भारत में कृषि सुधार की नई पहल: रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस की शुरुआत राजस्थान से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा हाल ही में किया गया एक महत्वपूर्ण ऐलान देश के कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Twitter (अब X) पर जानकारी देते हुए बताया कि भारत के अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन, विविध जलवायु, मिट्टी की संरचना, मौसम की परिस्थितियों और फसलों की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए अब देशभर में पाँच रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। इन कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर किसानों की समस्याओं को समझना, समाधान खोजना और कृषि क्षेत्र को अधिक सशक्त बनाना है। इस पहल की शुरुआत राजस्थान की पवित्र भूमि से की गई है, जिसे कृषि नवाचारों और पारंपरिक खेती के संगम के रूप में देखा जा रहा है। भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में कृषि केवल एक पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। अलग-अलग राज्यों में जलवायु, मिट्टी की गुणवत्ता और वर्षा के पैटर्न में भारी अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में गेहूं और धान की खेती प्रमुख है, जबकि दक्षिण भारत में चावल, नारियल और मसालों की खेती अधिक होती है। इसी तरह, पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में बाजरा और दालें उगाई जाती हैं। ऐसे में एक समान कृषि नीति या रणनीति पूरे देश पर लागू करना प्रभावी नहीं हो सकता। यही कारण है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने क्षेत्रीय स्तर पर कॉन्फ्रेंस आयोजित करने का निर्णय लिया है। इन रीजनल कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और अन्य संबंधित हितधारकों को एक मंच पर लाना है, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकें और क्षेत्र विशेष की चुनौतियों का समाधान खोज सकें। इन सम्मेलनों में जल प्रबंधन, मिट्टी की उर्वरता, आधुनिक तकनीक का उपयोग, फसल विविधीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसके अलावा, सरकार की विभिन्न योजनाओं और नीतियों के बारे में भी किसानों को जागरूक किया जाएगा, ताकि वे इनका अधिकतम लाभ उठा सकें। राजस्थान से इस पहल की शुरुआत करना भी एक रणनीतिक निर्णय माना जा रहा है। राजस्थान का अधिकांश हिस्सा शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु वाला है, जहां जल संकट और मिट्टी की उर्वरता बड़ी चुनौतियां हैं। इसके बावजूद यहां के किसानों ने अपने अनुभव और नवाचारों के जरिए खेती को सफल बनाया है। ऐसे में यहां आयोजित पहली कॉन्फ्रेंस से अन्य क्षेत्रों के लिए भी सीखने का अवसर मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की क्षेत्रीय कॉन्फ्रेंस से न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। जब नीतियां स्थानीय जरूरतों के अनुसार बनाई जाती हैं, तो उनका प्रभाव अधिक होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में पानी की कमी है, तो वहां सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। वहीं, जहां पानी की उपलब्धता अधिक है, वहां उच्च उत्पादकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसके अलावा, इन कॉन्फ्रेंस के जरिए कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और नवाचारों को भी बढ़ावा मिलेगा। आज के दौर में ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कृषि में तेजी से बढ़ रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से किसान अपनी फसल की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकते हैं और समय पर सही निर्णय ले सकते हैं। सरकार इन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से किसानों को इन नई तकनीकों से परिचित कराने की योजना बना रही है। जलवायु परिवर्तन भी आज कृषि के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्तर पर समाधान खोजना बेहद जरूरी हो गया है। इन कॉन्फ्रेंस में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उपायों पर भी विशेष जोर दिया जाएगा, जैसे कि जल संरक्षण, फसल बीमा और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना। किसानों के लिए बाजार तक पहुंच और उचित मूल्य मिलना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई बार किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है। इन कॉन्फ्रेंस में कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन, ई-नाम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग और वैल्यू एडिशन पर भी चर्चा की जाएगी, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके। सरकार की इस पहल को देश के कृषि क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल किसानों की समस्याओं का समाधान होगा, बल्कि कृषि क्षेत्र में नवाचार और विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। आने वाले समय में यह पहल भारत को कृषि के क्षेत्र में और अधिक मजबूत बना सकती है। अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन, जलवायु, मिट्टी, मौसम और अलग-अलग फसलों के लिए हमने यह तय किया कि अब रीजनल कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। पूरे देश में ऐसी पाँच रीजनल कॉन्फ्रेंस होंगी। यह हमारा सौभाग्य है कि इनका शुभारंभ राजस्थान की इस पवित्र धरा से हो रहा है। pic.twitter.com/D7qDrM7xkP— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) April 7, 2026
रायसेन (मध्य प्रदेश) में 11 से 13 अप्रैल 2026 के बीच आयोजित होने जा रहा “राष्ट्रीय कृषि मेला” देश के किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री Narendra Modi के “विकसित खेती–समृद्ध किसान” विजन को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इस मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों, ड्रोन और स्मार्ट फार्मिंग जैसे नवाचारों को प्रदर्शित किया जाएगा। साथ ही, कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा किसानों को समेकित कृषि पद्धतियों, फसल प्रबंधन, जैविक खेती और कृषि आधारित उद्यमिता पर मार्गदर्शन दिया जाएगा। इस मेले की खास बात यह है कि इसमें किसानों को नई तकनीकों को व्यवहारिक रूप में समझने और अपनाने का अवसर मिलेगा, जिससे उनकी उत्पादकता और आय दोनों में वृद्धि हो सकेगी। सरकार का उद्देश्य है कि छोटे और सीमांत किसान भी तकनीकी रूप से सशक्त बनें और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ें। यह आयोजन न केवल खेती को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि किसानों को बाजार, नवाचार और सरकारी योजनाओं से सीधे जोड़ने का एक प्रभावी मंच भी साबित होगा। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के नेतृत्व में ‘विकसित खेती–समृद्ध किसान’ के सपने को साकार करने के लिए 11 से 13 अप्रैल, 2026 को रायसेन में आयोजित होने जा रहा है राष्ट्रीय कृषि मेला… आधुनिक खेती, उन्नत तकनीक, उन्नत बीज, समेकित कृषि पद्धतियों और विशेषज्ञों की मार्गदर्शन… pic.twitter.com/FejjPSPLxl — Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) April 4, 2026
उत्तर प्रदेश में 30 मार्च से 15 जून तक MSP पर गेहूं की खरीद चलेगी. इसके लिए 3574 क्रय केंद्र स्थापित किए गए हैं. गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2585 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है. इसके लिए किसानों को रजिस्ट्रेशन कराना होगा. उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए अच्छी खबर है. उत्तर प्रदेश में गेहूं खरीद आज (30 मार्च 2026) से शुरू हो रही है, जो 15 जून तक चलेगी. खरीद शुरू होने से पहले ही 2 लाख 24 हजार से ज्यादा किसानों ने अपना गेहूं बेचने के लिए पंजीकरण करा लिया है. किसानों को कोई दिक्कत न हो, इसके लिए सरकार ने पूरे प्रदेश में अब तक 3574 क्रय केंद्र बनाए हैं यूपी में गेहूं का भाव क्या है? इस साल गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है. पिछले साल की तुलना में यह 160 रुपये ज्यादा है. कृषि विभाग ने किसानों के लिए की व्यवस्था प्रदेश के कृषि निदेशक डॉ पंकज कुमार त्रिपाठी ने बताया कि प्रदेश में खाद्य विभाग की विपणन शाखा सहित कुल 8 एजेंसियों द्वारा 6,500 क्रय केंद्र स्थापित होंगे. क्रय केंद्र सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुले रहेंगे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्त निर्देश दिया है कि क्रय केंद्रों पर बिक्री के लिए आने वाले किसानों को किसी भी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए. वहीं, मौसम को देखते हुए किसानों को किसी भी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए. वहीं, मौसम को देखते हुए किसानों के लिए छाया, पानी व बैठने की पूरी व्यवस्था की गई है. गेहूं छानने और साफ करने के भी मिलेंगे पैसे सरकार ने निर्देशित किया है कि पर्याप्त मात्रा में खरीद कर ली जाए, जिससे किसानों को किसी प्रकार का नुकसान न उठाना पड़े. गेहूं उतारने, छानने और साफ करने के लिए किसानों को अतिरिक्त 20 रुपये प्रति क्विंटल दिए जाएंगे. कृषि निदेशक ने बताया कि खाद्य व रसद विभाग ने 30 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा था, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे 50 लाख मीट्रिक टन किए जाने का निर्देश दिया है. मुख्यमंत्री ने 48 घंटे के भीतर डीबीटी के माध्यम से किसानों को भुगतान के भी निर्देश दिए हैं. कहां रजिस्ट्रेशन कराएं किसान? डॉ पंकज कुमार त्रिपाठी ने बताया कि जिन किसानों ने गेहूं बिक्री के लिए अभी तक पंजीकरण/रजिस्ट्रेशन या नवीनीकरण नहीं कराया है, वे fcs.up.gov.in या UP KISAN MITRA पर अपडेट करा सकते हैं.उन्होंने बताया कि गेहूं बिक्री के दौरान यदि कोई समस्या होती है तो किसान टोल फ्री नंबर 18001800150 पर कॉल कर सकते हैं.
देश के किसानों को इस साल फरवरी-मार्च में तीन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. अचानक बढ़ी गर्मी से गेहूं की पैदावार में कमी, पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण कृषि उत्पादों के निर्यात में बाधा, और बेमौसम बारिश से तैयार फसलों को भारी नुकसान. देश के किसानों पर एक ही महीने में तिहरी मार पड़ी है. मौसम में अचानक आए उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में जारी जंग का असर और बेमौसम बारिश—इन तीनों ने मिलकर लगभग हर प्रमुख फसल को प्रभावित कर दिया है. स्थिति ऐसी है कि अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां और बागवानी...सभी फसलें किसी न किसी मोर्चे पर गंभीर दबाव में हैं. पूरे हालात से सिर्फ किसान ही परेशान नहीं हैं बल्कि केंद्र सरकार की भी टेंशन बढ़ गई है. पूरे हालात की समीक्षा के लिए सरकार बैठक पर बैठक कर रही है. लेकिन सवाल यह है कि इतने बड़े संकट को झेल रहे किसानों के जख्म पर मरहम कौन लगाएगा? सबसे बड़ी चिंता गेहूं को लेकर है. फरवरी-मार्च का समय गेहूं की भरपूर पैदावार के लिए बेहद अहम माना जाता है, लेकिन इस बार तापमान में अचानक वृद्धि ने हीट स्ट्रेस की स्थिति बना दी. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उपज में कमी आने की आशंका है. दूसरा बड़ा झटका पश्चिम एशिया की जंग से लगा है. इस संघर्ष के चलते समुद्री रूट डिस्टर्ब हो गए हैं और भारत के कई प्रमुख कृषि उत्पादों का निर्यात लगभग ठप हो गया है. बासमती चावल, प्याज, केला और अंगूर जैसे उत्पाद, जिनकी रमजान के दौरान पश्चिम एशिया में भारी मांग रहती है, इस बार उस बाजार तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं. शिपिंग बंद होने से किसानों और निर्यातकों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. तीसरी और सबसे ताजा मार बेमौसम बारिश की है. देश के कई हिस्सों में अचानक हुई तेज बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाया है आलू, सरसों, प्याज और दालें—जो कटाई के बिल्कुल करीब थीं—अब खराब होने के खतरे में हैं. इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ सकता है. कुल मिलाकर, इस साल की शुरुआत किसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है. मौसम, अंतरराष्ट्रीय हालात और प्राकृतिक मार के मिलेजुले प्रभाव ने देश की कृषि व्यवस्था को झकझोर दिया है. फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी का गेहूं पर असर फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी को लेकर करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) के पूर्व डायरेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह ने 'किसान तक' से कहा, पूरे हरियाणा में कोई नुकसान नहीं है और आगे भी किसी नुकसान की आशंका नहीं है. देश के अन्य राज्यों की बात करें तो अक्तूबर अंत से दिसंबर अंत तक गेहूं की बुआई होती है. इस अलग-अलग स्टेज में मौसम के मुताबिक गेहूं की खेती होती है. अभी तक रात का तापमान अच्छा रहा है जो गेहूं की खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसलिए, गेहूं के उत्पादन को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है. सबकुछ ठीक रहेगा. बिहार में गेहूं की खेती पर क्या असर होगा? इसके जवाब में पूसा, बिहार के गन्ना अनुसंधान संस्थान के निदेशक डीके सिंह ने कहा, जिस गेहूं की बुआई 15 दिसंबर के बाद हुई है, उस पर बुरा असर पड़ेगा. 10 से 20 दिसंबर के बीच बोई गई फसल पर आंशिक असर और नवंबर की खेती पर कोई असर नहीं होगा. डीके सिंह ने कहा, बिहार के अधिकांश जिलों में 10 से 20 दिसंबर के बीच गेहूं की बुआई है, इसलिए उत्पादन पर आंशिक असर हो सकता है. हालांकि जिन खेतों में अभी नमी है, उसका उत्पादन प्रभावित नहीं होगा. उत्तर प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही हाल रहेगा. बुंदेलखंड का इलाका गेहूं के लिए प्रमुख है, वहां गर्मी का असर देखा गया है. केवीके जालौन के अध्यक्ष और हेड डॉ. मोहम्मद मुस्तफा ने बताया कि बुंदेलखंड में इन दिनों तापमान में बढ़ोतरी हुई है. जालौन में तापमान 38 डिग्री तक पहुंच गया है जबकि झांसी में 40 डिग्री तक. ऐसे में बढ़ते तापमान का गेहूं के उत्पादन पर असर पड़ेगा. लगातार 1 हफ्ते तक तापमान में बढ़ोतरी का असर गेहूं के बालियों के के दानों पर पड़ता है. इससे दाने पतले हो जाते हैं. ऐसे में प्रति एकड़ उत्पादन में 5 से 7% गिरावट देखने को मिलेगी. जिन किसानों ने मार्च की शुरुआत में हल्की सिंचाई कर दी थी, उन पर असर कम दिखाई देगा
देश के किसानों को इस साल फरवरी-मार्च में तीन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. अचानक बढ़ी गर्मी से गेहूं की पैदावार में कमी, पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण कृषि उत्पादों के निर्यात में बाधा, और बेमौसम बारिश से तैयार फसलों को भारी नुकसान. देश के किसानों पर एक ही महीने में तिहरी मार पड़ी है. मौसम में अचानक आए उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में जारी जंग का असर और बेमौसम बारिश—इन तीनों ने मिलकर लगभग हर प्रमुख फसल को प्रभावित कर दिया है. स्थिति ऐसी है कि अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां और बागवानी सभी फसलें किसी न किसी मोर्चे पर गंभीर दबाव में हैं. पूरे हालात से सिर्फ किसान ही परेशान नहीं हैं बल्कि केंद्र सरकार की भी टेंशन बढ़ गई है. पूरे हालात की समीक्षा के लिए सरकार बैठक पर बैठक कर रही है. लेकिन सवाल यह है कि इतने बड़े संकट को झेल रहे किसानों के जख्म पर मरहम कौन लगाएगा? सबसे बड़ी चिंता गेहूं को लेकर है. फरवरी-मार्च का समय गेहूं की भरपूर पैदावार के लिए बेहद अहम माना जाता है, लेकिन इस बार तापमान में अचानक वृद्धि ने हीट स्ट्रेस की स्थिति बना दी. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उपज में कमी आने की आशंका है. दूसरा बड़ा झटका पश्चिम एशिया की जंग से लगा है. इस संघर्ष के चलते समुद्री रूट डिस्टर्ब हो गए हैं और भारत के कई प्रमुख कृषि उत्पादों का निर्यात लगभग ठप हो गया है. बासमती चावल, प्याज, केला और अंगूर जैसे उत्पाद, जिनकी रमजान के दौरान पश्चिम एशिया में भारी मांग रहती है, इस बार उस बाजार तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं. शिपिंग बंद होने से किसानों और निर्यातकों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. तीसरी और सबसे ताजा मार बेमौसम बारिश की है. देश के कई हिस्सों में अचानक हुई तेज बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाया है आलू, सरसों, प्याज और दालें—जो कटाई के बिल्कुल करीब थीं—अब खराब होने के खतरे में हैं. इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ सकता है. कुल मिलाकर, इस साल की शुरुआत किसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है. मौसम, अंतरराष्ट्रीय हालात और प्राकृतिक मार के मिलेजुले प्रभाव ने देश की कृषि व्यवस्था को झकझोर दिया है. फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी का गेहूं पर असरफरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी को लेकर करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) के पूर्व डायरेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह ने 'किसान तक' से कहा, पूरे हरियाणा में कोई नुकसान नहीं है और आगे भी किसी नुकसान की आशंका नहीं है. देश के अन्य राज्यों की बात करें तो अक्तूबर अंत से दिसंबर अंत तक गेहूं की बुआई होती है. इस अलग-अलग स्टेज में मौसम के मुताबिक गेहूं की खेती होती है. अभी तक रात का तापमान अच्छा रहा है जो गेहूं की खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसलिए, गेहूं के उत्पादन को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है. सबकुछ ठीक रहेगा. बिहार में गेहूं की खेती पर क्या असर होगा? इसके जवाब में पूसा, बिहार के गन्ना अनुसंधान संस्थान के निदेशक डीके सिंह ने कहा, जिस गेहूं की बुआई 15 दिसंबर के बाद हुई है, उस पर बुरा असर पड़ेगा. 10 से 20 दिसंबर के बीच बोई गई फसल पर आंशिक असर और नवंबर की खेती पर कोई असर नहीं होगा. डीके सिंह ने कहा, बिहार के अधिकांश जिलों में 10 से 20 दिसंबर के बीच गेहूं की बुआई है, इसलिए उत्पादन पर आंशिक असर हो सकता है. हालांकि जिन खेतों में अभी नमी है, उसका उत्पादन प्रभावित नहीं होगा. उत्तर प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही हाल रहेगा. बुंदेलखंड का इलाका गेहूं के लिए प्रमुख है, वहां गर्मी का असर देखा गया है. केवीके जालौन के अध्यक्ष और हेड डॉ. मोहम्मद मुस्तफा ने बताया कि बुंदेलखंड में इन दिनों तापमान में बढ़ोतरी हुई है. जालौन में तापमान 38 डिग्री तक पहुंच गया है जबकि झांसी में 40 डिग्री तक. ऐसे में बढ़ते तापमान का गेहूं के उत्पादन पर असर पड़ेगा. लगातार 1 हफ्ते तक तापमान में बढ़ोतरी का असर गेहूं के बालियों के दानों पर पड़ता है. इससे दाने पतले हो जाते हैं. ऐसे में प्रति एकड़ उत्पादन में 5 से 7% गिरावट देखने को मिलेगी. जिन किसानों ने मार्च की शुरुआत में हल्की सिंचाई कर दी थी, उन पर असर कम दिखाई देगा. गर्मी का सबसे अधिक असर पंजाब के मालवा क्षेत्र में देखा जा रहा है. संगरूर जिले के किसान हरजिंदर सिंह ने 'किसान तक' से कहा, फरवरी के अंतिम सप्ताह में तेज गर्मी पड़ी. अचानक बढ़ी गर्मी ने गेहूं को भारी नुकसान पहुंचाया है. गेहूं के दाने में बदलाव आ गया. उस दौरान मौसम कुछ ठंडा रहता तो गेहूं के दाने फूलते, लेकिन अचानक गर्मी से दाना कमजोर रह गया. ठंड से जहां दाना बढ़ता है, वहीं गर्मी से दाने सिकुड़ते हैं. इससे गेहूं का वजन कम हो गया. संगरूर में 16 एकड़ की खेती करने वाले हरजिंदर सिंह ने बताया कि इस बार प्रति एकड़ 4-5 क्विंटल गेहूं का नुकसान होगा. यह असर केवल संगरूर तक सीमित नहीं नहीं बल्कि कई जिले चपेट में हैं. मानसा, पटियाला, बठिंडा, मलेर कोटला, मोगा और बरनाला जिलों में गेहूं को बहुत अधिक नुकसान है. मालवा पट्टी के जितने जिले हैं, जहां गेहूं की अधिक खेती होती है, वहां गेहूं का उत्पादन बड़े पैमाने पर कम रहेगा. संगरूर जिले में लड्डी गांव के किसान जगतार सिंह ने बताया पहले गर्मी ने गेहूं को नुकसान पहुंचाया और अब बारिश ने पूरा तबाह कर दिया. गेहूं की उपज में 30 फीसद तक गिरावट आ सकती है. प्रति एकड़ 4 क्विंटल तक कमी की आशंका है. जगतार सिंह ने कहा कि संगरूर जिले के लगभग सभी किसान गर्मी और बेमौसम बारिश से प्रभावित हुए हैं. पंजाब से सटे हरियाणा में किसानों ने मिलीजुली प्रतिक्रिया दी. वे बताते हैं कि हीट स्ट्रेस जैसी कोई समस्या नहीं है, लेकिन अचानक हुई बारिश ने गेहूं को नुकसान पहुंचाया है. किसानों ने बताया कि फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी से पहले ही गेहूं के दाने अपने फाइनल स्टेज में आ गए थे, इसलिए गर्मी का कोई असर नहीं नहीं होगा. पश्चिम एशिया की लड़ाई किसानों पर भारी पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने भारत के निर्यात को बहुत प्रभावित किया है. बासमती चावल, प्याज, अंगूर, केला, आलू जैसी उपज का निर्यात ठप हो गया है. इसका सबसे अधिक नुकसान पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों को उठाना पड़ा है. मिडिल ईस्ट भारत के कृषि निर्यात का बहुत बड़ा बाजार है. भारत से हर साल बड़ी मात्रा में बासमती चावल, प्याज, अंगूर, अनार और दालें खाड़ी देशों में भेजे जाते हैं. ईरान, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात, इनमें प्रमुख बाजार हैं. लेकिन अब युद्ध के कारण समुद्री रास्तों में बाधा आ गई है. जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, कंटेनर बंदरगाहों पर फंस रहे हैं और लॉजिस्टिक संकट पैदा हो गया है. पंजाब बासमती राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PBREA) के डायरेक्टर अशोक सेठी के अनुसार, मिडिल ईस्ट के देशों में बिरयानी की भारी लोकप्रियता के कारण भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यात इसी क्षेत्र में होता है. यही वजह है कि यह इलाका भारतीय बासमती का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजार माना जाता है. लेकिन वर्तमान में इस क्षेत्र में चल रहे युद्ध ने पूरे बासमती कारोबार को गहरे संकट में धकेल दिया है. सेठी बताते हैं कि अधिकांश निर्यात उधार पर होता है, जिसके चलते बड़ी मात्रा में भुगतान अटका हुआ है. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (ECGC) के माध्यम से व्यापारियों को भुगतान की गारंटी उपलब्ध कराई जाए. उनके मुताबिक, यदि निर्यात पूरी तरह बंद हो गया या कम हुआ, दोनों ही स्थितियों में किसानों को बड़ा नुकसान होगा, क्योंकि निर्यात घटने से बासमती के दाम गिरेंगे और इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ेगा. भुगतान में अड़चनों के चलते कई सौदों के रद्द होने की आशंका भी बढ़ गई है. राजस्थान के बूंदी को बासमती का कटोरा कहा जाता है. यहां से बड़ी मात्रा में चावल का निर्यात खाड़ी देशों, विशेष रूप से ईरान और आसपास के क्षेत्रों में होता रहा है. लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से निर्यात गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं. व्यापारियों के अनुसार, जैसे ही युद्ध की स्थिति बनी, विदेशी खरीदारों ने ऑर्डर रोक दिए और नए सौदों से दूरी बना ली. बासमती से बुरा हाल महाराष्ट्र के प्याज, केला और अंगूर का हुआ है. बीच रमजान में इन उपजों की मांग ठप हो गई. पूरे पश्चिम एशिया के देश भारत के कृषि उत्पादों पर निर्भर हैं, लेकिन लड़ाई ने सबकुछ चौपट कर दिया. रमजान और ईद के दौरान खाड़ी देशों में बढ़ने वाली केला मांग ने हमेशा महाराष्ट्र के जलगांव और मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के किसानों को अच्छी कमाई दिलाई है, लेकिन इस बार हालात पूरी तरह उलट गए हैं. ईरान–अमेरिकी लड़ाई के चलते खाड़ी देशों के रास्ते बंद होने, माल वापस लौट आने और जेबेल अली जैसे बड़े बंदरगाहों पर लोडिंग–अनलोडिंग रुक जाने से निर्यात प्रभावित हुआ है. हजारों टन केला खेतों, ट्रकों और कंटेनरों में फंसा है. कई खेप बीच रास्ते से वापस लौट रही है, जिससे किसानों पर भारी आर्थिक मार पड़ी है. जुन्नर का नारंगा इलाका महाराष्ट्र में अंगूर का हब है. यहां से हजारों टन फल और सब्जियां दुनिया के कई देशों में एक्सपोर्ट होते हैं. हालिया घटनाक्रम के बारे में किसान प्रकाश वाघ कहते हैं, रमजान का महीना है, लेकिन अंगूर किसानों में मायूसी है. इस महीने अंगूर की सबसे अधिक सप्लाई पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के देशों में भेजी जाती है. मगर ईरान-अमेरिका की लड़ाई से सबकुछ ठप हो गया है. प्रकाश वाघ हर साल लगभग 50-60 क्विंटल अंगूर निर्यात करते हैं, लेकिन अभी तक 5-6 क्विंटल ही सप्लाई कर सके हैं. इस लड़ाई से उन्हें 50 लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता है. बेमौसम बारिश से किसान और फसल तबाह जानकारों की मानें तो किसानों को जितना नुकसान हीट स्ट्रेस और लड़ाई से नहीं हुआ, उससे कहीं अधिक मार्च महीने की बेमौसम बारिश ने कर दिया. देश का लगभग हर क्षेत्र बारिश से प्रभावित है. हरियाणा में करनाल के रहने वाले कमलदीप बताते हैं कि हालिया बारिश से गेहूं और लहसुन को बहुत नुकसान हुआ है. 13 अप्रैल से गेहूं की खरीद शुरू होनी है, लेकिन कटाई के आसपास ही बारिश होने से फसल को क्षति हुई है. गेहूं की फसल गिर गई है और लहसुन के खेत में पानी भर गया है. इससे किसानों पर तगड़ी मार पड़ी है. हरियाणा में ही रेवाड़ी के देशराज चौहान बताते हैं, बारिश से सरसों, गेहूं, चना और ग्वार की फसल पर असर है. जिन किसानों ने अपनी सरसों , गेहूं, चना और ग्वार की फसल पर असर है. जिन किसानों ने अपनी सरसों मंडी में बेच दी है, उन्हें तो फायदा होगा, लेकिन जिनकी उपज मंडी में अभी तुली नहीं है वे बहुत नुकसान में हैं. कई किसानों की सरसों मंडी में बह गई, अब उनकी लागत भी नहीं निकल पाएगी. बारिश और तेज हवा से गेहूं की फसल गिर गई है जिससे दाने कमजोर होंगे और उत्पादन गिर जाएगा. देशराज कहते हैं, खेतों में गिरी फसल को काटने का खर्च भी बढ़ेगा. अब मजदूरों को गेहूं को सुलझा कर काटना होगा जिससे समय बढ़ेगा. मजदूर कटाई के लिए पहले 5 हजार रुपये प्रति किल्ले मांगते थे, लेकिन अब 10 हजार रुपये मांगेंगे. इससे किसानों को डबल नुकसान होगा. महाराष्ट्र में भी बारिश से बहुत नुकसान है. अमरावती में ओलावृष्टि का कहर देखा गया है. यहां गेहूं, संतरा, तरबूज, नींबू-प्याज सहित कई फसलें बर्बाद हो गई हैं. तेज हवा और बारिश के साथ ओले गिरे हैं जिससे कटाई की कगार पर खड़ी रबी फसल तबाह हो गई है. किसानों ने मुआवजे की मांग तेज कर दी है. कुल मिलाकर, देश के कई राज्यों के किसानों पर इस समय तिहरी मार पड़ी है—हीट स्ट्रेस से गेहूं प्रभावित हुआ, पश्चिम एशिया की लड़ाई के कारण बासमती सहित कई कृषि उत्पादों का निर्यात ठप पड़ा, और ऊपर से बेमौसम बारिश ने तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाया. इन तीनों संकटों का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है.
Rashmika-Vijay Announcement: रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा ने शादी के बाद एक बड़ी अनाउंसमेंट कर हर किसी का दिल जीत लिया. इसकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा 44 सरकारी स्कूलों को स्कॉलरशिप देंगे न्यूली वेड कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा इन दिनों जहां अपनी शादी को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. वहीं ये जोड़ी अपनी वेडिंग सेलिब्रेशन के बीच तेलंगाना में एक के बाद एक समाज सेवा के काम कर सबका दिल जीत रहे हैं. अब इस कपल ने तेलंगाना के 44 सरकारी स्कूलों के लिए बड़ी अनाउंसमेंट की है. तेलंगाना के 44 सरकारी स्कूलों के लिए विजय-रश्मिका की बड़ी अनाउंसमेंट दरअसल उदयपुर में शादी करने के बाद रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा नागरकुरनूल ज़िले के अचमपेट डिवीज़न में एक्टर के पैतृक गांव पहुंचे थे. वहां के लोगों से बातचीत के दौरान, एक्टर ने एक ज़रूरी घोषणा की, जिस पर वहां जमा भीड़ ने ज़ोरदार तालियां बजाईं. बता दें कि अपने एनजीओ, देवरकोंडा चैरिटेबल ट्रस्ट के ज़रिए, विजय ने इलाके के 44 सरकारी स्कूलों में क्लास 9 और 10 में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप देने की घोषणा की है. इस पहल का मकसद जरूरतमंद स्टूडेंट्स की मदद करना और उन्हें बिना किसी पैसे की दिक्कत के अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए बढ़ावा देना है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में विजय तेलुगु में गांववालों से बात करते हुए दिख रहे हैं, जिसमें वह अपने शहर के स्टूडेंट्स के लिए अपना कमिटमेंट बता रहे हैं. उन्होंने कम्युनिटी को भरोसा दिलाया कि स्कॉलरशिप से सीधे तौर पर उन टीनएजर्स को फ़ायदा होगा जो ज़रूरी बोर्ड एग्ज़ाम की तैयारी कर रहे हैं. विजय ने अपने गांव में ज्यादा बार आने का भी वादा किया, ताकि उस कम्युनिटी के साथ उनका रिश्ता और मजबूत हो सके जिसने उनके शुरुआती सालों को बनाया था शादी की रस्में रश्मिका और विजय ने 26 फरवरी को उदयपुर में तेलुगु और कोडवा रीति-रिवाजों से शादी की थी. इसके बाद, कपल ने तिरुपति बालाजी मंदिर में आशीर्वाद लिया था. उन्होंने अपनी शादी को सेलिब्रेट करते हुए कई शहरों में मिठाइयां भी बांटीं. 2 मार्च को, रश्मिका ने तेलंगाना के थुम्मानपेटा में विजय के घर पर अपनी गृहप्रवेश सेरेमनी की. कपल ने अपने नए घर पर सत्यनारायण व्रतम पूजा भी की. रश्मिका ने इस मौके पर क्रीम कांजीवरम साड़ी पहनी थी, जबकि विजय ने गांव में बातचीत के दौरान ऑरेंज टी-शर्ट और ब्लैक ट्राउजर में सिंपल लुक कैरी किया था. कब है विजय-रश्मिका का रिसेप्शन यह कपल 4 मार्च को हैदराबाद में इंडस्ट्री के साथियों और पॉलिटिकल लीडर्स के लिए एक ग्रैंड रिसेप्शन होस्ट करने वाला है. हालांकि, उन्होंने साफ किया है कि यह इवेंट सिर्फ़ इनविटेशन पर ही होगा, और फैंस और मीडिया से सिक्योरिटी इंतज़ाम का ध्यान रखने की रिक्वेस्ट की है. विजय-रश्मिका फिल्म प्रोफेशनल फ्रंट की बात करें तो ये जोड़ी जल्द ही राणाबली में स्क्रीन स्पेस शेयर करती नजर आएगी. ये फिल्म 11 सितंबर को थिएटर में रिलीज़ होगी.
MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे. Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है. रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे. गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.
भारत और इंग्लैंड के बीच टी20 वर्ल्ड कप 2026 का सेमीफाइनल 5 मार्च को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाएगा. भारत ग्रुप-1 में दूसरे स्थान पर रहा है, जबकि साउथ अफ्रीका शीर्ष पर रही. IND vs ENG Semifinal Live Streaming: आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत सेमीफाइनल में पहुंच चुका है. टीम इंडिया ने 1 मार्च को वेस्टइंडीज को रोमांचक मुकाबले में पांच विकेट से हराकर अंतिम चार में एंट्री की. इस जीत के हीरो रहे संजू सैमसन, जिन्होंने नाबाद 97 रन की बेहतरीन पारी खेली. उनकी पारी में 12 चौके और 4 छक्के शामिल रहे और उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया. भारत ग्रुप-1 में दूसरे स्थान पर रहा, जबकि साउथ अफ्रीका शीर्ष पर रही. अब सेमीफाइनल में भारत का सामना ग्रुप-2 की टॉपर इंग्लैंड से होने जा रहा है. पहला सेमीफाइनल साउथ अफ्रीका और न्यूजीलैंड के बीच खेला जाएगा. दोनों मुकाबलों के विजेता 8 मार्च को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में फाइनल खेलेंगे. IND VS ENG मैच कब और कितने बजे होगा? भारत और इंग्लैंड के बीच दूसरा सेमीफाइनल 5 मार्च, गुरुवार को खेला जाएगा. मैच भारतीय समयानुसार शाम 7 बजे शुरू होगा, जबकि टॉस 6:30 बजे होगा. यह मुकाबला बेहद हाई-वोल्टेज माना जा रहा है, क्योंकि दोनों टीमें लगातार तीसरी बार टी20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में आमने-सामने हैं. IND VS ENG मैच कहां खेला जाएगा? यह अहम सेमीफाइनल मुंबई के ऐतिहासिक वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाएगा. इस मैदान पर बड़े मुकाबलों का लंबा इतिहास रहा है और फैंस को एक बार फिर रोमांचक क्रिकेट की उम्मीद है. IND VS ENG मैच कहां देखें लाइव? भारत बनाम इंग्लैंड सेमीफाइनल का सीधा प्रसारण स्टार स्पोर्ट्स नेटवर्क पर किया जाएगा. वहीं ऑनलाइन दर्शक इस मुकाबले की लाइव स्ट्रीमिंग जियो हॉटस्टार ऐप और वेबसाइट पर देख सकेंगे. दोनों टीमों के स्क्वॉड भारत: सूर्यकुमार यादव (कप्तान), संजू सैमसन, अक्षर पटेल, कुलदीप यादव, हार्दिक पांड्या, जसप्रीत बुमराह, ईशान किशन, रिंकू सिंह, मोहम्मद सिराज, वॉशिंगटन सुंदर, शिवम दुबे, अभिषेक शर्मा, वरुण चक्रवर्ती, अर्शदीप सिंह और तिलक वर्मा. इंग्लैंड: हैरी ब्रूक (कप्तान), रेहान अहमद, जोफ्रा आर्चर, टॉम बैंटन, जैकब बेथेल, जोस बटलर, सैम करन, लियाम डॉसन, बेन डकेट, विल जैक्स, जेमी ओवरटन, आदिल राशिद, फिल सॉल्ट, जोश टंग और ल्यूक वुड.
LPG संकट के बीच BJP नेताओं ने गाड़ियों से उतारे पार्टी का झंडा! अखिलेश यादव ने किया चौंकाने वाला दावा देश के कई हिस्सों में एलपीजी गैस की कथित कमी को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच भारत में भी एलपीजी सप्लाई को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं. इसी मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री Akhilesh Yadav ने भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने दावा किया है कि गैस संकट को लेकर जनता में बढ़ते गुस्से से बचने के लिए बीजेपी नेताओं ने अपनी गाड़ियों से पार्टी के झंडे तक हटा दिए हैं. उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है. अखिलेश यादव का बड़ा दावा कन्नौज से सांसद और सपा प्रमुख Akhilesh Yadav ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने लिखा कि अगर बीजेपी यह कह रही है कि देश में गैस की कोई कमी नहीं है, तो फिर उनकी पार्टी के मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद और करोड़ों कार्यकर्ता जनता के बीच क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं. अखिलेश यादव ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि जो पार्टी खुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बताती है, उसके नेता आज जनता से बचने के लिए भूमिगत हो गए हैं. उनका कहना था कि बीजेपी नेताओं को अपने भूमिगत ठिकानों से बाहर निकलकर जनता के बीच जाना चाहिए और गैस एजेंसियों के माध्यम से लोगों को गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने में मदद करनी चाहिए. ‘जनता के गुस्से से बचने के लिए झंडे उतारे’ सपा प्रमुख ने अपने पोस्ट में एक और बड़ा दावा करते हुए कहा कि बीजेपी नेताओं ने अपनी गाड़ियों से पार्टी के झंडे उतार दिए हैं. उन्होंने लिखा कि जब जनता को गैस नहीं मिल रही है तो लोग गुस्से में सवाल पूछ रहे हैं. ऐसे में बीजेपी नेता जनता के गुस्से से बचने के लिए अपनी पहचान छिपा रहे हैं. उन्होंने कहा कि अब सवाल यह है कि जनता किसका घेराव करे— बीजेपी नेताओं के घरों का उनके कार्यालयों का या फिर उनकी उन गाड़ियों का जिनसे पार्टी का झंडा हटा दिया गया है. गैस संकट पर सरकार को घेरा सपा प्रमुख ने कहा कि बीजेपी हमेशा संकट को स्वीकार करने के बजाय उसे नकारने की कोशिश करती है. उन्होंने आरोप लगाया कि जैसे कोरोना काल के दौरान ऑक्सीजन की कमी के मुद्दे पर सरकार ने शुरुआत में इनकार किया था, उसी तरह आज एलपीजी और खाद जैसी आवश्यक चीजों की कमी को भी नकारा जा रहा है. अखिलेश यादव ने कहा कि जब भी किसी जरूरी वस्तु की कमी होती है तो बीजेपी उससे जुड़ी समस्याओं को स्वीकार करने के बजाय आंकड़ों और बयानों के जरिए उसे छिपाने की कोशिश करती है. कोरोना काल का भी किया जिक्र अपने बयान में Akhilesh Yadav ने कोरोना महामारी का उदाहरण भी दिया. उन्होंने कहा कि कोरोना के समय देश में ऑक्सीजन की भारी कमी थी, लेकिन उस समय भी सरकार और बीजेपी नेताओं ने इसे स्वीकार करने में देरी की. उनका कहना था कि अब वही स्थिति गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं के मामले में देखने को मिल रही है. ‘बीजेपी आपदा में भी कालाबाजारी ढूंढ लेती है’ अखिलेश यादव ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि संकट की स्थिति में भी पार्टी के लोग कालाबाजारी करने के अवसर तलाश लेते हैं. उन्होंने कहा कि जब जनता संकट में होती है, तब सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह स्थिति को संभाले और लोगों को राहत दे. लेकिन उनके मुताबिक बीजेपी ऐसा करने के बजाय समस्या को ही नकार देती है. मुफ्त भोजनालय चलाने की मांग सपा प्रमुख ने कहा कि अगर गैस संकट और महंगाई के कारण लोग भोजन के लिए भी परेशान हो रहे हैं तो बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों को आगे आकर मुफ्त भोजनालय चलाने चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर सरकार और उसके समर्थक संगठन जनता की मदद नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें जनता के सामने आने से बचना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर? विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे संघर्षों का असर ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है. मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल-गैस सप्लाई से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण कई देशों में ऊर्जा कीमतों और सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है. हालांकि भारत सरकार की ओर से अभी तक किसी बड़े एलपीजी संकट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. सरकार की ओर से क्या कहा गया सरकार के सूत्रों के अनुसार देश में एलपीजी की सप्लाई सामान्य है और तेल विपणन कंपनियां लगातार सिलेंडर की आपूर्ति बनाए हुए हैं. सरकार का कहना है कि कुछ जगहों पर स्थानीय स्तर पर डिस्ट्रीब्यूशन की समस्या हो सकती है, लेकिन इसे पूरे देश में गैस संकट कहना सही नहीं होगा. विपक्ष का हमला जारी हालांकि विपक्षी दल लगातार महंगाई और जरूरी वस्तुओं की सप्लाई को लेकर सरकार पर हमला बोल रहे हैं. समाजवादी पार्टी के अलावा कई अन्य विपक्षी नेताओं ने भी गैस सिलेंडर की कीमतों और सप्लाई को लेकर सवाल उठाए हैं. यूपी की राजनीति में बढ़ी हलचल उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. Akhilesh Yadav का यह बयान ऐसे समय में आया है जब राज्य में विपक्ष लगातार जनता से जुड़े मुद्दों को उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गैस संकट, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे आने वाले समय में यूपी की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं. सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस अखिलेश यादव के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस शुरू हो गई है. कुछ लोग उनके बयान का समर्थन कर रहे हैं और कह रहे हैं कि गैस सिलेंडर की उपलब्धता और कीमतों को लेकर सरकार को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए. वहीं बीजेपी समर्थक इसे राजनीतिक बयानबाजी बताते हुए कह रहे हैं कि विपक्ष बेवजह माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. जनता की सबसे बड़ी चिंता – महंगाई राजनीतिक बयानबाजी के बीच आम लोगों की सबसे बड़ी चिंता महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों को लेकर है. एलपीजी सिलेंडर पहले ही कई शहरों में महंगा हो चुका है और अगर सप्लाई में भी समस्या आती है तो इसका सीधा असर आम परिवारों के बजट पर पड़ सकता है.
Bihar New CM: नीतीश कुमार के बाद अब बिहार में बीजेपी का सीएम बनना लगभग तय है. सूत्रों ने बताया कि नीतीश कुमार 10 अप्रैल तक सीएम पद पर बने रहेंगे, वो तुरंत पद से इस्तीफा नहीं देंगे. बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय, कब होगा नई सरकार का गठन? जानिए पूरा राजनीतिक घटनाक्रम बिहार की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। लगभग दो दशकों तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने हाल ही में राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया है, जिसके बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे और राज्य में नई सरकार का गठन होगा। नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है—क्या राज्य को पहली बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मुख्यमंत्री मिलेगा? क्या एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन बदलने वाला है? और आखिर नई सरकार का गठन कब होगा? इन सभी सवालों पर सियासी गलियारों में तेजी से चर्चा चल रही है। नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना क्यों बड़ा फैसला माना जा रहा नीतीश कुमार वर्ष 2005 से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और वे कई बार मुख्यमंत्री बने। हाल ही में 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बड़ी जीत दिलाने के बाद उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। लेकिन अब उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया है। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बिहार की सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम एनडीए के भीतर एक नई रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें बीजेपी अब सीधे राज्य की कमान संभालना चाहती है। नीतीश कुमार ने स्वयं कहा है कि वे राज्य में बनने वाली नई सरकार को पूरा सहयोग और मार्गदर्शन देंगे। इसका मतलब यह है कि वे सक्रिय रूप से बिहार की राजनीति से पूरी तरह दूर नहीं होंगे, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी किसी और नेता के हाथ में होगी। नई सरकार का गठन कब होगा? राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे। बताया जा रहा है कि वे लगभग 10 अप्रैल तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं और उसके बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होगी। दरअसल, राज्यसभा का नया कार्यकाल अप्रैल से शुरू होने वाला है। इसी वजह से यह माना जा रहा है कि उसी समय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होगी। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक बिहार में नई सरकार के गठन की औपचारिक घोषणा हो सकती है। इस दौरान एनडीए के शीर्ष नेताओं के बीच कई दौर की बैठकों का सिलसिला भी चल रहा है। इन बैठकों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और नए मंत्रिमंडल की रूपरेखा पर चर्चा की जा रही है। क्या बिहार को पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री मिलेगा? अगर नीतीश कुमार पद छोड़ते हैं और बीजेपी का नेता मुख्यमंत्री बनता है तो यह बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा। अभी तक राज्य में बीजेपी सहयोगी दल के रूप में सत्ता में रही है, लेकिन मुख्यमंत्री पद उसके पास कभी नहीं रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा और पार्टी अब राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है। इसलिए यह संभावना काफी बढ़ गई है कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से ही होगा। संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन-कौन? नीतीश कुमार के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। इनमें बीजेपी और एनडीए के कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं। 1. सम्राट चौधरी सम्राट चौधरी वर्तमान में बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं और बीजेपी के बड़े ओबीसी चेहरों में गिने जाते हैं। संगठन और राजनीति दोनों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। 2. नित्यानंद राय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय भी संभावित उम्मीदवारों में शामिल हैं। वे लंबे समय से बीजेपी के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और बिहार में पार्टी के प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं। 3. कोई नया चेहरा राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि बीजेपी किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है। इससे सामाजिक समीकरण साधने और आगामी चुनावों की रणनीति मजबूत करने की कोशिश हो सकती है। एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन कैसे बदलेगा? अगर बीजेपी मुख्यमंत्री पद संभालती है तो एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव होगा। अभी तक जेडीयू के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चल रही थी। नीतीश कुमार लंबे समय तक बिहार की राजनीति में ‘किंगमेकर’ की भूमिका में रहे हैं। लेकिन उनके राज्यसभा जाने के बाद बीजेपी की भूमिका और मजबूत हो सकती है। इसके साथ ही जेडीयू के भविष्य को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में जेडीयू और बीजेपी के बीच नए समीकरण बन सकते हैं। विपक्ष की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि जनता ने जिस चेहरे पर वोट दिया था, वही मुख्यमंत्री पद छोड़ रहा है, जो लोकतांत्रिक नैतिकता के खिलाफ है। कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि बीजेपी ने राजनीतिक रणनीति के तहत सत्ता परिवर्तन की योजना बनाई है। हालांकि एनडीए के नेता इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं। बिहार की राजनीति पर संभावित असर नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो सकता है। लगभग 20 साल तक राज्य की राजनीति का केंद्र रहे नेता के हटने से सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है। इसके कई संभावित प्रभाव हो सकते हैं: बीजेपी का प्रभाव बढ़ेगा जेडीयू की भूमिका बदल सकती है विपक्ष नई रणनीति बना सकता है सामाजिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है क्या नीतीश कुमार की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका बढ़ेगी? नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। वे पहले भी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर उनका अनुभव काफी लंबा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि संसद में उनकी उपस्थिति एनडीए के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकती है। बिहार में सत्ता परिवर्तन क्यों अहम है? बिहार भारत के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। यहां होने वाला कोई भी बड़ा राजनीतिक बदलाव राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करता है। अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है तो यह पार्टी के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि अब तक बिहार उन कुछ हिंदीभाषी राज्यों में शामिल था जहां बीजेपी का मुख्यमंत्री नहीं रहा था। आने वाले दिनों में क्या होगा? अगले कुछ सप्ताह बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। संभावित घटनाक्रम इस प्रकार हो सकते हैं: नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे एनडीए विधायक दल की बैठक होगी नए मुख्यमंत्री का चयन होगा नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होगा राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, अप्रैल के आसपास यह पूरी प्रक्रिया पूरी हो सकती है।