैं. तमिलनाडु में AIADMK और बीजेपी के बीच सीटों का बंटवारा आखिरकार फाइनल हो गया. सीटों के बंटवारे में यह देखना भी दिलचस्प है कि बीजेपी को भी AIADMK नेता ई. पलानीस्वामी ने चुनावी गठबंधन में लगभग उतनी ही सीटें दी हैं, जितनी डीएमके नेता एमके स्टालिन ने सत्ताधारी गठबंधन में कांग्रेस के लिए छोड़ी है. मुद्दे की बात यह भी है कि बीजेपी को गठबंधन में पसंद की सीटों पर समझौता करना पड़ा है. क्योंकि, ई. पलानीस्वामी अपने रुख पर वैसे ही कायम रहे, जैसे चुनाव जीतने पर सत्ता में हिस्सेदारी से पहले ही मना कर चुके हैं. बीजेपी ही नहीं, ई. पलानीस्वामी दूसरे सहयोगी दलों की मांगों के भी खिलाफ नजर आए, और गठबंधन में सहयोगियों को ऐसी सीटें दीं जो उनके लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण मानी जा रही हैं. बीजेपी को कोयंबटूर की भी सीट नहीं मिल पाई है, जिसमें ई. पलानीस्वामी की बीजेपी नेता के. अन्नामलाई से पुरानी चिढ़ समझ में आ रही है. अन्नामलाई की राजनीति शुरू से ही आक्रामक रही है, और AIADMK नेतृत्व को यह बात बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं हो पाती है - बेशक ई. पलानीस्वामी बीजेपी के साथ गठबंधन को अमली जामा पहना दिया है, लेकिन सब कुछ वैसा ही किया है जैसा वो चाहते थे. तमिलनाडु में ऐसे हुआ सीटों का बंटवारा 24-25 मार्च को अंतिम रूप दिए गए समझौते के मुताबिक, गठबंधन में AIADMK ने तमिलनाडु की 234 सीटों में से 169 सीटें अपने पास रखी हैं. एनडीए के सात सहयोगी दलों को सीटों के बंटवारे में 65 सीटें दी गई हैं, जिनमें बीजेपी के हिस्से में 27 सीटें आई हैं. गठबंधन में शामिल तमिलनाडु के बाकी राजनीतिक दलों में पट्टाली मक्कल काची (PMK) को 18 और अम्मा मक्कल मुनेत्र कझगम (AMMK) को 11 सीटें मिली हैं. तमिलनाडु के चुनावी गठबंधन एक खास राजनीतिक पैटर्न की तरफ इशारा करता है. कोई भी गठबंधन वैसे भी मजबूरी का समझौता ही होता है. जिस पक्ष का दबदबा ज्यादा होता है, मनमानी खुलकर करता है. यूपी और बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक ये सब देखने को मिलता रहा है. बीजेपी और AIADMK के बीच हुए गठबंधन पर प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की की रिपोर्ट में बताया गया है कि दबाव कोई एकतरफा नहीं था. दबाव दिल्ली की तरफ से भी था, और क्षेत्रीय पार्टी AIADMK की तरफ से भी. बल्कि दोनों ने काफी मोलभाव किया. जो जहां भारी पड़ा अपनी बात मनवा ली. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में AIADMK के एक नेता का कहना है, यह ऐसा समझौता है, जहां गठबंधन जरूरी था. लेकिन, शर्तें नहीं छोड़ी गईं. AIADMK नेता ने बताया है, दिल्ली से एक सीनियर नेता के लिए कोयंबटूर की सीट को लेकर विशेष अनुरोध भी था, लेकिन ऐसा करना मुश्किल था. AIADMK नेता ने महत्वपूर्ण बात और कही है, गठबंधन शायद टाला नहीं जा सकता था, लेकिन इसकी रूपरेखा चेन्नई में ही तैयार हुई है. एक खास बात जो समझ आती है, रिपोर्ट के अनुसार, सीटों का बंटवारा एक व्यापक राजनीतिक पैटर्न की तरफ इशारा करता है. हो सकता है, गठबंधन दिल्ली के दबाव में हुआ हो, लेकिन सीट बंटवारे में AIADMK नेतृत्व ने अपनी चलाई है. गठबंधन हुआ, लेकिन अन्नामलाई पर रुख नहीं बदला तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई को AIADMK नेतृत्व बीजेपी के साथ गठबंधन के रास्ते का कांटा मानकर चल रहा था, और सीटों के बंटवारे के बाद भी मामला खत्म नहीं हो सका है. बीजेपी अपने लिए सिंगनल्लूर विधानसभा सीट सहित कोयंबटूर की तीन सीटें चाहती थी, लेकिन ई. पलानीस्वामी उसके लिए तैयार नहीं हुए. के. अन्नामलाई, 2024 के आम चुनाव में बीजेपी के टिकट पर कोयंबटूर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में थे. अन्नामलाई को करीब 4.5 लाख वोट भी मिले थे, लेकिन 11,788 वोटों से डीएमके उम्मीदवार से चुनाव हार गए थे. बाद में, अप्रैल 2025 में बीजेपी ने तमिलनाडु की कमान एन. नागेंद्रन को सौंप दी थी. बीजेपी का इस फैसले में AIADMK नेतृत्व के दबाव माना गया था. बीजेपी की तरफ से सिंगनल्लूर के साथ साथ सुलूर और कवुंडमपलायम विधानसभा सीटों की मांग भी की गई थी, लेकिन ई. पलानीस्वामी सिर्फ एक और वह भी कोयंबटूर नॉर्थ सीट के लिए ही राजी हुए. चेन्नई में भी बीजेपी कम से कम तीन सीटें चाहती थी, लेकिन मायलापुर की सिर्फ एक ही सीट मिल पाई. दिल्ली के साथ चेन्नई का व्यवहार एक जैसा तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मुख्य लड़ाई तो दो गठबंधनों के बीच ही है. केंद्र में सत्ताधारी एनडीए और तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA). दोनों गठबंधनों के बीच अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी टीवीके भी मैदान में कूद पड़ी है. डीएमके नेता एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले एसपीए में 19 राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं, और एनडीए में 16 जिसका नेतृत्व राज्य स्तर पर EPS के नाम से मशहूर AIADMK नेता ई.पलानीस्वामी कर रहे हैं. AIADMK-बीजेपी गठबंधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में एक कॉमन चीज यह नजर आती है कि राष्ट्रीय पार्टियों को तमिलनाडु के नेता एक ही नजर से देखते हैं. बिल्कुल बराबर. और, यह बात दोनों गठबंधनों को ध्यान से देखने पर मालूम होता है. बीजेपी को AIADMK ने गठबंधन में 27 सीटें दी हैं. बिल्कुल वैसे ही एमके स्टालिन ने डीएमके के पास 165 सीटें रखी हैं - और कांग्रेस को SPA में 28 सीटें मिली हैं. मतलब, बीजेपी और कांग्रेस दोनों को तमिलनाडु में बराबरी का ट्रीटमेंट मिल रहा है - और तमिलनाडु में दोनों गठबंधनों के आपसी मुकाबले के अलावा एक अलग लड़ाई तो बीजेपी और कांग्रेस के बीच भी होनी है
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र के दूसरे चरण में पीडीपी के 'जम्मू कश्मीर टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेटिव रीऑर्गेनाइजेशन बिल, 2026' को पेश करने की मंजूरी मिल गई है। यह बिल जम्मू प्रांत को चिनाब, पीर पंजाल और जम्मू में तीन संभागों में विभाजित करने और पूरे प्रदेश में 13 नए जिले बनाने का प्रस्ताव करता है। राज्य ब्यूरो, जम्मू। जम्मू-कश्मीर विधानसभा बजट सत्र-2026 के दूसरे चरण में जम्मू संभाग को तीन संभागों में विभाजित करने और प्रदेश में नए जिलों के गठन संबंधी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के बिल जम्मू कश्मीर टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेटिव रीआर्गेनाइजेशन बिल, 2026 को सदन में पेश करने की मंजूरी दे दी है। बजट सत्र का दूसरा चरण 27 अप्रैल शुक्रवार को शुरु हो रहा है। प्रस्तावित बिल में जम्मू प्रांत को तीन संभागों चिनाब, पीर पंजाल और जम्मू में पुनर्गठित करने और पूरे जम्मू-कश्मीर में 13 नए जिले बनाए जाने पर जोर दिया गया है। यह बिल पीडीपी विधायक वहीद उर रहमान परा ने लाया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 36 की उपधारा (1) के तहत जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जम्मू-कश्मीर टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेटिव रीऑर्गेनाइज़ेशन बिल, 2026 को पेश करने को मंजूरी दे दी है। प्रस्तावित बिल में जम्मू प्रांत जिसे जम्मू डिवीजन भी कहते हैं, को तीन डीविजनों में पुनर्गठित करने की बात की गई है। विधानसभा में पेश होने वाला बिल रामबन-डोडा-किश्तवाड़ को डोडा मुख्यालय के साथ चिनाब संभाग का दर्जा देने की मांग की गई है और राजौरी-पुंछ को राजौरी मुख्यालय के साथ पीर पंंजाल संभाग घेाषित करने पर जोर दिया गया है। अगर यह बिल मंजूर होता है तो जम्मू प्रांत में सिर्फ पांच सांबा, कठुआ, रियासी और उधमपुर रह जाएंगे। मौजूदा समय में जम्मू-कश्मीर में दो संभाग-दो डिवीजन जम्मू और कश्मीर हैं। दोनों ही संभागों में 10-10 जिले हैं। पीडीपी ने अपने बिल में कश्मीर संभाग के पुनर्गठन पर जोर नहीं दिया है, लेकिन नए जिलों के गठन की बात की है। पीडीपी ने प्रस्तावित बिल में मौजूदा पुलवामा जिले के त्राल-अवंतीपोर, जिला अनंतनाग में अशमुकाम, जिला बडगाम में बीरवाह, उत्तरी कश्मीर के जिला बारामुला मेें सोपोर, जिला कुपवाड़ा में हंदवाड़ा, बाडीपोर में गुरेज और कुपवाड़ा में टंगडार-करनाह समेत सात पहाड़ी जिलाें के गठन पर जोर दिया है। बिल में रखे गए सुझाव जम्मू संभाग में जिला राजौरी के अंतर्गत नौशहरा, जिला डोडा में भद्रवाह, जिला रामबन में बनिहाल, जिला जम्मू में अखनूर, जिला कठुआ में बिलावर, जिला राजौरी में कोटरंका और जिला मुंछ में मेंढर को जिला बनाने पर जोर दिया है। प्रस्तावित बिल में कहा गया है कि जम्मू कश्मीर सरकार को जम्मू, कश्मीर, चिनाब और पीर पंजाल डीविजन को गठित करते हुए इनमें इनमें जिलों के बंटावारे को अधिसूचित करने का पूरा अधिकार होगा। पीडीपी के अनुसार, इन नयी प्रशासनिक इकाइर्याें के गठन से सभी क्षेत्रों में प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त होगी और सभी का एक समान समग्र विकास भी सुनिश्चित होता। पीडीपी के अनुसार, कई जिलों को क्षेत्रफल अधिक है और उनकी भौगोलिक परिस्थितियां जटिल होने के अलावा वह विकास के मामले में भी पीछे हैं। नयी प्रशासनिक इकाइयों से उनका समग्री विकास होगा। आपको बता दें कि जम्मू कश्मीर विधानसभा का बजट सत्र-2026 का दूसरा चरण शुक्रवार 27 मार्च को फिर से शुरु हो रहा है। यह सत्र चार अप्रैल तक चलेगा। सत्र का पहला चरण दो फरवरी से 20 फरवरी 2026 तक जारी रहा था। दूसरे चरण में 30 मार्च और पहली अप्रैल को निजी सदस्य बिलों पर जबकि31 मार्च और दो अप्रैल निजी सदस्य प्रस्तावों पर चर्चा होगी।
चुनाव आयोग ने असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और बंगाल विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद आदर्श आचार संहिता (MCC) के सख्त निर्देश जारी किए हैं। चुनाव आयोग ने असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और बंगाल विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) के सख्त क्रियान्वयन के निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने बताया कि 5,173 से अधिक उड़न दस्ते और 5,200 से अधिक स्थिर निगरानी टीमों (एसएसटी) को राज्यों/केंद्र शासित क्षेत्रों में तैनात किया गया है ताकि शिकायतों का समाधान 100 मिनट के भीतर किया जा सके। एक दिन पहले आयोग ने इन राज्यों व केंद्र शासित क्षेत्र में विधानसभा चुनावों के लिए कार्यक्रम की घोषणा की थी। आयोग ने छह अन्य राज्यों में भी आचार संहिता लागू करने के निर्देश दिए हैं, जहां इसी अवधि के दौरान आठ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होंगे। एमसीसी चुनावी राज्यों में केंद्र सरकार पर भी लागू होगा होगा यानी वह इनसे संबंधित घोषणाएं या नीतिगत फैसले नहीं ले पाएगी। चुनाव एलान के साथ ही विधायक-सांसदों के निधि जारी करने पर रोक लग गई है। चुनाव आयोग ने केंद्रीय मंत्रिमंडल सचिव और मुख्य सचिवों को लिखे पत्रों में चुनाव आचार संहिता के प्रविधानों को तुरंत प्रभाव से लागू करने को कहा है, जिसमें निजी और सार्वजनिक संपत्ति को विरूपित होने से रोकना, सार्वजनिक स्थानों का दुरुपयोग रोकना, सरकारी वाहनों का दुरुपयोग रोकना, सरकारी खर्चे पर विज्ञापन देना रोकना और सरकारी वेबसाइटों से राजनीतिक पदाधिकारियों की तस्वीरें हटाने के निर्देश शामिल हैं। चुनाव एलान के साथ ही विधायक-सांसदों के निधि जारी करने पर रोक चुनावी राज्यों में 5,200 से अधिक स्थिर निगरानी टीमें तैनात की गई आयोग ने कहा कि जिला स्तर पर 24 घंटे नियंत्रण कक्ष को तुरंत सक्रिय किया जाए जिसमें जिला निर्वाचन अधिकारी और मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा पर्याप्त स्टाफ सुनिश्चित किया जाए। आयोग ने यह भी निर्देश दिया कि मंत्रीगण अपनी आधिकारिक यात्राओं को चुनाव प्रचार से न जोड़ें और सरकारी मशीनरी का उपयोग चुनाव संबंधी गतिविधियों के लिए न करें। आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को चुनाव प्रक्रिया के दौरान उनकी जिम्मेदारियों की याद दिलाई। पार्टियों को सार्वजनिक बैठकों और जुलूसों के संबंध में पुलिस अधिकारियों को पूर्व में सूचित करना चाहिए ताकि यातायात प्रबंधन के लिए उचित व्यवस्था की जा सके। क्या है आदर्श आचार संहिता? आदर्श आचार संहिता के तहत वह नियम आते हैं जिसे चुनाव आयोग चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए गाइडलाइन के तौर पर जारी करता है। इसका उद्देश्य स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करना है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह राजनीतिक दलों एवं प्रत्याशियों के लिए बनाई गई एक नियमावली है जिसका पालन चुनाव के समय आवश्यक रूप से करना होता है। आचार संहिता चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद से लागू हो जाती है और चुनावी प्रक्रिया समाप्त होने तक लागू रहती है। एमसीसी लागू होने के बाद क्या होता है? धर्म, जाति या सांप्रदायिक भावनाओं के आधार पर कोई अपील नहीं की जा सकती। विरोधी की आलोचना केवल नीतियों, प्रदर्शन और कार्यक्रमों पर केंद्रित होनी चाहिए न कि उसके निजी जीवन पर। सरकारी जनसंचार माध्यमों का उपयोग सत्ताधारी दल के पक्ष में पक्षपातपूर्ण कवरेज के लिए नहीं किया जा सकता। मतदान केंद्रों के पास प्रलोभन देना, डराना-धमकाना, प्रचार करना जैसी अवैध गतिविधियां प्रतिबंधित होती हैं। निजी भवनों के बाहर प्रदर्शन करना या प्रचार के लिए किसी और की संपत्ति का उपयोग करना प्रतिबंधित है। दलों को बैठकों और जुलूसों के बारे में अधिकारियों को सूचित करना होगा। पहले से तय मार्गों, समय और शुरू/समाप्ति बिंदुओं का पालन करना होगा। दलों को अन्य जुलूसों के साथ टकराव से बचना होगा। लाउडस्पीकर या सभाओं के लिए अनुमति प्राप्त करनी होगी। शांति बनाए रखने और यातायात प्रबंधन के लिए पुलिस के निर्देशों का पालन करना होगा। दलों और उम्मीदवारों को मतदान के दौरान चुनाव अधिकारियों के साथ सहयोग करना होगा। मतदान केंद्रों के पास कोई शराब या भीड़भाड़ नहीं होनी चाहिए। सरकारें प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी, धन या पदों का उपयोग नहीं कर सकतीं। किसी भी तरह के वित्तीय अनुदान, नई परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे से जुड़े वादों या तदर्थ नियुक्तियों की कोई घोषणा नहीं की जाएगी, जोकि मतदाताओं को प्रभावित करती हो।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दमोह जिले के हटा में महिला सशक्तिकरण सम्मेलन में ₹405.58 करोड़ के विकास कार्यों का भूमिपूजन किया. उन्होंने एचपीवी वैक्सीन लगवाने वाली बेटियों को प्रमाण पत्र दिए. मुख्यमंत्री मोहन यादव मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दमोह जिले के हटा में आयोजित ‘महिला सशक्तिकरण सम्मेलन’ में सहभागिता कर ₹405.58 करोड़ से अधिक लागत के 13 विकास कार्यों का भूमिपूजन किया. इसके साथ ही आज के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने एचपीवी वैक्सीन का टीका लगवाने वाली हटा की 8 बेटियों को मंच से प्रमाण पत्र भी सौंपे. मुख्यमंत्री ने पात्र हितग्राहियों को हितलाभ भी वितरित किए. नारी सदैव पूजनीय हैं- सीएम मोहन यादव मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि जहां बेटियां जन्म से लेकर आजीवन पूजी जाती हैं, वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना मध्यप्रदेश ही है. नारी सदैव पूजनीय हैं. हम अपने देश को भी जननी मानकर भारत माता की जय कहकर पूजते हैं. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार बेटियों और महिलाओं के समग्र विकास के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है. सरकार की योजनाएं महिलाओं के जीवन में हर कदम पर पक्की सहेली बनकर उनके साथ खड़ी हैं.मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि विरासत से विकास के मूल मंत्र को अपनाते हुए प्रदेश में उल्लेखनीय कार्य किए जा रहे हैं. विगत वर्ष बुंदेलखंड क्षेत्र के वैश्विक पर्यटन स्थल खजुराहो में स्टेट कैबिनेट की मीटिंग कर सरकार ने 27 हजार 500 करोड़ रूपए से अधिक के विकास कार्यों को मंजूरी दी. 'हटा' अब बनेगा शिवकाशी- सीएम मोहन यादव मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने हटावासियों की बहुप्रतीक्षित मांग पूरी करते हुए हटा का नाम बदलकर इसे शिवकाशी नाम देने की घोषणा की. उन्होंने कहा कि हटा श्री श्री 1008 देवश्री गौरीशंकर की नगरी है, इसलिए अब इसे शिवकाशी के रूप में ही जाना जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने हटावासियों को और भी कई सौगातें दीं. उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि हटा में नवीन आईटीआई भवन बनाया जाएगा. हटा में सर्वसुविधायुक्त नवीन नगर पालिका भवन एवं भव्य गीता भवन भी निर्मित किया जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र में कार्य का दायदा बहुत विस्तृत है, इसलिए हटा के महाविद्यालय में अब कृषि, उद्यानिकी एवं पशुपालन संकाय/विषय भी पढ़ाये जाएंगे. मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि विनती-मड़ियादौ-चौरईया मार्ग का चौड़ीकरण कराया जाएगा. हटा के शासकीय पीएमश्री महारानी लक्ष्मीबाई स्कूल में इंडोर ऑडिटोरियम बनाया जाएगा. दमोह में होगा औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार- सीएम मोहन मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पटेरा में नया महाविद्यालय खोले जाने की घोषणा करते हुए कहा कि मड़ियादो एवं देवरी फतेहपुर में नया हायर सेकेण्डरी भवन बनाया जाएगा. इसी प्रकार नगर परिषद तेंदूखेड़ा में तारादेही तिराहे से चौरई तक मार्ग चौड़ीकरण एवं सौन्दर्यीकरण कार्य कराए जाएंगे. नगर परिषद तेंदूखेड़ा में वार्ड क्रमांक 3 में सी.सी. रोड निर्माण कराया जाएगा. गहरा से चौपरा-सिमरी तक मार्ग का चौड़ीकरण किया जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि दमोह जिले में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार किया जाएगा
बिहार विधानसभा चुनाव नतीजे आने के तकरीबन चार महीने के बाद राजनीतिक दलों ने अपने खर्च का लेखा-जोखा चुनाव आयोग को सौंपा है. बीजेपी ने बिहार में सबसे ज्यादा पैसा खर्च किया है तो कांग्रेस ने बीजेपी की तुलना में भले ही कम खर्च किया हो, लेकिन अपनी जमापूंजी का बड़ा हिस्सा लगा दिया है. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जीतने के लिए बीजेपी ने सभी पार्टियों से ज्यादा खर्च किया है. बीजेपी ने 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं तो कांग्रेस ने कुल 35.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. बीजेपी ने जमा पूंजी का 2 फीसदी खर्च किया तो कांग्रेस ने अपनी कुल जमा पूंजी का 28 फीसदी पैसा खर्च कर दिया है. बीजेपी ने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार तीन से ज्यादा पैसा चुनाव प्रचार पर खत्म किया है. 2020 में बीजेपी ने करीब 54 करोड़ रुपये खर्च किए थे, लेकिन इस बार 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. बिहार में बीजेपी का खर्च करना इस बार कामयाब रहा और राज्य में 89 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस ने बीजेपी की तुलना में भले ही पैसा कम खर्च किया हो, लेकिन अपनी जमा पूजी का बहुत बड़ा हिस्सा बिहार में खर्च कर दिया है बिहार चुनाव में किस पार्टी ने कितना खर्च किया चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बाद अपने खर्च की हिसाब देती हैं. इसी मद्देनज बिहार चुनाव में खर्च किए पैसे का लेखा-जोखा सियासी दलों ने चुनाव आयोग को दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने बिहार चुनाव खर्च की रिपोर्ट 10 फरवरी को चुनाव आयोग को सौंपी है, जिसमें पार्टी ने बताया है कि उसने 146.71 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. वहीं, बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 35 करोड़ रुपये खर्च किए हैं तो सीपीआई (एम) ने महज 26.75 लाख रुपये खर्च किए हैं. बहुजन समाज पार्टी ने बिहार चुनाव में सिर्फ 9.01 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. आरजेडी और जेडीयू सहित दूसरे दलों के खर्च का लेखा-जोखा अभी चुनाव आयोग को उपलब्ध नहीं कराया गया है , जिसके चलते उन्होंने कितना खर्च किया है, उसका आंकड़ा पता नहीं चल सका. बीजेपी और कांग्रेस ने कहां कितना पैसा खर्च किया बिहार चुनाव में बीजेपी ने 146 करोड़ रुपये जो खर्च किए हैं, उसमें 117 करोड़ रुपये सियासी माहौल बनाने के लिए प्रचार और स्टार कैंपेनर के ट्रैवेल पर खर्च किए हैं. बीजेपी ने चुनाव प्रचार और विज्ञापन पर 43.53 करोड़ रुपये खर्च किए तो स्टार कैंपेनर्स की यात्रा पर 37.28 करोड़ रुपये खर्च किए और साथ में दूसरे नेताओं के यात्रा पर 4.44 करोड़ रुपये खर्च किए गए. बीजेपी ने चुनाव प्रचार के विज्ञापन पर खर्च किए हैं, जिसमें पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए आर्थिक मदद के तौर पर देखा जाता है. कांग्रेस ने बिहार चुनाव में खर्च किए गए 35 करोड़ रुपये में से 12.83 करोड़ रुपये स्टार कैंपेनर्स की यात्रा पर लगे. इसके अलावा कांग्रेस ने सोशल मीडिया कैंपने के लिए 11.24 करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अलावा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बिहार में निकाली गई वोटर अधिकार यात्रा पर भी खर्च किए बीजेपी ने जमापूंजी का 2% खर्चा तो कांग्रेस ने 28% रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले साल नवंबर में बिहार चुनाव खत्म होने पर बीजेपी का क्लोजिंग बैलेंस 7,088.58 करोड़ रुपये था. इसके मुताबिक चुनाव से पूर्व बीजेपी के पास 7235.26 करोड़ रुपये था, जिसमें से 146.71 करोड़ खर्च किया गया. इसके बाद 7,088.58 करोड रुपये बचे थे. इस तरह बीजेपी ने अपनी जमापूंजी का करीब 2 फीसदी पैसा ही बिहार चुनाव में खर्च किया है. वहीं, कांग्रेस के पास बिहार चुनाव के बाद कुल 89.13 करोड़ रुपये बचे थे. कांग्रेस ने चुनाव में 35.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. इस लिहाज से कांग्रेस के चुनाव से पहले 124.2 करोड़ रुपये था, जिसमें से 35.07 करोड़ रुपये खर्च करने का मतलब साफ है कि पार्टी ने अपनी जमापूंजी का 28.23 फीसदी पैसा बिहार चुनाव में खर्च किया. कांग्रेस-बीजेपी का एक विधायक पर कितना खर्च बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सबसे ज्यादा 89 विधायक जीतने में सफल रही जबकि कांग्रेस को महज 6 सीटें मिली हैं. बिहार चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के द्वारा खर्च किए गए पैसे को विधायकों की संख्या के लिहाज से देखें तो बीजेपी को एक विधायक 1 करोड़ 64 लाख का पड़ा. कांग्रेस के सिर्फ 6 विधायक जीते हैं,ऐसे में कांग्रेस को एक विधायक 5 करोड़ 83 लाख का पड़ा 2020 के चुनाव की तुलना में तीन गुना खर्च किया बिहार के पिछले यानी 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कुल 54.72 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जिसमें से लगभग 28.02 करोड़ रुपये बिहार राज्य इकाई द्वारा और 26.69 करोड़ रुपये केंद्रीय मुख्यालय द्वारा खर्च किए गए थे. बीजेपी इस चुनाव में सबसे अधिक खर्च करने वाली पार्टी थी. वहीं, 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 12.35 करोड़ रुपये खर्च किए थे, इसमें से बड़ा हिस्सा 11.69 करोड़ रुपये दिल्ली केंद्रीय मुख्यालय से आया था, जबकि राज्य इकाई का खर्च काफी कम दिखाया गया है. इस हिसाब से देखें तो इस बार कांग्रेस और बीजेपी तीन गुना पैसा चुनाव कैंपेन पर खर्च किया है.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों को लेकर हलचल तेज हो गई है. निर्वाचन आयोग की पूर्ण पीठ के साथ बैठक में बीजेपी सहित अधिकतर दलों ने चुनाव को केवल दो से तीन चरणों में कराने का सुझाव दिया है. भाजपा ने सुरक्षा और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए 17 सूत्री मांग पत्र सौंपा है चुनाव आयोग की टीम के पश्चिम बंगाल दौरे के बाद से राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है. इसी बीच जानकारी आ रही है कि राज्य में विधानसभा चुनाव तीन से दो चरण में कराए जा सकते हैं. इसको लेकर चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के साथ राजनीतिक दलों बैठक में बीजेपी समेत ज्यादातर दल इस सुझाव दिए गए हैं. बीजेपी ने स्पष्ट रूप से मांग की कि चुनाव अधिकतम तीन चरणों में ही संपन्न हो, ताकि केंद्रीय सुरक्षा बलों का बेहतर इस्तेमाल हो सके और मतदाताओं में विश्वास बना रहे. सुरक्षाबलों की निगरानी में हो वोटिंग-काउंटिंग ज्ञापन में कहा गया है कि वोटिंग और काउंटिंग दोनों ही केंद्रीय सुरक्षाबलों की निगरानी में होनी चाहिए राज्य पुलिस की मतदान केंद्र और काउंटिंग सेंटर पर कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. मतदान केंद्र पर वोटर की 2 बार जांच की जानी आवश्यक है. साथ ही मतदान कर्मियों यानी पोलिंग पार्टी में केंद्र व राज्य सरकार के कर्मचारियों का अनुपात 50:50 का रखने का सुझाव भी दिया गया है. मतगणना प्रक्रिया को भी केवल जिला और उप-मंडल मुख्यालयों में कराने पर बीजेपी ने जोर दिया है. पुलिस पर कम होगी निर्भरता बीजेपी ने अपने ज्ञापन में मांग की है कि पिछले तीन चुनावों में में हिंसा वाले बूथों और जहां 85 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है, उन्हें ‘संवेदनशील’ बूथ माना जाए. केंद्रीय बलों की तैनाती बहुत पहले होनी चाहिए, इससे उन्होंने इलाके को समझ में मदद मिलेगी. इससे उनकी स्थानीय पुलिस पर निर्भरता कम होगी. बीजेपी ने ये भी मांग की है कि केंद्रीय बलों के अधिकारियों को सख्त निर्देश हों कि वो स्थानीय लोगों से किसी भी तरह का आतिथ्य या खाना-पीना रहना स्वीकार न करें, ताकि तटस्थता बनी रहे. बीजेपी का कहना है कि पिछले चुनावों में बहु-चरणीय मतदान से हिंसा, धांधली और मतदाताओं पर दबाव की घटनाएं बढ़ीं. पार्टी ने पिछले चुनावों के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि कम चरणों में चुनाव से सुरक्षा बलों का प्रभावी उपयोग संभव होगा और चुनाव प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी.
MP Politics: विजयपुर उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा की जीत को चुनौती देते हुए भाजपा प्रत्याशी रामनिवास रावत ने हाईकोर्ट में इलेक्शन पिटिशन दायर की थी. जिस पर अदालत ने फैसला सुनाया है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ से एमपी कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा है, हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एमपी के श्योपुर जिले स्थित विजयपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा का चुनाव निरस्त कर दिया है. अदालत ने उनके निकटतम प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रामनिवास रावत को विजयी घोषित किया है. दरअसल, विजयपुर उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा की जीत को चुनौती देते हुए भाजपा प्रत्याशी रामनिवास रावत ने हाईकोर्ट में इलेक्शन पिटिशन दायर की थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि मुकेश मल्होत्रा ने नामांकन के दौरान दाखिल किए गए एफिडेविट में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की पूरी जानकारी नहीं दी थी. सुनवाई के बाद अदालत ने मुकेश मल्होत्रा का चुनाव किया निरस्त मामले की सुनवाई के बाद एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुकेश मल्होत्रा का चुनाव निरस्त करते हुए भाजपा के रामनिवास रावत को विजयपुर उपचुनाव में विजयी घोषित कर दिया. हालांकि, हाईकोर्ट फिलहाल मुकेश मल्होत्रा को 15 दिन का स्टे देने पर विचार कर रहा है. अगर स्टे दिया जाता है तो यह आदेश 15 दिन बाद प्रभावी होगा. बीजेपी नेता के अधिवक्ता ने क्या कहा? वहीं अदालत के फैसले पर बीजेपी के रामनिवास रावत के वकील एमपीएस रघुवंशी का बयान भी सामने आया है. हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के फैसले पर रामनिवास रावत के वकील एमपीएस रघुवंशी ने मीडिया से बातचीत में अहम जानकारी दी है. अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने कहा कि, उच्च न्यायालय बार-बार कह रहा है कि चुनाव लड़ने से पहले जनप्रतिनिधियों को नामांकन पत्र के साथ एक एफिडेविट चुनाव आयोग देना चाहिए. 'एफिडेविट में प्रत्याशी बताएगा क्रिमिनल हिस्ट्री' उन्होंने बताया कि, चुनाव आयोग को दिए गए एफिडेविट में प्रत्याशी जो चुनाव लड़ेगा वो अपनी आपराधिक हिस्ट्री बताएगा. उन्होंने बताया कि, कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा के द्वारा चार क्रिमिनल केस की जानकारी अपूर्ण दी गई, इसके साथ ही कुछ मामलों की जानकारी नहीं दी गई. उन्होंने बताया कि, एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुकेश मल्होत्रा का चुनाव निरस्त करते हुए भाजपा के रामनिवास रावत को विजयपुर उपचुनाव में विजयी घोषित कर दिया. हाईकोर्ट मुकेश मल्होत्रा को 15 दिन का स्टे देने पर विचार कर रहा है. अगर स्टे दिया जाता है तो यह आदेश 15 दिन बाद प्रभावी होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को शराबबंदी मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन की खातिर बुनियादी ढांचा तैयार करने में देरी पर बिहार सरकार के प्रति नाराजगी जताई। जस्टिस ने कहा कि आप विशेष अदालत के गठन के लिए सरकारी भवनों को क्यों नहीं खाली करा लेते हैं? नई दिल्ली, आइएएनएस। बिहार में शराबबंदी मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन की खातिर बुनियादी ढांचा तैयार करने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नाराजगी जताई। कहा कि जब तक बुनियादी ढांचा नहीं बन जाता, तब तक के लिए सभी आरोपितों को जमानत क्यों न दे दी जाए? जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि 2016 में बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम बनाया गया था। राज्य सरकार ने विशेष अदालतों के गठन के लिए अबतक जमीन का आवंटन तक नहीं किया है। पीठ ने राज्य सरकार के वकील से पूछा कि जब तक बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं कर लिया जाता, तब तक के लिए मद्यनिषेध कानून में गिरफ्तार सभी आरोपितों को जमानत पर रिहा क्यों न कर दिया जाए? आप विशेष अदालत के गठन के लिए सरकारी भवनों को क्यों नहीं खाली करा लेते हैं? लंबित मामलों से न्यायपालिका पर बढ़ता है बोझ- SC न्यायपालिका पर बोझ डालने वाले लंबित मामलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि कानून के तहत 3.78 लाख से अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, लेकिन केवल 4,000 से अधिक का ही निस्तारण किया गया है। यही समस्या है। आप न्यायिक ढांचे और समाज पर इसके प्रभाव को देखे बिना ही कानून पारित कर देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को एक हफ्ते का समय दिया अधिनियम की एक धारा का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि जहां तक शराब के सेवन के लिए जुर्माना लगाने का प्रावधान है, यह ठीक है, लेकिन इसका संबंध कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा अभियुक्तों को सजा देने की शक्ति से है।इस मामले में एमिकस क्यूरी एडवोकेट गौरव अग्रवाल ने कहा कि पटना उच्च न्यायालय ने कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को शक्तियां प्रदान करने के बारे में अपनी आपत्ति व्यक्त की है। इसके बाद पीठ ने राज्य सरकार के वकील को इस मुद्दे पर आवश्यक निर्देश प्राप्त करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मामले में क्या किया जा सकता है।
बिहार में SIR को लेकर जनता की क्या है राय? सर्वे में हुआ चौंकाने वाला खुलासा Bihar SIR: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की जारी प्रक्रिया के बीच कांग्रेस सांसद राहुल गांधी चुनाव आयोग (ECI) पर आरोप लगाते हुए पूरे राज्य में वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं. बिहार में इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए सभी सियासी दल अपनी-अपनी राजनीति को भुनाने की कोशिशों में लगे हुए हैं. वहीं, विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय चुनाव आयोग (ECI) बिहार की मतदाता सूची से सभी त्रुटियों को दूर करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान चला रही है. जिसे लेकर बिहार में राजनीतिक गहमा-गहमी जारी है और सभी विपक्षी दलों के नेता बिहार एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं. लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी चुनाव आयोग पर वोट चोरी और मतदाता सूची में हेराफेरी करने के आरोप लगाते हुए बिहार में वोटर अधिकार यात्रा कर रहे हैं. राहुल गांधी के साथ बिहार विधानसभा में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव भी उनके साथ यात्रा कर रहे हैं. इस बीच बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर एक सर्वे हुआ हैं. जिसमें बिहार की जनता ने चौंका देने वाले खुलासे किए हैं बिहार की जनता ने एसआईआर को लेकर दिए जवाब बिहार में चुनाव आयोग के एसआईआर प्रक्रिया के बीच वोट वाइब ने एक सर्वे किया है. सर्वे में बिहार की जनता से एसआईआर प्रक्रिया से संबंधित कुछ सवाल किए गए हैं. जिस पर बिहार की जनता ने अपनी राय रखी है. सवाल- क्या आपको वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने को लेकर किसी तरह की कोई परेशानी हुई? जवाब- इस पर राज्य के 37.2 प्रतिशत लोगों ने हां में जवाब दिया. वहीं, 42.2 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई, जबकि 20.6 परसेंट लोगों ने कहा कि कह नहीं सकते. सवाल- क्या आप मानते हैं कि SIR सही और पारदर्शी तरीके से किया गया है? जवाब- इस पर बिहार के 39.9 परसेंट लोगों ने हां में अपनी प्रतिक्रिया दी है. वहीं, 39.9 परसेंट लोगों ने नहीं में जवाब दिया है. जबकि 20.4 प्रतिशत ने कह नहीं सकते पर अपनी राय दी है. सवाल- क्या वोटर लिस्ट पर आपत्ति उठाने के लिए दिया गया एक महीने का समय पर्याप्त है? जवाब- इस सवाल पर 38.3 परसेंट लोगों ने कहा कि हां, इतना समय पर्याप्त है और पर्याप्त से ज्यादा है. वहीं, 40.9 परसेंट लोगों ने नहीं में प्रतिक्रिया दी. जबकि 20.8 परसेंट लोगों ने कहा कि कह नहीं सकते. सवाल- वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को देखते हुए देशव्यापी SIR पर आपकी क्या राय है? जवाब- बिहार के 49.2 परसेंट लोगों ने इस सवाल पर कहा कि इसे तुरंत लागू होना चाहिए. वहीं, 39.1 प्रतिशत लोगों ने कहा कि जरूरत नहीं है. जबकि 11.6 फीसद लोगों ने कहा कह नहीं सकते. सवाल- क्या आपके पास ECI के लिए पेश किए जाने वाले 11 दस्तावेजों में कोई भी है? जवाब- बिहार के 74.7 परसेंट लोगों ने कहा कि हां में अपनी प्रतिक्रिया दी. वहीं, मात्र 11.8 परसेंट लोगों ने नहीं में अपना जवाब दिया. जबकि 13.5 परसेंट लोगों ने कहा कि कह नहीं सकते.
नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया है, जिससे बिहार की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है. लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार की त्रयी ने पिछले पांच दशकों तक बिहार की राजनीति को नियंत्रित किया. 'मैं आपको पूरी ईमानदारी से विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आपके साथ मेरा यह संबंध भविष्य में भी बना रहेगा और आपके साथ मिलकर एक विकसित बिहार बनाने का संकल्प पूर्ववत कायम रहेगा. जो नई सरकार बनेगी उसको मेरा पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहेगा ये बातें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं. नीतीश कुमार ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखी इन लाइनों के आइने में बिहार के राजनीतिक अध्याय से एक चैप्टर के अंत के आगमन की आवाभगत कर सकते हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार की मिट्टी छोड़कर अब राज्यसभा की शोभा बढ़ाएंगे उन्होंने एक्स पर 10 बजकर 54 मिनट पर लिखा- `पिछले दो दशक से भी अधिक समय से आपने अपना विश्वास एवं समर्थन मेरे साथ लगातार बनाए रखा है, तथा उसी के बल पर हमने बिहार की और आप सब लोगों की पूरी निष्ठा से सेवा की है. नीतीश के राज्यसभा जाने से एक युग का अंत आपके विश्वास और समर्थन की ही ताकत थी कि बिहार आज विकास और सम्मान का नया आयाम प्रस्तुत कर रहा है. इसके लिए पूर्व में भी मैंने आपके प्रति कई बार आभार व्यक्त किया है. संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूं. इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक्स पर ये बयान आने के बाद सभी सियासी अटकलबाजी थम सी गई है. उसके साथ ही लालू यादव, रामविलास पासवान और अब नीतीश कुमार के युग के अंत की तस्वीर एक फ्रेम में आ गई है. बिहार की राजनीतिक मिट्टी में एक ऐसी खुशबू रही है जिसने देश को जयप्रकाश नारायण (जेपी) जैसा व्यक्तित्व दिया. नीतीश कुमार की सियासी पारी का आगाज 1970 के दशक के उस छात्र आंदोलन की कोख से तीन बड़े नायक निकले. लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार. इन तीनों ने मिलकर बिहार की सत्ता और सामाजिक ताने-बाने को पिछले पांच दशकों तक अपने इर्द-गिर्द घुमाया. लेकिन आज, जब हम 2026 के मुहाने पर खड़े हैं, तो बिहार की राजनीति का वह `समाजवादी अध्याय` अब अपना अंतिम पन्ना लिख चुका है. यह अंत सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि उस विचारधारा के अवसान का भी है जिसने `राजा रानी के पेट से पैदा नहीं होगा` का नारा दिया था. आइए कुछ पीछे चलते हैं. सामाजिक न्याय कैसे परिवारवाद में बदला इस कहानी की शुरुआत 10 मार्च, 1990 को हुई थी, जब लालू प्रसाद यादव ने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. वह दौर बदलाव का था. सदियों से हाशिए पर पड़े पिछड़ों और दलितों को लालू ने आवाज दी. उनके शासन के शुरुआती साल सामाजिक न्याय के चरम के रूप में देखे गए. लेकिन, सत्ता का नशा और भ्रष्टाचार के आरोपों (चारा घोटाला) ने इस नायक को कानून के शिकंजे में ला खड़ा किया. 1997 में जब जेल जाने की नौबत आई, तो लालू ने जिस परिवारवाद का विरोध किया था, उसी का सहारा लिया. उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया. अखबारों की पुरानी कतरनें गवाह हैं कि उस वक्त नीतीश कुमार ने तंज कसते हुए कहा था, “राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने के बाद मेरी इस पद में कोई रुचि नहीं रही.' यह बयान उस समय के नीतीश के आदर्शों का प्रतीक था. लालू से पासवान तक की परिवारवादी राजनीति हालांकि, लालू का परिवारवाद यहीं नहीं रुका. आज उनकी पूरी विरासत उनके बेटों (तेजस्वी और तेज प्रताप) और बेटियों (मीसा भारती और रोहिणी आचार्या) के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है. तेजस्वी यादव भले ही आज राजद को एक नए और युवा स्वरूप में पेश कर रहे हों, लेकिन पार्टी की चाबी आज भी उसी `लालू परिवार` के पास है. इसी त्रयी के दूसरे स्तंभ थे रामविलास पासवान. उन्होंने दलित चेतना को मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ा. वह केंद्र की राजनीति के `मौसम विज्ञानी` कहे जाते थे, जो हवा का रुख भांपकर गठबंधन बदलने में माहिर थे. पासवान ने भी सार्वजनिक मंचों से परिवारवाद पर कड़े प्रहार किए, लेकिन जमीन पर उन्होंने अपने भाइयों और फिर अपने बेटे चिराग पासवान को राजनीति की सीढ़ियां चढ़ाईं. 2020 में उनके निधन के बाद लोजपा दो फाड़ हुई, लेकिन उनके परिवार का दबदबा बरकरार रहा. आज चिराग पासवान एनडीए के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जो अपने पिता की विरासत को `हनुमान` बनकर आगे बढ़ा रहे हैं नीतीश कुमार कैसे बने सुशासन बाबू अब बात आती है नीतीश कुमार की, जिन्हें सुशासन बाबू कहा गया. उन्होंने लालू के `जंगलराज` के खिलाफ लड़ाई लड़ी और बिहार को बुनियादी ढांचे, सड़क और बिजली के मामले में एक नई पहचान दी. नीतीश की राजनीति हमेशा `नीति और नियत` के दावों पर टिकी रही. उन्होंने लंबे समय तक खुद को परिवारवाद से दूर रखा. उनका बेटा निशांत कुमार, जो एक इंजीनियरिंग स्नातक हैं, सालों तक राजनीति की चकाचौंध से दूर आध्यात्मिक और निजी जीवन जीते रहे. अब नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं. बेटे निशांत सक्रिय रूप से नेताओं से मिल रहे हैं. उधर, बीजेपी की रणनीति पूर्व में भी कुछ ऐसी ही थी. आपको याद होगा, 2022 में नीतीश कुमार को राज्यसभा के जरिए उपराष्ट्रपति बनाने तक की बात हुई थी. कमोवेश इस बात पर मुहर लग गई थी कि नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं नीतीश के सियासी उत्तराधिकारी होंगे निशांत बिहार की राजनीति के केंद्र में बीजेपी रहेगी. नीतीश कुमार को अब दिल्ली में उपराष्ट्रपति बनाकर बैठा दिया जाएगा. लेकिन ठीक ऐन वक्त पर नीतीश कुमार ने महागठबंधन का दामन थामा. और बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. उधर, बीजेपी की रणनीति भी यहां स्पष्ट है. नीतीश को केंद्र में एक सम्मानजनक विदाई देकर बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में खुद का मुख्यमंत्री बनाना. यदि निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो यह नीतीश के लिए अपने बेटे को सुरक्षित राजनीतिक जमीन देने का सबसे बड़ा दांव होगा. बिहार में आज जो संक्रमण काल चल रहा है, वह मंडल कमीशन के बाद की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ है. लालू, पासवान और नीतीश ने जाति को अपनी शक्ति बनाया. लालू ने यादवों को, नीतीश ने कुर्मी और ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) को, तो पासवान ने दलितों को लामबंद किया. लेकिन 2026 का बिहार अब बदल रहा है. अमित शाह और पीएम मोदी हिंदू एकीकरण और विकास के जरिए जाति की इन दीवारों को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वे कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर नीतीश के ईबीसी वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं. तेजस्वी यादव अब केवल जाति की नहीं, बल्कि `नौकरी` और `आर्थिक न्याय` की बात कर रहे हैं. `जन सुराज` के माध्यम से प्रशांत किशोर बिहार के युवाओं को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि लालू-नीतीश के 35-40 सालों ने बिहार को पिछड़ेपन के अलावा कुछ नहीं दिया. बिहार की राजनीति में लिखी जाएगी नई पठकथा लालू का 1990 का शपथ ग्रहण समारोह जिस क्रांति का आगाज़ था, वह आज परिवारवाद के दलदल में ठहरा हुआ महसूस होता है. नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना और निशांत कुमार का उदय इस बात की तस्दीक है कि अब बिहार की राजनीति के पुराने शेर थक चुके हैं. उनकी आंखें अब सामाजिक न्याय के सपनों के बजाय अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित देखने में ज्यादा लगी हैं यह बिहार की राजनीति का एक बड़ा अध्याय खत्म होने जैसा है. आने वाले वर्षों में बिहार `जाति बनाम विकास` की एक नई लड़ाई देखेगा. क्या बिहार के लोग अब भी उन्हीं पुराने नामों के उत्तराधिकारियों को चुनेंगे, या फिर किसी नई विचारधारा को मौका देंगे? यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि लालू-पासवान-नीतीश की वह त्रयी, जिसने दशकों तक बिहार को अपनी उंगलियों पर नचाया, अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रही है.
राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवारों की लिस्ट जारी, अभिषेक मनु सिंघवी और फूलो देवी समेत कई नेताओं को मिला टिकट देश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है क्योंकि आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में Indian National Congress ने भी अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। इस सूची में कई अनुभवी नेताओं के साथ-साथ कुछ नए चेहरों को भी मौका दिया गया है। सबसे चर्चित नामों में वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील Abhishek Manu Singhvi और फूलो देवी का नाम शामिल है। कांग्रेस की ओर से जारी की गई इस सूची के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राज्यसभा चुनाव हमेशा से ही राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि संसद के ऊपरी सदन में सीटों की संख्या सरकार और विपक्ष की ताकत को काफी हद तक प्रभावित करती है। राज्यसभा चुनाव का महत्व भारत की संसद दो सदनों से मिलकर बनी है — लोकसभा और राज्यसभा। लोकसभा को निचला सदन और राज्यसभा को ऊपरी सदन कहा जाता है। राज्यसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते, बल्कि राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य उन्हें चुनते हैं। राज्यसभा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यहां कानूनों पर विस्तार से चर्चा होती है और कई महत्वपूर्ण विधेयकों को मंजूरी दी जाती है। इसके अलावा राज्यसभा संघीय ढांचे का प्रतिनिधित्व भी करती है क्योंकि इसमें राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। राज्यसभा चुनावों में राजनीतिक दलों की रणनीति काफी अहम होती है। दल अक्सर ऐसे नेताओं को यहां भेजते हैं जो नीति निर्माण, कानून और संसदीय बहस में मजबूत भूमिका निभा सकें। कांग्रेस की रणनीति इस बार कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों का चयन करते समय कई पहलुओं को ध्यान में रखा है। पार्टी ने अनुभवी नेताओं के साथ-साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व पर भी ध्यान देने की कोशिश की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस चुनाव के जरिए संसद में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहती है। साथ ही पार्टी ने ऐसे नेताओं को भी मौका दिया है जो कानूनी और राजनीतिक मामलों में पार्टी की आवाज को प्रभावी तरीके से उठा सकें। अभिषेक मनु सिंघवी को फिर मौका इस सूची में सबसे प्रमुख नाम Abhishek Manu Singhvi का है। वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और देश के प्रसिद्ध संवैधानिक वकीलों में गिने जाते हैं। अभिषेक मनु सिंघवी लंबे समय से कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं। वे कई बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं और संसद में पार्टी का मजबूत पक्ष रखते रहे हैं। कानूनी मामलों में उनकी गहरी समझ और प्रभावी वक्तृत्व कला उन्हें संसद के सबसे प्रभावशाली वक्ताओं में से एक बनाती है। कांग्रेस ने उन्हें एक बार फिर मौका देकर यह संकेत दिया है कि पार्टी संसद में अनुभवी और मजबूत आवाज बनाए रखना चाहती है। फूलो देवी को टिकट कांग्रेस की सूची में फूलो देवी का नाम भी शामिल है। यह फैसला सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के सूत्रों के अनुसार कांग्रेस ने सामाजिक संतुलन बनाए रखने और विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति के तहत उन्हें टिकट दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस लंबे समय से सामाजिक न्याय और समावेशी राजनीति की बात करती रही है। ऐसे में अलग-अलग समुदायों के नेताओं को राज्यसभा भेजना पार्टी की उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अन्य संभावित उम्मीदवार कांग्रेस की सूची में कई अन्य नेताओं के नाम भी शामिल हैं, जिनमें अनुभवी राजनीतिक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और पार्टी के संगठनात्मक पदाधिकारी शामिल हैं। पार्टी ने टिकट वितरण में निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया है: राजनीतिक अनुभव संगठन में योगदान सामाजिक प्रतिनिधित्व क्षेत्रीय संतुलन इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया गया है। राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया सामान्य चुनावों से थोड़ी अलग होती है। राज्यसभा के सदस्य एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote) के माध्यम से चुने जाते हैं। इसमें राज्य के विधायक मतदान करते हैं। इस चुनाव में: हर विधायक का वोट होता है वोट की प्राथमिकता तय की जाती है सीटों की संख्या के अनुसार उम्मीदवार चुने जाते हैं इस प्रक्रिया के कारण राजनीतिक दलों के बीच रणनीतिक गठबंधन और क्रॉस वोटिंग भी देखने को मिल सकती है। राजनीतिक समीकरण राज्यसभा चुनाव में अक्सर राज्यों की राजनीति का सीधा असर दिखाई देता है। जिस राज्य में जिस पार्टी की सरकार होती है या जिसके पास ज्यादा विधायक होते हैं, उसे वहां से ज्यादा सीटें जीतने का मौका मिलता है। कांग्रेस की रणनीति भी इसी आधार पर तैयार की गई है। पार्टी ने उन राज्यों पर ज्यादा ध्यान दिया है जहां उसकी स्थिति मजबूत है या जहां सहयोगी दलों का समर्थन मिल सकता है। विपक्ष की रणनीति राज्यसभा चुनाव केवल कांग्रेस के लिए ही नहीं बल्कि अन्य दलों के लिए भी महत्वपूर्ण है। कई विपक्षी दल भी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए रणनीति बना रहे हैं। अगर विपक्षी दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो वे संसद के ऊपरी सदन में सरकार को कड़ी चुनौती दे सकते हैं। यही वजह है कि इन चुनावों को राजनीतिक दृष्टि से काफी अहम माना जा रहा है। संसद में राज्यसभा की भूमिका राज्यसभा को अक्सर विचारों का सदन कहा जाता है। यहां कई ऐसे सदस्य होते हैं जो सीधे चुनाव लड़कर नहीं आते लेकिन अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं। इनमें शामिल हो सकते हैं: वरिष्ठ राजनेता शिक्षाविद वकील सामाजिक कार्यकर्ता ऐसे लोग संसद में नीति निर्माण की प्रक्रिया को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस के लिए क्यों अहम है यह चुनाव कांग्रेस के लिए राज्यसभा चुनाव कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं। संसद में संख्या बढ़ाने का मौका पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को संसद भेजना राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संदेश देना संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना इन सभी कारणों से कांग्रेस इस चुनाव को गंभीरता से ले रही है। संभावित राजनीतिक असर कांग्रेस द्वारा जारी की गई उम्मीदवारों की सूची का असर आने वाले समय में कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है। पार्टी के भीतर संगठनात्मक संतुलन राज्यों की राजनीति पर प्रभाव संसद में बहस और विधेयकों पर असर राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यसभा में मजबूत उपस्थिति किसी भी पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। आगामी चुनावों की तैयारी राज्यसभा चुनाव के साथ-साथ राजनीतिक दल आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों की भी तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में टिकट वितरण को भविष्य की रणनीति से भी जोड़ा जा रहा है। कई बार राज्यसभा सीटें उन नेताओं को दी जाती हैं जो संगठन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन सीधे चुनाव नहीं लड़ते। निष्कर्ष राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस द्वारा जारी की गई उम्मीदवारों की सूची ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू कर दी है। Abhishek Manu Singhvi और फूलो देवी जैसे नेताओं को टिकट देकर पार्टी ने यह संकेत दिया है कि वह संसद में मजबूत और प्रभावी प्रतिनिधित्व चाहती है। आने वाले दिनों में अन्य राजनीतिक दल भी अपनी रणनीति और उम्मीदवारों की घोषणा करेंगे। इसके बाद राज्यसभा चुनाव का मुकाबला और भी दिलचस्प होने की संभावना है। संसद के ऊपरी सदन के ये चुनाव केवल सीटों का गणित नहीं होते, बल्कि वे देश की राजनीति की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सभी की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि चुनाव के नतीजे क्या संकेत देते हैं और संसद में किस पार्टी की स्थिति कितनी मजबूत होती है।
सोनिया गांधी Sonia Gandhi Statement: इजरायली-अमेरिकी हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी खामेनेई की मौत के बाद भारत की राजनीति में बहस तेज हो गई है. इजरायली-अमेरिकी हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी खामेनेई की मौत के बाद देश की राजनीति गरमा गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से अब तक सीधी प्रतिक्रिया नहीं आने पर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने इस चुप्पी को कर्तव्य से पीछे हटना बताया और कहा कि इससे भारत की विदेश नीति की दिशा पर सवाल खड़े होते हैं. खामेनेई की हत्या पर सरकार की चुप्पी पर सवाल कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि इजरायली-अमेरिकी हमलों में अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी खामेनेई की मौत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक साफ बयान नहीं दिया है. उन्होंने इसे “कर्तव्यहीनता” बताया और कहा कि यह चुप्पी तटस्थता नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी से बचना है. सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि इस तरह की चुप्पी से भारत की विदेश नीति की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है. उनका कहना है कि जब किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर देश साफ रुख नहीं लेता, तो गलत संदेश जाता है. लेख में सरकार पर साधा निशाना पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे अपने लेख में केंद्र सरकार की आलोचना की. उन्होंने कहा कि खामेनेई की लक्षित हत्या पर भारत सरकार का चुप रहना न्यूट्रल रुख नहीं है, बल्कि यह अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना है. उन्होंने मांग की कि जब संसद का बजट सत्र दोबारा शुरू हो, तो इस मुद्दे पर खुली और बिना बचाव वाली चर्चा होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर हो रही है और ऐसे समय में भारत की “परेशान करने वाली चुप्पी” पर सवाल उठना जरूरी है. “अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गहरा घाव” सोनिया गांधी ने अपने लेख में लिखा कि 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी खामेनेई की अमेरिका और इजरायल के लक्षित हमलों में हत्या कर दी गई. उन्होंने कहा कि बातचीत के बीच किसी पद पर बैठे राष्ट्राध्यक्ष की हत्या आज के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक गहरा घाव है. उन्होंने कहा कि इस घटना से ज्यादा चौंकाने वाली बात भारत सरकार की खामोशी है. प्रधानमंत्री के बयानों पर भी सवाल सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी के शुरुआती बयानों की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि अमेरिका-इजरायल के बड़े हमले को नजरअंदाज करते हुए प्रधानमंत्री ने खुद को सिर्फ यूएई पर ईरान के जवाबी हमले की निंदा करने तक सीमित रखा. उन्होंने कहा कि उन घटनाओं के क्रम पर बात नहीं की गई जो पहले हुई थीं. उनका यह भी कहना है कि बाद में प्रधानमंत्री ने “गहरी चिंता” और “संवाद व कूटनीति” की सामान्य बातें कही, जबकि ये बयान उन बड़े हमलों के बाद आए थे जिन्हें अमेरिका और इजरायल ने शुरू किया था. विदेश नीति पर उठाए गंभीर सवाल सोनिया गांधी ने कहा कि जब भारत जैसे देश की ओर से अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर साफ रुख नहीं लिया जाता, तो इससे गलत संकेत जाते हैं. उन्होंने लिखा कि जब किसी विदेशी नेता की लक्षित हत्या पर हमारे देश की ओर से संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट बचाव नहीं होता, तो इससे हमारी विदेश नीति की दिशा और भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. राहुल गांधी ने भी साधा निशाना लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सोनिया गांधी का लेख साझा किया. उन्होंने लिखा कि जब किसी विदेशी नेता की लक्षित हत्या पर हमारा देश संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट समर्थन नहीं करता और निष्पक्षता छोड़ देता है, तो इससे भारत की विदेश नीति की दिशा और भरोसे पर सवाल उठते हैं. राहुल गांधी ने कहा कि ऐसे समय में चुप रहना तटस्थता नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि सोनिया गांधी ने अपने लेख में इस नाजुक वैश्विक हालात पर जोर देते हुए कहा है कि भारत को संप्रभुता और शांति के पक्ष में खड़ा होना चाहिए और अपनी नैतिक ताकत बनाए रखनी चाहिए.
कांग्रेस ने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा करते हुए मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं। प्रियंका गांधी ने ईरानी नेता की हत्या की निंदा की और पीएम मोदी से भारतीयों की सुरक्षित वापसी की अपील की। HighLights कांग्रेस ने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों की निंदा की। मोदी सरकार की विदेश नीति पर कांग्रेस ने गंभीर सवाल उठाए। प्रियंका गांधी ने मध्यपूर्व से भारतीयों की वापसी की मांग की। जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। कांग्रेस ने ईरान पर अमेरिका और इजरायल पर हमले की निंदा करते हुए सरकार की विदेश नीति पर यह कहते हुए सवाल उठाए कि देश को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति की विषयवस्तु और उसके तौर-तरीकों दोनों की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। ईरान पर हमले को लेकर कोई स्पष्ट दृष्टिकोण जाहिर नहीं किए जाने के मद्देनजर पार्टी ने विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि ईरान पर थोपे गए इस युद्ध के प्रति मोदी सरकार की प्रतिक्रिया भारत के मूल्यों, सिद्धांतों, चिंताओं और हितों के साथ विश्वासघात है। प्रियंका गांधी की पीएम मोदी से उम्मीद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने ईरान की संप्रभुता का उल्लंघन कर उसके सुप्रीम लीडर खामनेई की हत्या किए जाने की निंदा करते हुए उम्मीद जताई की पीएम मोदी मध्यपूर्व में फंसे भारतीयों की सुरक्षति वापसी के लिए कदम उठाएंगे। ईरान पर हमले के मद्देनजर रविवार को एक्स पर प्रियंका गांधी ने कहा, "लोकतांत्रिक दुनिया के तथाकथित नेताओं द्वारा एक संप्रभु देश के लीडरशिप की टारगेटेड हत्या और बहुत सारे बेगुनाह लोगों की हत्या घिनौनी है और इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए। चाहे इसका कारण कुछ भी बताया गया हो। यह दुख की बात है कि अब कई देश लड़ाई में घसीटे जा रहे हैं। दुनिया को शांति चाहिए, फालतू की लड़ाईयां नहीं।" प्रियंका का पीएम मोदी पर तंज शांति के प्रति गांधी की प्रतिबद्धता को प्रासंगिक बताते हुए प्रियंका ने कहा कि जो लोग इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, उन्हें महात्मा गांधी की बातें याद रखनी चाहिए कि आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देती है। पीएम मोदी पर तंज कसते हुए कहा, "मुझे उम्मीद है कि इजराइल के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ट्रंप के सामने झुकने के बाद हमारे प्रधानमंत्री प्रभावित देशों से सभी भारतीय नागरिकों को सुरक्षित घर वापस लाने की पूरी कोशिश करेंगे।" जयराम रमेश ने बयान जारी कर कहा कि चाहे प्रधानमंत्री और उनकी मंडली कितना भी दिखावा कर लें, हकीकत यह है कि स्वयंभू विश्वगुरु के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है। जयराम रमेश का पीएम मोदी पर हमला उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 25-26 फरवरी 2026 को इजराइल का ऐसे समय दौरा किया जब पूरी दुनिया को यह जानकारी थी कि सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से ईरान पर अमेरिका-इजराइल का सैन्य हमला होने वाला है। पीएम मोदी के लौटने के केवल दो दिन बाद ही यह हमला शुरू हो गया। जयराम ने नेसेट में दिए पीएम के भाषण को नैतिक कायरता का शर्मनाक प्रदर्शन बताया। साथ ही लद्दाख सीमा पर चीन से टकराव में 20 बहादुर जवानों के शहीद होने का संदर्भ उठाते हुए कहा कि पीएम मोदी ने 19 जून 2020 को सार्वजनिक रूप से चीन को क्लीन चिट देकर हमारी बातचीत की स्थिति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया और अब हमें चीन की शर्तों पर संबंधों को सामान्य बनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अमेरिका की बेरूखी पर कांग्रेस नेता ने कहा कि ट्रंप लगातार पाकिस्तान से नजदीकियां बनाए हुए हैं और बार-बार उसी व्यक्ति (फील्ड मार्शल असीम मुनीर) की सराहना कर रहे हैं जिसके भड़काऊ बयानों ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि तैयार की थी। जयराम रमेश ने ट्रेड डील को बताया विफल ट्रंप अब तक सौ से अधिक बार दावा कर चुके हैं कि कि उन्होंने 10 मई 2025 को टैरिफ बढ़ाने की धमकी देकर आपरेशन ¨सदूर रोकने में हस्तक्षेप किया था लेकिन पीएम इस पर पूरी तरह मौन हैं। अफगानिस्तान के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका ने साफ तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया है। ट्रेड डील को विफलता बताते हुए जयराम रमेश ने कहा कि ट्रंप ने खुद घोषणा कि पीएम मोदी के अनुरोध पर व्यापार समझौता अंतिम हुआ है जो स्पष्ट है करता है कि यह एक हताश पहल थी क्योंकि 18 दिन बाद ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेड डील को ही अवैध और असंवैधानिक करार दिया।
तृणमूल कांग्रेस ने आगामी राज्यसभा चुनाव के लिए अपने चार उम्मीदवारों की घोषणा की है। पार्टी ने बाबुल सुप्रियो, पूर्व डीजीपी राजीव कुमार, वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी और अभिनेत्री कोयल मल्लिक को नामित किया है। राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, जब All India Trinamool Congress (तृणमूल कांग्रेस) ने राज्यसभा के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की। इस सूची में कानूनी, सांस्कृतिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले नामों को शामिल कर पार्टी ने एक संतुलित राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। वरिष्ठ अधिवक्ता Menaka Guruswamy को उम्मीदवार बनाकर पार्टी ने संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक विशेषज्ञता को प्राथमिकता दी है। मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं और वे संवैधानिक मामलों में अपनी मजबूत पैरवी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जानी जाती हैं। वहीं, बांग्ला सिनेमा की चर्चित अभिनेत्री Koel Mallick को मैदान में उतारकर पार्टी ने कला और जनसंपर्क के क्षेत्र से एक लोकप्रिय चेहरा सामने रखा है। इसे जनसमर्थन और सांस्कृतिक जुड़ाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने आगामी राज्यसभा चुनाव के लिए अपने चार उम्मीदवारों की घोषणा की है। पार्टी ने बाबुल सुप्रियो, पूर्व डीजीपी राजीव कुमार, वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी और अभिनेत्री कोयल मल्लिक को नामित किया है। TMC ने बाबुल सुप्रियो-राजीव कुमार समेत चार चेहरों पर लगाया दांव (फाइल फोटो) HighLights तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा उम्मीदवारों की घोषणा की। बाबुल सुप्रियो, राजीव कुमार, कोयल मल्लिक नामित। संतुलित समीकरण बनाने का पार्टी का प्रयास। राज्य ब्यूरो, कोलकाता। आगामी राज्यसभा चुनाव के लिए शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर दी, जिसमें पार्टी ने मंत्री से लेकर पूर्व आइपीएस, कानून और कला जगत की जानी-मानी हस्तियों को शामिल कर एक संतुलित समीकरण बनाने का प्रयास किया है। पार्टी ने राज्यसभा के लिए बाबुल सुप्रियो, बंगाल के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कुमार, प्रसिद्ध वकील मेनका गुरुस्वामी और बांग्ला फिल्म जगत की लोकप्रिय अभिनेत्री कोयल मल्लिक को अपना उम्मीदवार बनाया है। बाबुल सुप्रियो पर दांव बाबुल सुप्रियो एक अनुभवी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं, जो वर्तमान में बंगाल सरकार में मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनके साथ ही पूर्व डीजीपी राजीव कुमार का नाम एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है, जिन्होंने राज्य पुलिस बल के शीर्ष पद पर लंबे समय तक सेवा दी है। वहीं, कानूनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाने वाली मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील हैं और वे अपने संवैधानिक अधिकारों की वकालत के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हैं। इस सूची में बांग्ला सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्री कोयल मल्लिक का नाम शामिल कर पार्टी ने कला और जनसंपर्क के क्षेत्र से भी एक मजबूत चेहरा उतारा है। तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि ये चारों उम्मीदवार पार्टी की उस वैचारिक विरासत को आगे ले जाने में सक्षम हैं, जो आम लोगों के अधिकारों और भारतीय गरिमा के संरक्षण पर केंद्रित है। पार्टी ने दी शुभकामनाएं इस चयन को आगामी संसद सत्र में बंगाल की आवाज को और अधिक मुखरता से उठाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी आलाकमान ने इन सभी प्रत्याशियों को शुभकामनाएं देते हुए उम्मीद जताई है कि वे संसद के उच्च सदन में जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से रखेंगे। विवादों में रहे हैं राजीव कुमार इस सूची में सबसे चर्चित नाम पूर्व डीजीपी व पूर्व पुलिस आयुक्त राजीव कुमार का है। सारधा और रोजवैली चिटफंड घोटालों की जांच के दौरान राजीव कुमार की भूमिका लंबे समय से विवादों में रही है। वर्ष 2019 में जब सीबीआई ने उनसे पूछताछ की कोशिश की थी, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके समर्थन में कोलकाता में अभूतपूर्व धरना दिया था, जिसे उन्होंने 'संविधान बचाने की लड़ाई' का नाम दिया था। उन पर जांच के दौरान साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ के गंभीर आरोप लगे थे। SC की टिप्पणी पार्टी का यह फैसला केंद्रीय जांच एजेंसियों के दबाव के बीच एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। हाल ही में राजनीतिक परामर्श फर्म 'आइ-पैक के परिसरों पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी के दौरान भी भारी राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तत्कालीन डीजीपी राजीव कुमार के साथ स्वयं घटनास्थल पर पहुंचकर कार्रवाई का विरोध किया था, जिसके बाद ईडी ने सर्वोच्च न्यायालय में इसे 'शक्ति का दुरुपयोग' बताया है और नोटिस भी जारी किया था।
Rashmika-Vijay Announcement: रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा ने शादी के बाद एक बड़ी अनाउंसमेंट कर हर किसी का दिल जीत लिया. इसकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा 44 सरकारी स्कूलों को स्कॉलरशिप देंगे न्यूली वेड कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा इन दिनों जहां अपनी शादी को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. वहीं ये जोड़ी अपनी वेडिंग सेलिब्रेशन के बीच तेलंगाना में एक के बाद एक समाज सेवा के काम कर सबका दिल जीत रहे हैं. अब इस कपल ने तेलंगाना के 44 सरकारी स्कूलों के लिए बड़ी अनाउंसमेंट की है. तेलंगाना के 44 सरकारी स्कूलों के लिए विजय-रश्मिका की बड़ी अनाउंसमेंट दरअसल उदयपुर में शादी करने के बाद रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा नागरकुरनूल ज़िले के अचमपेट डिवीज़न में एक्टर के पैतृक गांव पहुंचे थे. वहां के लोगों से बातचीत के दौरान, एक्टर ने एक ज़रूरी घोषणा की, जिस पर वहां जमा भीड़ ने ज़ोरदार तालियां बजाईं. बता दें कि अपने एनजीओ, देवरकोंडा चैरिटेबल ट्रस्ट के ज़रिए, विजय ने इलाके के 44 सरकारी स्कूलों में क्लास 9 और 10 में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप देने की घोषणा की है. इस पहल का मकसद जरूरतमंद स्टूडेंट्स की मदद करना और उन्हें बिना किसी पैसे की दिक्कत के अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए बढ़ावा देना है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में विजय तेलुगु में गांववालों से बात करते हुए दिख रहे हैं, जिसमें वह अपने शहर के स्टूडेंट्स के लिए अपना कमिटमेंट बता रहे हैं. उन्होंने कम्युनिटी को भरोसा दिलाया कि स्कॉलरशिप से सीधे तौर पर उन टीनएजर्स को फ़ायदा होगा जो ज़रूरी बोर्ड एग्ज़ाम की तैयारी कर रहे हैं. विजय ने अपने गांव में ज्यादा बार आने का भी वादा किया, ताकि उस कम्युनिटी के साथ उनका रिश्ता और मजबूत हो सके जिसने उनके शुरुआती सालों को बनाया था शादी की रस्में रश्मिका और विजय ने 26 फरवरी को उदयपुर में तेलुगु और कोडवा रीति-रिवाजों से शादी की थी. इसके बाद, कपल ने तिरुपति बालाजी मंदिर में आशीर्वाद लिया था. उन्होंने अपनी शादी को सेलिब्रेट करते हुए कई शहरों में मिठाइयां भी बांटीं. 2 मार्च को, रश्मिका ने तेलंगाना के थुम्मानपेटा में विजय के घर पर अपनी गृहप्रवेश सेरेमनी की. कपल ने अपने नए घर पर सत्यनारायण व्रतम पूजा भी की. रश्मिका ने इस मौके पर क्रीम कांजीवरम साड़ी पहनी थी, जबकि विजय ने गांव में बातचीत के दौरान ऑरेंज टी-शर्ट और ब्लैक ट्राउजर में सिंपल लुक कैरी किया था. कब है विजय-रश्मिका का रिसेप्शन यह कपल 4 मार्च को हैदराबाद में इंडस्ट्री के साथियों और पॉलिटिकल लीडर्स के लिए एक ग्रैंड रिसेप्शन होस्ट करने वाला है. हालांकि, उन्होंने साफ किया है कि यह इवेंट सिर्फ़ इनविटेशन पर ही होगा, और फैंस और मीडिया से सिक्योरिटी इंतज़ाम का ध्यान रखने की रिक्वेस्ट की है. विजय-रश्मिका फिल्म प्रोफेशनल फ्रंट की बात करें तो ये जोड़ी जल्द ही राणाबली में स्क्रीन स्पेस शेयर करती नजर आएगी. ये फिल्म 11 सितंबर को थिएटर में रिलीज़ होगी.
भारत और इंग्लैंड के बीच टी20 वर्ल्ड कप 2026 का सेमीफाइनल 5 मार्च को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाएगा. भारत ग्रुप-1 में दूसरे स्थान पर रहा है, जबकि साउथ अफ्रीका शीर्ष पर रही. IND vs ENG Semifinal Live Streaming: आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत सेमीफाइनल में पहुंच चुका है. टीम इंडिया ने 1 मार्च को वेस्टइंडीज को रोमांचक मुकाबले में पांच विकेट से हराकर अंतिम चार में एंट्री की. इस जीत के हीरो रहे संजू सैमसन, जिन्होंने नाबाद 97 रन की बेहतरीन पारी खेली. उनकी पारी में 12 चौके और 4 छक्के शामिल रहे और उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया. भारत ग्रुप-1 में दूसरे स्थान पर रहा, जबकि साउथ अफ्रीका शीर्ष पर रही. अब सेमीफाइनल में भारत का सामना ग्रुप-2 की टॉपर इंग्लैंड से होने जा रहा है. पहला सेमीफाइनल साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड के बीच खेला जाएगा. दोनों मुकाबलों के विजेता 8 मार्च को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में फाइनल खेलेंगे. IND VS ENG मैच कब और कितने बजे होगा? भारत और इंग्लैंड के बीच दूसरा सेमीफाइनल 5 मार्च, गुरुवार को खेला जाएगा. मैच भारतीय समयानुसार शाम 7 बजे शुरू होगा, जबकि टॉस 6:30 बजे होगा. यह मुकाबला बेहद हाई-वोल्टेज माना जा रहा है, क्योंकि दोनों टीमें लगातार तीसरी बार टी20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में आमने-सामने हैं. IND VS ENG मैच कहां खेला जाएगा? यह अहम सेमीफाइनल मुंबई के ऐतिहासिक वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाएगा. इस मैदान पर बड़े मुकाबलों का लंबा इतिहास रहा है और फैंस को एक बार फिर रोमांचक क्रिकेट की उम्मीद है. IND VS ENG मैच कहां देखें लाइव? भारत बनाम इंग्लैंड सेमीफाइनल का सीधा प्रसारण स्टार स्पोर्ट्स नेटवर्क पर किया जाएगा. वहीं ऑनलाइन दर्शक इस मुकाबले की लाइव स्ट्रीमिंग जियो हॉटस्टार ऐप और वेबसाइट पर देख सकेंगे. दोनों टीमों के स्क्वॉड भारत: सूर्यकुमार यादव (कप्तान), संजू सैमसन, अक्षर पटेल, कुलदीप यादव, हार्दिक पांड्या, जसप्रीत बुमराह, ईशान किशन, रिंकू सिंह, मोहम्मद सिराज, वॉशिंगटन सुंदर, शिवम दुबे, अभिषेक शर्मा, वरुण चक्रवर्ती, अर्शदीप सिंह और तिलक वर्मा. इंग्लैंड: हैरी ब्रूक (कप्तान), रेहान अहमद, जोफ्रा आर्चर, टॉम बैंटन, जैकब बेथेल, जोस बटलर, सैम करन, लियाम डॉसन, बेन डकेट, विल जैक्स, जेमी ओवरटन, आदिल राशिद, फिल सॉल्ट, जोश टंग और ल्यूक वुड.
Dhurandhar 2 Advance Booking: रणवीर सिंह की धुरंधर 2 बॉलीवुड की सबसे ज़्यादा प्रीमियर सेल्स का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी है. हालांकि ये एक साउथ हीरो की फिल्म को मात नहीं दे पा रही है. रणवीर सिंह, संजय दत्त, आर माधवन और अर्जुन रामपाल स्टारर ‘धुरंधर 2’ ने सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले ही गदर मचाया हुआ है. फिलहाल ये 18 मार्च, 2026 को होने वाले पेड प्रीव्यू शो के लिए एडवांस बुकिंग में गर्दा उड़ा रही है. वैसे ये फिल्म पहले ही 'स्त्री 2' के पेड प्रीव्यू शो को रिकॉर्ड को मिट्टी में मिलाकर बॉलीवुड के लिए इतिहास रच चुकी है. लेकिन आदित्य धर निर्देशित इस फिल्म के साउथ के एक स्टार का रिकॉर्ड तोड़ने में पसीने छूट रहे हैं. धुरंधर 2 ने पेड प्रीव्यू के लिए एडवांस बुकिंग में कितनी कर ली है कमाई? धुरंधर को बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता मिली थी. ऐसे में इसकी सीक्वल धुरंधर द रिवेंज या धुरंधर 2 को भी अच्छा रिस्पॉन्स मिलने की तो पूरी उम्मीद है ही लेकिन ये फिल्म तो रिलीज से पहले ही कमाल कर रही है और बड़े-बड़े रिकॉर्ड भी अपने नाम कर रही है. सैकनिल्क के मुताबिक, इसने पेड प्रीव्यू से अब तक 18.78 करोड़ (ब्लॉक्ड सीटों को छोड़कर) कमा लिएए हैं वहीं ब्लॉक सीटों के साथ इसका पेड प्रीव्यू के लिए प्री टिकट सेल का कलेक्शन 23.99 करोड़ पहुंच चुका है. देश भर में 8 हजार 31 शोज के लिए इसके 3 लाख 51 हजार 4 सौ 13 टिकट बिक चुके हैं. धुरंधर 2 ने स्त्री 2 को पछाड़ बनाया नया रिकॉर्ड बता दें कि कि 2024 में, राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर की स्त्री 2 ने इंडिया में पेड प्रीव्यू में 9.40 करोड़ की नेट कमाई करके नया माइलस्टोन हासिल किया था. लेकिन धुरंधर: द रिवेंज ने एडवांस बुकिंग में इससे कई गुना ज़्यादा सेल्स के साथ इसे धूल चटा दी है. इसकी के साथ .े बॉलीवुड के इतिहास में सबसे ज़्यादा प्रीमियर सेल्स का नया रिकॉर्ड अपने नाम भी कर चुकी है. धुरंधर 2 के पवन कल्याण की OG को मात देने में छूटे पसीने इन सबके बीच गौर करने वाली बात ये है कि धुरंधर 2 ने पेड पीव्यू के लिए प्री सेल्स में बेशक धमाकेदार कमाई कर ली हैं लेकिन इसका टारगेट इंडियन सिनेमा की सबसे बड़ी पेड प्रीव्यू कमाई का रिकॉर्ड अपने नाम करना है. दरअसल पवन कल्याण की दे कॉल हिम OG ने 21 करोड़ के बड़े नेट कलेक्शन के साथ किसी इंडियन फिल्म के लिए अब तक के सबसे ज़्यादा पेड प्रीव्यू अपने नाम किए हुए हैं. फिलहाल रणवीर सिंह स्टारर धुरंधर 2 के लिए इस रिकॉर्ड को तोड़ने में पसीने छूट रहे हैं. हालांकि अभी फिल्म के पेड प्रीव्यू शो में 6 दिन बचे हैं और इसे पवन कल्याण के रिकॉर्ड को मात देने से सिर्फ 3 करोड़ के करीब पीछे है. इसलिए पूरी उम्मीद है कि धुरंधर 2 इस उपलब्धि को हासिल कर इतिहास रच सकती है.
MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे. Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है. रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे. गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.
Bihar New CM: नीतीश कुमार के बाद अब बिहार में बीजेपी का सीएम बनना लगभग तय है. सूत्रों ने बताया कि नीतीश कुमार 10 अप्रैल तक सीएम पद पर बने रहेंगे, वो तुरंत पद से इस्तीफा नहीं देंगे. बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय, कब होगा नई सरकार का गठन? जानिए पूरा राजनीतिक घटनाक्रम बिहार की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। लगभग दो दशकों तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने हाल ही में राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया है, जिसके बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे और राज्य में नई सरकार का गठन होगा। नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है—क्या राज्य को पहली बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मुख्यमंत्री मिलेगा? क्या एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन बदलने वाला है? और आखिर नई सरकार का गठन कब होगा? इन सभी सवालों पर सियासी गलियारों में तेजी से चर्चा चल रही है। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना क्यों बड़ा फैसला माना जा रहा नीतीश कुमार वर्ष 2005 से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और वे कई बार मुख्यमंत्री बने। हाल ही में 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बड़ी जीत दिलाने के बाद उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। लेकिन अब उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया है। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बिहार की सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम एनडीए के भीतर एक नई रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें बीजेपी अब सीधे राज्य की कमान संभालना चाहती है। नीतीश कुमार ने स्वयं कहा है कि वे राज्य में बनने वाली नई सरकार को पूरा सहयोग और मार्गदर्शन देंगे। इसका मतलब यह है कि वे सक्रिय रूप से बिहार की राजनीति से पूरी तरह दूर नहीं होंगे, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी किसी और नेता के हाथ में होगी। नई सरकार का गठन कब होगा? राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे। बताया जा रहा है कि वे लगभग 10 अप्रैल तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं और उसके बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होगी। दरअसल, राज्यसभा का नया कार्यकाल अप्रैल से शुरू होने वाला है। इसी वजह से यह माना जा रहा है कि उसी समय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होगी। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक बिहार में नई सरकार के गठन की औपचारिक घोषणा हो सकती है। इस दौरान एनडीए के शीर्ष नेताओं के बीच कई दौर की बैठकों का सिलसिला भी चल रहा है। इन बैठकों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और नए मंत्रिमंडल की रूपरेखा पर चर्चा की जा रही है। क्या बिहार को पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री मिलेगा? अगर नीतीश कुमार पद छोड़ते हैं और बीजेपी का नेता मुख्यमंत्री बनता है तो यह बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा। अभी तक राज्य में बीजेपी सहयोगी दल के रूप में सत्ता में रही है, लेकिन मुख्यमंत्री पद उसके पास कभी नहीं रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा और पार्टी अब राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है। इसलिए यह संभावना काफी बढ़ गई है कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से ही होगा। संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन-कौन? नीतीश कुमार के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। इनमें बीजेपी और एनडीए के कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं। 1. सम्राट चौधरी सम्राट चौधरी वर्तमान में बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं और बीजेपी के बड़े ओबीसी चेहरों में गिने जाते हैं। संगठन और राजनीति दोनों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। 2. नित्यानंद राय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय भी संभावित उम्मीदवारों में शामिल हैं। वे लंबे समय से बीजेपी के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और बिहार में पार्टी के प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं। 3. कोई नया चेहरा राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि बीजेपी किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है। इससे सामाजिक समीकरण साधने और आगामी चुनावों की रणनीति मजबूत करने की कोशिश हो सकती है। एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन कैसे बदलेगा? अगर बीजेपी मुख्यमंत्री पद संभालती है तो एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव होगा। अभी तक जेडीयू के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चल रही थी। नीतीश कुमार लंबे समय तक बिहार की राजनीति में ‘किंगमेकर’ की भूमिका में रहे हैं। लेकिन उनके राज्यसभा जाने के बाद बीजेपी की भूमिका और मजबूत हो सकती है। इसके साथ ही जेडीयू के भविष्य को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में जेडीयू और बीजेपी के बीच नए समीकरण बन सकते हैं। विपक्ष की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि जनता ने जिस चेहरे पर वोट दिया था, वही मुख्यमंत्री पद छोड़ रहा है, जो लोकतांत्रिक नैतिकता के खिलाफ है। कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि बीजेपी ने राजनीतिक रणनीति के तहत सत्ता परिवर्तन की योजना बनाई है। हालांकि एनडीए के नेता इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं। बिहार की राजनीति पर संभावित असर नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो सकता है। लगभग 20 साल तक राज्य की राजनीति का केंद्र रहे नेता के हटने से सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है। इसके कई संभावित प्रभाव हो सकते हैं: बीजेपी का प्रभाव बढ़ेगा जेडीयू की भूमिका बदल सकती है विपक्ष नई रणनीति बना सकता है सामाजिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है क्या नीतीश कुमार की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका बढ़ेगी? नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। वे पहले भी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर उनका अनुभव काफी लंबा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि संसद में उनकी उपस्थिति एनडीए के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकती है। बिहार में सत्ता परिवर्तन क्यों अहम है? बिहार भारत के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। यहां होने वाला कोई भी बड़ा राजनीतिक बदलाव राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करता है। अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है तो यह पार्टी के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि अब तक बिहार उन कुछ हिंदीभाषी राज्यों में शामिल था जहां बीजेपी का मुख्यमंत्री नहीं रहा था। आने वाले दिनों में क्या होगा? अगले कुछ सप्ताह बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। संभावित घटनाक्रम इस प्रकार हो सकते हैं: नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे एनडीए विधायक दल की बैठक होगी नए मुख्यमंत्री का चयन होगा नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होगा राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, अप्रैल के आसपास यह पूरी प्रक्रिया पूरी हो सकती है।