मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति या तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका असर आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे तनावपूर्ण हालात ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार ने एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति को संतुलित बनाए रखने के लिए बुकिंग नियमों में बड़ा बदलाव किया है।
सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी सिलेंडर की अगली बुकिंग के लिए न्यूनतम अंतराल को बढ़ाकर 45 दिन कर दिया है। इससे पहले उपभोक्ता अपेक्षाकृत कम समय में भी सिलेंडर बुक कर सकते थे, लेकिन हाल के दिनों में अचानक बढ़ी मांग और संभावित आपूर्ति दबाव को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि यह कदम आपूर्ति प्रबंधन को बेहतर बनाने और पैनिक बुकिंग पर रोक लगाने के लिए उठाया गया है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ता देशों में से एक है। देश में करोड़ों परिवार खाना बनाने के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं। पिछले कुछ वर्षों में उज्ज्वला योजना जैसी सरकारी योजनाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी एलपीजी का उपयोग तेजी से बढ़ा है।
हालांकि, हाल के दिनों में सरकार और तेल कंपनियों ने यह देखा कि कुछ उपभोक्ता बहुत कम अंतराल में सिलेंडर बुक करने लगे हैं। मंत्रालय के अनुसार पहले ग्रामीण उपभोक्ता औसतन लगभग 55 दिनों में एक सिलेंडर बुक करते थे। लेकिन हालिया दिनों में कई उपभोक्ता 10 से 15 दिन के भीतर ही नई बुकिंग करने लगे।
इस तरह की पैनिक बुकिंग से सप्लाई सिस्टम पर अचानक दबाव बढ़ने लगा। अगर ऐसा लगातार जारी रहता तो कई क्षेत्रों में वास्तविक कमी की स्थिति भी पैदा हो सकती थी। इसी संभावित संकट को रोकने के लिए सरकार ने यह नियम लागू किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिलेंडर लेने के बाद अगली बुकिंग कम से कम 45 दिन बाद ही की जा सकेगी।
सरकार का कहना है कि इससे आपूर्ति को संतुलित रखने और सभी उपभोक्ताओं तक गैस पहुंचाने में मदद मिलेगी।
मध्य पूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। अगर इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है तो इसका असर सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने पहले ही कच्चे तेल और गैस के अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह तनाव और बढ़ता है तो ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर घरेलू कीमतों और सप्लाई पर पड़ना स्वाभाविक है।
एलपीजी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इसलिए सरकार पहले से ही सप्लाई चेन को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने की कोशिश कर रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी का उपयोग बढ़ा जरूर है, लेकिन अभी भी कई परिवार पारंपरिक ईंधन जैसे लकड़ी, गोबर के कंडे और सिगड़ी का इस्तेमाल करते हैं।
इंदौर जिले के खाद्य आपूर्ति एवं नियंत्रक मोहन मारू का कहना है कि गांवों में गैस की खपत शहरों की तुलना में कम होती है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कई परिवार वैकल्पिक ईंधन का उपयोग करते हैं।
उनके मुताबिक पहले 21 दिन के भीतर भी बुकिंग हो जाती थी, लेकिन तेल कंपनियों ने अब 45 दिन का अंतराल निर्धारित कर दिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल किसी तरह की गैस की वास्तविक किल्लत नहीं है और अगर भविष्य में कोई शिकायत आती है तो जिला प्रशासन स्थिति की समीक्षा कर आवश्यक निर्णय लेगा।
सरकार के इस फैसले को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सप्लाई संतुलित रखने के लिए जरूरी कदम मान रहे हैं, जबकि कई उपभोक्ता इसे अपने लिए मुश्किल बता रहे हैं।
इंदौर जिले के देपालपुर गांव की रहने वाली रानू राव ने कहा कि 45 दिन का अंतराल बहुत लंबा है। उनके अनुसार उनके परिवार में सदस्य ज्यादा हैं और रोजमर्रा की जरूरतों के कारण गैस जल्दी खत्म हो जाती है।
उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि सिलेंडर बुकिंग का अंतराल 15 से 20 दिन के बीच रखा जाए। उनका कहना है कि अगर गैस समय पर नहीं मिली तो लोगों को फिर से पुराने दिनों की तरह जंगल जाकर लकड़ी लानी पड़ेगी।
इसी तरह गांव की एक अन्य महिला शांति बाई ने भी कहा कि पहले की तरह आसानी से सिलेंडर मिलना चाहिए। उनके अनुसार लंबे इंतजार से घर के कामकाज पर असर पड़ता है।
जहां एक ओर बुकिंग नियमों में बदलाव हुआ है, वहीं दूसरी ओर तकनीकी समस्याओं ने भी कई शहरों में गैस उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
मध्य प्रदेश के कई प्रमुख शहरों में एलपीजी बुकिंग से जुड़े सर्वर ठप होने की खबरें सामने आई हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, उज्जैन और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में उपभोक्ता ऑनलाइन बुकिंग नहीं कर पा रहे हैं।
सर्वर समस्या के कारण गैस एजेंसियों में भारी भीड़ देखने को मिल रही है। लोग सुबह से ही एजेंसियों के बाहर लाइन में खड़े हो रहे हैं ताकि किसी तरह अपनी बुकिंग दर्ज कर सकें।
इसके अलावा वेटिंग पीरियड भी बढ़ गया है। कई जगहों पर सिलेंडर मिलने में 7 से 8 दिन तक का समय लग रहा है।
ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम प्रभावित होने के कारण गैस एजेंसियों पर अचानक दबाव बढ़ गया है। पहले जहां अधिकतर उपभोक्ता मोबाइल ऐप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए गैस बुक कर लेते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग सीधे एजेंसियों पर पहुंच रहे हैं।
इससे एजेंसियों के कर्मचारियों पर भी काम का बोझ बढ़ गया है। कई जगहों पर बुकिंग और डिलीवरी प्रक्रिया धीमी पड़ गई है।
तेल कंपनियों और प्रशासन का कहना है कि तकनीकी समस्या को जल्द ठीक करने की कोशिश की जा रही है ताकि बुकिंग प्रक्रिया सामान्य हो सके।
सरकार का कहना है कि एलपीजी सप्लाई को लेकर किसी तरह की वास्तविक कमी नहीं है। बुकिंग नियमों में बदलाव केवल सप्लाई मैनेजमेंट के लिए किया गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार अगर लोग जरूरत से पहले ही बार-बार बुकिंग करने लगेंगे तो इससे सिस्टम पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा और कुछ क्षेत्रों में असमान वितरण की स्थिति पैदा हो सकती है।
सरकार का दावा है कि 45 दिन का अंतराल औसत खपत के आधार पर तय किया गया है और इससे अधिकांश उपभोक्ताओं को कोई बड़ी परेशानी नहीं होगी।
भारत में एलपीजी उपभोक्ताओं की संख्या पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए।
इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को धुएं से होने वाली बीमारियों से बचाना और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना था।
हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी का नियमित उपयोग अभी भी चुनौती बना हुआ है। इसके पीछे सिलेंडर की कीमत, आय का स्तर और वैकल्पिक ईंधन की उपलब्धता जैसे कई कारण हैं।
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह कदम अस्थायी हो सकता है और इसका उद्देश्य केवल संभावित संकट को रोकना है।
उनके अनुसार अगर मध्य पूर्व में तनाव कम हो जाता है और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार स्थिर रहता है तो भविष्य में ऐसे प्रतिबंधों की जरूरत नहीं पड़ेगी।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि एलपीजी वितरण प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है ताकि तकनीकी समस्याओं या अचानक बढ़ी मांग से उपभोक्ताओं को परेशानी न हो।
मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है। अगर सप्लाई सामान्य रहती है और मांग में स्थिरता आती है तो बुकिंग नियमों में फिर से बदलाव किया जा सकता है।
दूसरी ओर अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा संकट गहराता है तो सरकार को आपूर्ति प्रबंधन के लिए और भी कदम उठाने पड़ सकते हैं।
फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां दोनों यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं कि देश के किसी भी हिस्से में एलपीजी की वास्तविक कमी न हो।
MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे. Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है. रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे. गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.
UP News In Hindi: सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राज्य के शिक्षकों समेत लाखों को कर्मचारियों के लिए बड़े तोहफे का ऐलान कर दिया है. इसके लिए सरकार की तरफ से आदेश जारी किया गया है होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह पर्व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को और रंगों की होली 4 मार्च को पड़ रही है। सामान्यतः सरकारी कर्मचारियों का वेतन महीने के अंतिम या अगले महीने के प्रारंभिक दिनों में जारी होता है, लेकिन इस बार त्योहार और अवकाश के कारण वेतन भुगतान की तिथि प्रभावित हो रही थी। रविवार (1 मार्च) को साप्ताहिक अवकाश तथा 2 मार्च को होलिका दहन होने के कारण नियमित प्रक्रिया से वेतन जारी करना संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए शनिवार (28 फरवरी) को ही वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर त्वरित समन्वय और संवेदनशीलता को दर्शाता है। शिक्षा विभाग की भूमिका स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय की ओर से 2 मार्च से पहले वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए। यह आदेश उत्तर प्रदेश स्कूल शिक्षा महानिदेशक मोनिका रानी द्वारा जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि सभी संबंधित अधिकारी और वित्तीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करें कि होलिका दहन से पहले शिक्षकों और कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंच जाए। शिक्षा विभाग राज्य का एक बड़ा विभाग है, जिसमें बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, राजकीय इंटर कॉलेज, सहायता प्राप्त विद्यालय और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से पहले वेतन देने के लिए विभाग को वित्तीय और तकनीकी स्तर पर व्यापक तैयारी करनी पड़ी। ट्रेजरी, बैंकिंग प्रणाली और जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित कर भुगतान प्रक्रिया को तेज किया गया। वित्त विभाग ने भी इस संबंध में शासनादेश जारी किया। आदेश में स्पष्ट किया गया कि अवकाश के कारण नियमित तिथि पर वेतन भुगतान संभव नहीं था, इसलिए विशेष अनुमति के तहत अग्रिम भुगतान का निर्णय लिया गया है। इस फैसले को राज्यपाल Anandiben Patel की मंजूरी प्राप्त होने के बाद लागू किया गया। राज्यपाल की स्वीकृति का उल्लेख इस बात का संकेत है कि यह निर्णय केवल विभागीय स्तर का नहीं बल्कि उच्च प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया है। इससे आदेश की वैधता और गंभीरता स्पष्ट होती है। प्रशासनिक समन्वय और कार्यान्वयन राज्य सरकार की ओर से सभी जिलाधिकारियों और विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया कि वे अपने-अपने विभागों में तैनात कर्मचारियों का वेतन 28 फरवरी तक हर हाल में जारी करें। साथ ही आदेश के पालन को लेकर सख्त हिदायत दी गई। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी को गंभीरता से लिया जाएगा। वेतन भुगतान की प्रक्रिया में निम्नलिखित स्तरों पर कार्य हुआ: वेतन बिलों की समयपूर्व तैयारी – संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) को समय से पहले वेतन बिल तैयार करने के निर्देश दिए गए। ट्रेजरी की सक्रियता – कोषागार कार्यालयों को अतिरिक्त समय तक कार्य कर बिल पास करने को कहा गया। बैंकिंग समन्वय – बैंकों के साथ समन्वय कर यह सुनिश्चित किया गया कि भुगतान समय से कर्मचारियों के खातों में पहुंचे। डिजिटल प्रक्रिया का उपयोग – ई-भुगतान प्रणाली के माध्यम से प्रक्रिया को त्वरित और पारदर्शी बनाया गया कर्मचारियों में खुशी की लहर इस निर्णय के बाद सरकारी कर्मचारियों में व्यापक खुशी देखी गई। त्योहारों के समय परिवारों की जरूरतें बढ़ जाती हैं—नए कपड़े, मिठाइयां, रंग-गुलाल, बच्चों के लिए उपहार, रिश्तेदारों के यहां आने-जाने का खर्च आदि। ऐसे समय यदि वेतन में देरी हो जाए तो असुविधा होती है। सरकार द्वारा समय से पहले वेतन जारी करने से कर्मचारियों को आर्थिक रूप से राहत मिली है। विशेष रूप से शिक्षकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक अक्सर स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उनके पास वेतन आने से स्थानीय बाजारों में भी रौनक बढ़ती है। आर्थिक प्रभाव राज्य के लाखों कर्मचारियों को एक साथ वेतन जारी होने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा। होली के अवसर पर खरीदारी बढ़ने की संभावना है, जिससे व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को भी लाभ होगा। वस्त्र, मिठाई, रंग-गुलाल, घरेलू सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि हो सकती है। यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाला भी माना जा सकता है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से छोटे व्यापारियों की आय में वृद्धि होती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधि में तेजी आती है। राजनीतिक और सामाजिक संदेश Yogi Adityanath की सरकार का यह निर्णय कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है। त्योहारों के समय इस प्रकार के निर्णय कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाते हैं और सरकार के प्रति सकारात्मक भावना उत्पन्न करते हैं। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे संतुष्ट और प्रेरित हों तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से होता है। समय पर वेतन भुगतान कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान भी है। पहले भी मिल चुकी हैं ऐसी सौगातें पिछले वर्षों में भी त्योहारों से पहले बोनस या अग्रिम वेतन जैसी घोषणाएं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की जाती रही हैं। हालांकि हर बार परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इस बार अवकाश और त्योहार की तिथियों के कारण यह निर्णय आवश्यक हो गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि समय से पहले वेतन देने का निर्णय प्रशासनिक कुशलता का परिचायक है, क्योंकि इसमें बजटीय प्रबंधन और नकदी प्रवाह का संतुलन बनाए रखना होता है। संभावित चुनौतियां हालांकि आदेश जारी कर दिया गया है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि किसी विभाग में तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजी कमी या बैंकिंग समस्या उत्पन्न होती है तो कुछ कर्मचारियों को असुविधा हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। कर्मचारियों की अपेक्षाएं इस निर्णय के बाद कर्मचारियों में यह अपेक्षा भी बढ़ी है कि भविष्य में भी त्योहारों के समय इसी प्रकार की संवेदनशीलता दिखाई जाएगी। साथ ही वे नियमित वेतन भुगतान, महंगाई भत्ता, पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से संबंधित मुद्दों पर भी सरकार से सकारात्मक रुख की आशा रखते हैं। UP NEWSYogi AdityanathHoli 2026
Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमत आज घटी या बढ़ी? जानें 28 फरवरी को दिल्ली से मुंबई तक क्या हैं ताजा भाव सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज का ताजा भाव क्या है? Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से बाजार में लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज शनिवार 28 फरवरी के कारोबारी दिन सोने-चांदी का ताजा भाव क्या है? सोने के आउटलुक पर जेपी मॉर्गन का अपडेट वैश्विक बाजार में सोने को लेकर नई उम्मीदें जताई जा रही हैं. जेपी मॉर्गन ने अपना लॉन्ग-टर्म प्राइस टारगेट बढ़ाकर 4,500 डॉलर प्रति औंस कर दिया है. जबकि 2026 के अंत के लिए 6,300 डॉलर प्रति औंस का अनुमान पहले की तरह कायम रखा है. जेपी मॉर्गन के अनुसार निवेशकों के पोर्टफोलियो में स्ट्रक्चरल डायवर्सिफिकेशन का रुझान अभी जारी है. जिससे आगे भी सोने में तेजी की संभावना बनी रह सकती है. चांदी के ताजा भाव दिल्ली, मंबई, कोलकाता और चेन्नई में चांदी की कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है. दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में 10 ग्राम चांदी आज 2,950 रुपये की दर पर बिक रहा है. वहीं, 100 ग्राम चांदी खरीदने के लिए ग्राहकों को 29,500 रुपये खर्च करने होंगे. चेन्नई में 10 ग्राम चांदी की कीमत 3,000 रुपये चल रही है. आपके शहर में सोने का भाव (गुड रिटर्न के अनुसार) दिल्ली में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए मुंबई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए चेन्नई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,65,820 रुपए 22 कैरेट - 1,52,000 रुपए 18 कैरेट - 1,30,100 रुपए कोलकाता में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए अहमदाबाद में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए लखनऊ में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए पटना में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए हैदराबाद में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए
Causes Of Bloating And Gas: हम क्या खाते हैं, इसका हमारी सेहत पर काफी असर होता है. चलिए आपको बताते हैं कि किन फूड कॉम्बिनेशन से आपको बचना चाहिए और आयुर्वेद इसको लेकर क्या कहता है Which Foods Should Not Be Eaten Together: खाना खाते समय हमें कुछ चीजों का ध्यान रखने की जरूरत होती है. हम क्या खाते हैं और किन चीजों को साथ में मिलाकर खाते हैं, इसका सीधा असर हमारे डाइजेशन शक्ति पर पड़ता है. गलत फूड कॉम्बिनेशन पाचन को बिगाड़ सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक तत्व जमा कर सकते हैं. इसका नतीजा गैस, पेट फूलना, एसिडिटी, त्वचा संबंधी समस्याएं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ सकता है. चलिए आपको आयुर्वेद के हिसाब से बताते हैं कि किन कॉम्बिनेशन से हमें बचना चाहिए. क्या कहता है आयुर्वेद? आयुर्वेद के बारे में जानकारी देने वाली संस्था kevaayurveda के अनुसार, आयुर्वेद मानता है कि हर व्यक्ति की वात, पित्त, कफ और पाचन क्षमता अलग होती है कुछ खानें की चीजें एक-दूसरे के विपरीत गुण रखते हैं. यदि इन्हें बार-बार साथ में खाया जाए तो डाइजेशन सिस्टम पर अतिरिक्त प्रेशर पड़ता है. इससे गैस, कब्ज, सीने में जलन, मुंहासे, कमजोर इम्यूनिटी और डाइजेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. किन फूड कॉम्बिनेशन से बचना चाहिए? kevaayurveda के अनुसार, कुछ प्रमुख गलत फूड कॉम्बिनेशन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है, उनमें सबसे पहले आता है दूध और मछली. आयुर्वेद के अनुसार दूध ठंडा और भारी होता है, जबकि मछली गर्म तासीर वाली मानी जाती है. दोनों को साथ लेने से पाचन गड़बड़ा सकता है और स्किन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसी तरह दूध के साथ खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू या अनानास भी ठीक नहीं माने जाते, क्योंकि ये पेट में दूध को फाड़ सकते हैं और गैस या एसिडिटी बढ़ा सकते हैं. गरम भोजन के साथ शहद मिलाना भी आयुर्वेद में हानिकारक बताया गया है. शहद को गर्म करने से उसके गुण बदल सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक प्रभाव पैदा हो सकता है. भारी भोजन के तुरंत बाद फल खाना भी उचित नहीं माना जाता, क्योंकि फल जल्दी पचते हैं और भारी भोजन के साथ पेट में फर्मेंटेशन शुरू कर सकते हैं. दही और चीनी का मेल भी पाचन के लिए अनुकूल नहीं माना जाता. दही पहले से ही खट्टा और ठंडा होता है, जबकि रिफाइंड चीनी शरीर में असंतुलन बढ़ा सकती है. रात में दही को फल या ठंडी चीजों के साथ लेना कफ बढ़ा सकता है, जिससे सर्दी-खांसी या साइनस की समस्या हो सकती है. बासी भोजन के साथ दूध लेना भी पाचन के लिए सही नहीं माना गया. किन चीजों का सेवन करना चाहिए? आयुर्वेद सलाह देता है कि मौसमी आहार लें, जरूरत से ज्यादा न खाएं और अदरक, जीरा, सौंफ जैसे मसालों का उपयोग करें, जो डाइजेशन को मजबूत बनाते हैं. सही फूड कॉम्बिनेशन अपनाने से डाइजेशन मजबूत रहती है, न्यूट्रिशन तत्वों का ऑब्जर्वेशन बेहतर होता है और शरीर संतुलित रहता है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए यह नियम और भी लाभकारी माने जाते हैं.
रश्मिका-विजय के रिसेप्शन में बिना चप्पल-जूते पहने पहुंचे रामचरण, वजह जान हो जाएंगे हैरान Ramcharan: हैदराबाद में हुए ग्रैंड रिसेप्शन में रश्मिका और विजय ने खूब चर्चा बटोरी. हालांकि सबसे ज्यादा ध्यान राम चरण के अलग अंदाज ने खींचा, जहां वो काले कपड़ों और नंगे पैर में नजर आए. साउथ फिल्म इंडस्ट्री के पॉपुलर कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. 4 मार्च को हैदराबाद में दोनों ने एक भव्य रिसेप्शन का आयोजन किया गया, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े सितारे शामिल हुए. इस खास मौके पर जहां हर कोई कपल को बधाई देने पहुंचा, वहीं एक्टर राम चरण अपने अनोखे अंदाज की वजह से सबसे ज्यादा चर्चा में आ गए. नंगे पैर रिसेप्शन में आए रामचरण रिसेप्शन में राम चरण अपनी पत्नी उपासना के साथ पहुंचे थे. उन्होंने सिर से पैर तक काले रंग के कपड़े पहने हुए थे. लेकिन लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा इस बात ने खींचा कि वो बिना जूते-चप्पल के, यानी नंगे पैर ही कार्यक्रम में आए थे. उन्हें इस तरह देखकर कई लोग हैरान रह गए और सोशल मीडिया पर भी उनकी तस्वीरें तेजी से वायरल होने लगीं. लेकिन इसके पीछे एक खास धार्मिक वजह है. राम चरण इन दिनों 'अयप्पा दीक्षा' का पालन कर रहे हैं. ये भगवान अयप्पा के भक्तों द्वारा किया जाने वाला एक कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है. इस व्रत के दौरान भक्तों को कुछ नियमों का सख्ती से पालन करना पड़ता है. 41 दिन की दीक्षा ले रहे रामचरण व्रत में काले या नीले रंग के कपड़े पहनना, सादगी से रहना और 41 दिनों तक नंगे पैर रहना शामिल होता है. इसी कारण राम चरण रिसेप्शन में भी बिना जूते के नजर आए. अयप्पा दीक्षा को अनुशासित और कठिन माना जाता है. इस बीच भक्तों को पूरी तरह ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है. साथ ही मांसाहारी भोजन, शराब से दूर रहना और बाल या दाढ़ी भी नहीं कटवाना होता है. ये व्रत सबरीमाला मंदिर की यात्रा से पहले किया जाता है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब राम चरण इस तरह नंगे पैर नजर आए हों. इससे पहले 2023 में ऑस्कर समारोह में शामिल होने से पहले भी वह अयप्पा दीक्षा का पालन करते हुए दिखाई दिए थे.
LPG Crisis In Madhya Pradesh: मध्य पूर्व संकट के कारण एलपीजी आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है. सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में सिलेंडर बुकिंग नियम बदले हैं, अब 45 दिन के अंतराल पर ही बुकिंग होगी. मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति या तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका असर आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे तनावपूर्ण हालात ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार ने एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति को संतुलित बनाए रखने के लिए बुकिंग नियमों में बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी सिलेंडर की अगली बुकिंग के लिए न्यूनतम अंतराल को बढ़ाकर 45 दिन कर दिया है। इससे पहले उपभोक्ता अपेक्षाकृत कम समय में भी सिलेंडर बुक कर सकते थे, लेकिन हाल के दिनों में अचानक बढ़ी मांग और संभावित आपूर्ति दबाव को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि यह कदम आपूर्ति प्रबंधन को बेहतर बनाने और पैनिक बुकिंग पर रोक लगाने के लिए उठाया गया है। क्यों बढ़ा LPG बुकिंग का अंतराल भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ता देशों में से एक है। देश में करोड़ों परिवार खाना बनाने के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं। पिछले कुछ वर्षों में उज्ज्वला योजना जैसी सरकारी योजनाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी एलपीजी का उपयोग तेजी से बढ़ा है। हालांकि, हाल के दिनों में सरकार और तेल कंपनियों ने यह देखा कि कुछ उपभोक्ता बहुत कम अंतराल में सिलेंडर बुक करने लगे हैं। मंत्रालय के अनुसार पहले ग्रामीण उपभोक्ता औसतन लगभग 55 दिनों में एक सिलेंडर बुक करते थे। लेकिन हालिया दिनों में कई उपभोक्ता 10 से 15 दिन के भीतर ही नई बुकिंग करने लगे। इस तरह की पैनिक बुकिंग से सप्लाई सिस्टम पर अचानक दबाव बढ़ने लगा। अगर ऐसा लगातार जारी रहता तो कई क्षेत्रों में वास्तविक कमी की स्थिति भी पैदा हो सकती थी। इसी संभावित संकट को रोकने के लिए सरकार ने यह नियम लागू किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में सिलेंडर लेने के बाद अगली बुकिंग कम से कम 45 दिन बाद ही की जा सकेगी। सरकार का कहना है कि इससे आपूर्ति को संतुलित रखने और सभी उपभोक्ताओं तक गैस पहुंचाने में मदद मिलेगी। मध्य पूर्व का संकट और ऊर्जा बाजार मध्य पूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। अगर इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है तो इसका असर सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने पहले ही कच्चे तेल और गैस के अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह तनाव और बढ़ता है तो ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर घरेलू कीमतों और सप्लाई पर पड़ना स्वाभाविक है। एलपीजी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इसलिए सरकार पहले से ही सप्लाई चेन को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने की कोशिश कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी की वास्तविक खपत सरकारी आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी का उपयोग बढ़ा जरूर है, लेकिन अभी भी कई परिवार पारंपरिक ईंधन जैसे लकड़ी, गोबर के कंडे और सिगड़ी का इस्तेमाल करते हैं। इंदौर जिले के खाद्य आपूर्ति एवं नियंत्रक मोहन मारू का कहना है कि गांवों में गैस की खपत शहरों की तुलना में कम होती है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कई परिवार वैकल्पिक ईंधन का उपयोग करते हैं। उनके मुताबिक पहले 21 दिन के भीतर भी बुकिंग हो जाती थी, लेकिन तेल कंपनियों ने अब 45 दिन का अंतराल निर्धारित कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल किसी तरह की गैस की वास्तविक किल्लत नहीं है और अगर भविष्य में कोई शिकायत आती है तो जिला प्रशासन स्थिति की समीक्षा कर आवश्यक निर्णय लेगा। उपभोक्ताओं की चिंता सरकार के इस फैसले को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सप्लाई संतुलित रखने के लिए जरूरी कदम मान रहे हैं, जबकि कई उपभोक्ता इसे अपने लिए मुश्किल बता रहे हैं। इंदौर जिले के देपालपुर गांव की रहने वाली रानू राव ने कहा कि 45 दिन का अंतराल बहुत लंबा है। उनके अनुसार उनके परिवार में सदस्य ज्यादा हैं और रोजमर्रा की जरूरतों के कारण गैस जल्दी खत्म हो जाती है। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि सिलेंडर बुकिंग का अंतराल 15 से 20 दिन के बीच रखा जाए। उनका कहना है कि अगर गैस समय पर नहीं मिली तो लोगों को फिर से पुराने दिनों की तरह जंगल जाकर लकड़ी लानी पड़ेगी। इसी तरह गांव की एक अन्य महिला शांति बाई ने भी कहा कि पहले की तरह आसानी से सिलेंडर मिलना चाहिए। उनके अनुसार लंबे इंतजार से घर के कामकाज पर असर पड़ता है। मध्य प्रदेश में तकनीकी समस्या ने बढ़ाई परेशानी जहां एक ओर बुकिंग नियमों में बदलाव हुआ है, वहीं दूसरी ओर तकनीकी समस्याओं ने भी कई शहरों में गैस उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मध्य प्रदेश के कई प्रमुख शहरों में एलपीजी बुकिंग से जुड़े सर्वर ठप होने की खबरें सामने आई हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, उज्जैन और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में उपभोक्ता ऑनलाइन बुकिंग नहीं कर पा रहे हैं। सर्वर समस्या के कारण गैस एजेंसियों में भारी भीड़ देखने को मिल रही है। लोग सुबह से ही एजेंसियों के बाहर लाइन में खड़े हो रहे हैं ताकि किसी तरह अपनी बुकिंग दर्ज कर सकें। इसके अलावा वेटिंग पीरियड भी बढ़ गया है। कई जगहों पर सिलेंडर मिलने में 7 से 8 दिन तक का समय लग रहा है। गैस एजेंसियों पर बढ़ा दबाव ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम प्रभावित होने के कारण गैस एजेंसियों पर अचानक दबाव बढ़ गया है। पहले जहां अधिकतर उपभोक्ता मोबाइल ऐप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए गैस बुक कर लेते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग सीधे एजेंसियों पर पहुंच रहे हैं। इससे एजेंसियों के कर्मचारियों पर भी काम का बोझ बढ़ गया है। कई जगहों पर बुकिंग और डिलीवरी प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। तेल कंपनियों और प्रशासन का कहना है कि तकनीकी समस्या को जल्द ठीक करने की कोशिश की जा रही है ताकि बुकिंग प्रक्रिया सामान्य हो सके। सरकार का तर्क सरकार का कहना है कि एलपीजी सप्लाई को लेकर किसी तरह की वास्तविक कमी नहीं है। बुकिंग नियमों में बदलाव केवल सप्लाई मैनेजमेंट के लिए किया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार अगर लोग जरूरत से पहले ही बार-बार बुकिंग करने लगेंगे तो इससे सिस्टम पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा और कुछ क्षेत्रों में असमान वितरण की स्थिति पैदा हो सकती है। सरकार का दावा है कि 45 दिन का अंतराल औसत खपत के आधार पर तय किया गया है और इससे अधिकांश उपभोक्ताओं को कोई बड़ी परेशानी नहीं होगी। उज्ज्वला योजना के बाद बढ़ी एलपीजी पहुंच भारत में एलपीजी उपभोक्ताओं की संख्या पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए। इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को धुएं से होने वाली बीमारियों से बचाना और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना था। हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी का नियमित उपयोग अभी भी चुनौती बना हुआ है। इसके पीछे सिलेंडर की कीमत, आय का स्तर और वैकल्पिक ईंधन की उपलब्धता जैसे कई कारण हैं। विशेषज्ञ क्या कहते हैं ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह कदम अस्थायी हो सकता है और इसका उद्देश्य केवल संभावित संकट को रोकना है। उनके अनुसार अगर मध्य पूर्व में तनाव कम हो जाता है और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार स्थिर रहता है तो भविष्य में ऐसे प्रतिबंधों की जरूरत नहीं पड़ेगी। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि एलपीजी वितरण प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है ताकि तकनीकी समस्याओं या अचानक बढ़ी मांग से उपभोक्ताओं को परेशानी न हो। आगे क्या हो सकता है मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है। अगर सप्लाई सामान्य रहती है और मांग में स्थिरता आती है तो बुकिंग नियमों में फिर से बदलाव किया जा सकता है। दूसरी ओर अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा संकट गहराता है तो सरकार को आपूर्ति प्रबंधन के लिए और भी कदम उठाने पड़ सकते हैं। फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां दोनों यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं कि देश के किसी भी हिस्से में एलपीजी की वास्तविक कमी न हो।
US-Israel Iran War: मिडिल ईस्ट में चल रही जंग का खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है. ईरान ने स्ट्रेट होर्मुज बंद कर दिया है, जिससे भारत समेत कई देशों में गैस और तेल की किल्लत होने लगी है, ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध का असर: होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से गैस सप्लाई संकट, भारत ने जारी की प्रायोरिटी लिस्ट मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच Strait of Hormuz के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ने लगा है। Iran, Israel और United States के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के कारण यह रणनीतिक समुद्री मार्ग बाधित हो गया है, जिससे कच्चे तेल, एलपीजी और नेचुरल गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसी स्थिति को देखते हुए Ministry of Petroleum and Natural Gas ने नेचुरल गैस की सप्लाई को लेकर एक नई प्राथमिकता सूची जारी की है ताकि संभावित कमी की स्थिति में जरूरी सेक्टरों को पहले गैस उपलब्ध कराई जा सके। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अगर गैस की सप्लाई में कमी आती है तो सबसे पहले घरेलू उपभोक्ताओं और आम जनता से जुड़े क्षेत्रों को पूरी आपूर्ति दी जाएगी, जबकि औद्योगिक सेक्टरों को सीमित गैस दी जाएगी। इस फैसले का उद्देश्य आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित होने से बचाना और आवश्यक सेवाओं को सुचारू रूप से जारी रखना है। होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना अहम? Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के लगभग एक-तिहाई समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। मध्य-पूर्व के कई बड़े तेल और गैस उत्पादक देश जैसे Saudi Arabia, United Arab Emirates, Kuwait और Qatar अपने ऊर्जा उत्पादों को इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक भेजते हैं। अगर यह मार्ग बंद हो जाता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर सीधा असर पड़ता है। जहाजों की आवाजाही रुकने से तेल और गैस की कीमतों में तेजी आ जाती है और आयात पर निर्भर देशों को सप्लाई संकट का सामना करना पड़ता है। भारत भी ऐसे ही देशों में शामिल है, जो अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। भारत की ऊर्जा जरूरतें और आयात पर निर्भरता भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है। देश में तेजी से बढ़ती आबादी, शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन घरेलू उत्पादन इस मांग को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाता। इसलिए भारत को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, एलपीजी और प्राकृतिक गैस आयात करनी पड़ती है। एलपीजी के मामले में भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा आयात करता है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व के देशों से आता है और इनकी समुद्री सप्लाई का प्रमुख रास्ता Strait of Hormuz ही है। यही वजह है कि इस मार्ग के बंद होने का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। सरकार की नई गैस प्रायोरिटी लिस्ट संभावित संकट को देखते हुए Ministry of Petroleum and Natural Gas ने गैस वितरण के लिए स्पष्ट प्राथमिकता तय की है। इसके तहत कुछ सेक्टरों को 100 प्रतिशत गैस सप्लाई दी जाएगी, जबकि कुछ क्षेत्रों में कटौती की जाएगी। सरकार का कहना है कि आम नागरिकों से जुड़े सेक्टरों को किसी भी हालत में प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा। इसलिए घरेलू इस्तेमाल और सार्वजनिक परिवहन से जुड़े क्षेत्रों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। किन सेक्टरों को मिलेगी 100% गैस सप्लाई सरकार की प्राथमिकता सूची के मुताबिक निम्नलिखित क्षेत्रों को गैस की पूरी सप्लाई दी जाएगी और इनमें कोई कटौती नहीं की जाएगी। 1. घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) घरों में पाइपलाइन के जरिए पहुंचने वाली गैस को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। यह गैस सीधे रसोई में खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होती है। सरकार का मानना है कि घरेलू रसोई गैस की कमी होने से करोड़ों परिवार प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए इसे टॉप प्रायोरिटी दी गई है। 2. CNG (वाहनों के लिए) पब्लिक ट्रांसपोर्ट और निजी वाहनों में इस्तेमाल होने वाली सीएनजी की सप्लाई भी पूरी तरह जारी रहेगी। देश के कई बड़े शहरों में ऑटो, टैक्सी और बसें सीएनजी पर चलती हैं। अगर इसकी कमी होती है तो सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। 3. LPG उत्पादन घरेलू रसोई गैस सिलेंडर बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली गैस की सप्लाई भी बिना किसी कटौती के जारी रहेगी। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि घरों में इस्तेमाल होने वाले एलपीजी सिलेंडरों की उपलब्धता बनी रहे। 4. पाइपलाइन संचालन गैस को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए पाइपलाइन नेटवर्क को लगातार चलाना जरूरी होता है। इसलिए पाइपलाइन संचालन के लिए जरूरी गैस को भी पूरी तरह उपलब्ध कराया जाएगा। किन सेक्टरों में होगी गैस कटौती सरकार ने औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में गैस सप्लाई सीमित करने का फैसला लिया है। इन सेक्टरों को उनके पिछले छह महीनों के औसत उपयोग के आधार पर कम गैस दी जाएगी। चाय उद्योग और अन्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर चाय उद्योग और अन्य मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को उनकी औसत खपत का केवल 80 प्रतिशत गैस दिया जाएगा। इससे उत्पादन की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन में कमी आ सकती है। खाद (फर्टिलाइजर) उद्योग खाद बनाने वाली कंपनियों को केवल 70 प्रतिशत गैस उपलब्ध कराई जाएगी। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उर्वरक उत्पादन में प्राकृतिक गैस का उपयोग एक प्रमुख कच्चे माल के रूप में होता है। तेल रिफाइनरीज रिफाइनरीज को उनके औसत उपयोग का केवल 65 प्रतिशत गैस मिलेगा। इससे पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। होटल और रेस्टोरेंट सेक्टर की चिंता होटल और रेस्टोरेंट उद्योग पहले ही इस संकट को लेकर चिंता जता चुका है। कई होटल एसोसिएशन का कहना है कि अगर कमर्शियल गैस की सप्लाई कम हुई तो बड़े शहरों में होटल और रेस्टोरेंट चलाना मुश्किल हो सकता है। खास तौर पर आईटी हब के रूप में प्रसिद्ध Bengaluru जैसे शहरों में होटल उद्योग गैस सप्लाई पर काफी निर्भर है। अगर सप्लाई में कमी आती है तो कई होटल अस्थायी रूप से बंद भी हो सकते हैं। सरकार ने यह फैसला क्यों लिया? सरकार का यह फैसला मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया है। भारत अपनी एलपीजी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और उसका अधिकांश हिस्सा मध्य-पूर्व से आता है। युद्ध के कारण समुद्री परिवहन प्रभावित होने से आयात में बाधा आई है। इसके चलते कमर्शियल एलपीजी की कमी पहले ही देखी जा रही है। ऐसे में घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देना सरकार की रणनीति का हिस्सा है। घरेलू एलपीजी को बचाने के लिए उठाए गए कदम सरकार ने घरेलू गैस की उपलब्धता बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। पहला, रिफाइनरीज को घरेलू एलपीजी का उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। इससे आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है। दूसरा, घरेलू गैस सिलेंडर की बुकिंग के बीच का अंतराल 21 दिनों से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपलब्ध स्टॉक ज्यादा समय तक चल सके। भारत के पास कितना एलपीजी स्टॉक है पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार देश में फिलहाल लगभग 40 दिनों के लिए पर्याप्त एलपीजी स्टॉक उपलब्ध है। यानी अगर आयात पूरी तरह रुक भी जाए तो भी कुछ समय तक घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। इसके अलावा सरकार वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश भी कर रही है। वैकल्पिक आयात के प्रयास भारत अब मध्य-पूर्व के अलावा अन्य देशों से गैस और एलपीजी आयात बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इनमें प्रमुख रूप से United States और Australia जैसे देश शामिल हैं। इन देशों से आयात बढ़ाकर भारत अपने ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाने की कोशिश कर रहा है ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके। लंबे संकट की स्थिति में क्या होगा? अगर मध्य-पूर्व में युद्ध लंबा चलता है और Strait of Hormuz लंबे समय तक बंद रहता है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। औद्योगिक उत्पादन में कमी आ सकती है, खासकर चाय उद्योग और उर्वरक उद्योग में। इससे कृषि क्षेत्र और निर्यात पर भी असर पड़ सकता है। साथ ही ऊर्जा कीमतों में वृद्धि होने से महंगाई भी बढ़ सकती है।
अमेरिका-ईरान जंग में भारत के पोर्ट्स से मिसाइल दागने का दावा: विदेश मंत्रालय ने बताया क्या है सच हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी एक खबर सोशल मीडिया और कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हुई। इस खबर में दावा किया गया कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और कथित सैन्य कार्रवाई के दौरान अमेरिका ने भारत के कुछ समुद्री बंदरगाहों (पोर्ट्स) का इस्तेमाल करते हुए ईरान पर मिसाइल हमले किए हैं। इस दावे ने भारत में राजनीतिक और कूटनीतिक बहस को जन्म दे दिया। कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या भारत वास्तव में अमेरिका की सैन्य रणनीति का हिस्सा बन गया है या यह केवल एक अफवाह है। इन दावों के वायरल होने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) को सामने आकर इस पूरे मामले पर सफाई देनी पड़ी। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि सोशल मीडिया पर चल रहे ऐसे दावे पूरी तरह गलत और भ्रामक हैं। मंत्रालय ने कहा कि भारत की भूमि, बंदरगाह या किसी भी सैन्य या नागरिक सुविधा का इस्तेमाल किसी तीसरे देश पर हमला करने के लिए नहीं किया गया है। इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि आखिर यह दावा शुरू कहां से हुआ, फिर भारत सरकार ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी, और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भारत की नीति क्या है। सबसे पहले बात करते हैं उस दावे की जिसने पूरे विवाद को जन्म दिया। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स और यूट्यूब चैनलों ने यह दावा किया कि अमेरिका ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियों के दौरान भारत के किसी पोर्ट या सैन्य सुविधा का उपयोग किया। इन पोस्ट्स में यह भी कहा गया कि भारत ने अमेरिका को ईरान के खिलाफ ऑपरेशन के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया। हालांकि इन दावों के समर्थन में कोई आधिकारिक प्रमाण या विश्वसनीय स्रोत सामने नहीं आया। इन पोस्ट्स के वायरल होते ही भारत के विदेश मंत्रालय से पत्रकारों ने इस बारे में सवाल पूछना शुरू कर दिया। इसके जवाब में मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में कहा कि यह खबर पूरी तरह निराधार है और इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और भारत किसी भी सैन्य संघर्ष में सीधे शामिल नहीं है। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत की नीति हमेशा से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने की रही है। भारत मध्य पूर्व के देशों के साथ संतुलित और मित्रतापूर्ण संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है। यही कारण है कि भारत ईरान, अमेरिका और इज़राइल सभी के साथ अलग-अलग स्तर पर कूटनीतिक और आर्थिक संबंध रखता है। भारत और ईरान के संबंधों की बात करें तो दोनों देशों के बीच लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक सहयोग रहा है। खासतौर पर चाबहार पोर्ट परियोजना भारत-ईरान संबंधों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत इस बंदरगाह के विकास में निवेश कर रहा है ताकि अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच आसान हो सके। ऐसे में यह कल्पना करना कि भारत अपनी ही रणनीतिक साझेदारी वाले देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में किसी दूसरे देश की मदद करेगा, काफी असंभव लगता है। दूसरी ओर भारत और अमेरिका के बीच भी पिछले दो दशकों में रक्षा और रणनीतिक सहयोग काफी मजबूत हुआ है। दोनों देशों ने कई रक्षा समझौते किए हैं, जैसे लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) और अन्य सैन्य सहयोग समझौते। इन समझौतों के तहत दोनों देश एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का सीमित लॉजिस्टिक उपयोग कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत किसी तीसरे देश के खिलाफ युद्ध में भाग ले रहा है। यही कारण है कि विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि भारत की भूमि का इस्तेमाल किसी भी आक्रामक सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं किया गया है। मंत्रालय ने लोगों से अपील की कि वे सोशल मीडिया पर फैल रही अपुष्ट खबरों पर भरोसा न करें और केवल आधिकारिक स्रोतों से ही जानकारी प्राप्त करें। इस विवाद के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि वर्तमान समय में मध्य पूर्व की भू-राजनीति काफी जटिल हो चुकी है। अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच तनाव लंबे समय से चला आ रहा है। कई बार इन देशों के बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष टकराव की स्थिति भी बनी है। ऐसे माहौल में किसी भी तरह की अफवाह या गलत सूचना बहुत तेजी से फैल जाती है और लोगों को भ्रमित कर देती है। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक दौर में सूचना युद्ध भी एक महत्वपूर्ण हथियार बन चुका है। कई बार जानबूझकर ऐसी खबरें फैलाई जाती हैं ताकि किसी देश की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके या कूटनीतिक तनाव बढ़ाया जा सके। इसलिए सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार लोगों से अपील करती रहती हैं कि वे फेक न्यूज से सावधान रहें। भारत के लिए मध्य पूर्व क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण है। यहां लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। इसलिए भारत की कोशिश रहती है कि वह इस क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए संतुलित नीति अपनाए। भारत ने हमेशा कहा है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद का समाधान कूटनीतिक बातचीत और शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। यही नीति भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी अपनाई थी और यही नीति मध्य पूर्व के मामलों में भी अपनाई जा रही है। यदि वास्तव में भारत किसी सैन्य कार्रवाई में शामिल होता तो यह एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन जाता और दुनिया भर के मीडिया में इसकी व्यापक रिपोर्टिंग होती। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिससे यह साफ हो जाता है कि सोशल मीडिया पर चल रहे दावे तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। विदेश मंत्रालय के बयान के बाद भी कुछ लोग इस विषय पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आधिकारिक बयान के बाद इस मामले में ज्यादा संदेह की गुंजाइश नहीं बचती। अंतरराष्ट्रीय मामलों में सरकारों के आधिकारिक बयान ही सबसे विश्वसनीय स्रोत माने जाते हैं। इस पूरे मामले से एक और महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि डिजिटल युग में खबरों की सत्यता की जांच करना बेहद जरूरी हो गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हर दिन लाखों सूचनाएं साझा की जाती हैं, जिनमें से कई पूरी तरह गलत या भ्रामक होती हैं। लोगों को चाहिए कि वे किसी भी सनसनीखेज खबर पर तुरंत विश्वास करने के बजाय विश्वसनीय समाचार संस्थानों और आधिकारिक सरकारी स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करें। इससे न केवल गलतफहमी से बचा जा सकता है बल्कि समाज में अनावश्यक तनाव भी कम किया जा सकता है। अंत में यह कहा जा सकता है कि अमेरिका द्वारा भारत के पोर्ट्स से ईरान पर मिसाइल दागने का दावा पूरी तरह निराधार है और भारत सरकार ने इसे स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। भारत की विदेश नीति स्वतंत्र, संतुलित और शांति-केंद्रित है, और फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि भारत किसी भी तरह से अमेरिका-ईरान संघर्ष में शामिल है। इसलिए नागरिकों और पाठकों के लिए यह जरूरी है कि वे केवल प्रमाणित और आधिकारिक जानकारी पर ही भरोसा करें और सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों से सावधान रहें।