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रायसेन में 11–13 अप्रैल 2026 तक लगेगा राष्ट्रीय कृषि मेला, आधुनिक तकनीकों से किसानों की आय बढ़ाने पर फोकस

Metroheadlines अप्रैल 4, 2026 0
रायसेन में 11–13 अप्रैल 2026 तक लगेगा राष्ट्रीय कृषि मेला...

 

रायसेन (मध्य प्रदेश) में 11 से 13 अप्रैल 2026 के बीच आयोजित होने जा रहा “राष्ट्रीय कृषि मेला” देश के किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री Narendra Modi के “विकसित खेती–समृद्ध किसान” विजन को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इस मेले का आयोजन किया जा रहा है।

 

इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों, ड्रोन और स्मार्ट फार्मिंग जैसे नवाचारों को प्रदर्शित किया जाएगा। साथ ही, कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा किसानों को समेकित कृषि पद्धतियों, फसल प्रबंधन, जैविक खेती और कृषि आधारित उद्यमिता पर मार्गदर्शन दिया जाएगा।

 

 

इस मेले की खास बात यह है कि इसमें किसानों को नई तकनीकों को व्यवहारिक रूप में समझने और अपनाने का अवसर मिलेगा, जिससे उनकी उत्पादकता और आय दोनों में वृद्धि हो सकेगी। सरकार का उद्देश्य है कि छोटे और सीमांत किसान भी तकनीकी रूप से सशक्त बनें और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ें।

 

यह आयोजन न केवल खेती को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि किसानों को बाजार, नवाचार और सरकारी योजनाओं से सीधे जोड़ने का एक प्रभावी मंच भी साबित होगा।

 

 

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T20 World Cup Semifinal Streaming: सेमीफाइनल में होगी भारत और इंग्लैंड की टक्कर, जानें कब-कहां और कैसे देखें लाइव स्ट्रीमिंग

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इस हीरो का रिकॉर्ड तोड़ने में छूटे 'धुरंधर 2' के पसीने, पेड प्रीव्यू में मात देने से इतनी पीछे है रणवीर सिंह की फिल्म

  Dhurandhar 2 Advance Booking: रणवीर सिंह की धुरंधर 2 बॉलीवुड की सबसे ज़्यादा प्रीमियर सेल्स का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी है. हालांकि ये एक साउथ हीरो की फिल्म को मात नहीं दे पा रही है.   रणवीर सिंह, संजय दत्त, आर माधवन और अर्जुन रामपाल स्टारर ‘धुरंधर 2’ ने सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले ही गदर मचाया हुआ है. फिलहाल ये 18 मार्च, 2026 को होने वाले पेड प्रीव्यू शो के लिए एडवांस बुकिंग में गर्दा उड़ा रही है. वैसे ये फिल्म पहले ही 'स्त्री 2' के पेड प्रीव्यू शो को रिकॉर्ड को मिट्टी में मिलाकर बॉलीवुड के लिए इतिहास रच चुकी है. लेकिन आदित्य धर निर्देशित इस फिल्म के साउथ के एक स्टार का रिकॉर्ड तोड़ने में पसीने छूट रहे हैं.   धुरंधर 2 ने पेड प्रीव्यू के लिए एडवांस बुकिंग में कितनी कर ली है कमाई?   धुरंधर को बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता मिली थी. ऐसे में इसकी सीक्वल धुरंधर द रिवेंज या धुरंधर 2 को भी अच्छा रिस्पॉन्स मिलने की तो पूरी उम्मीद है ही लेकिन ये फिल्म तो रिलीज से पहले ही कमाल कर रही है और बड़े-बड़े रिकॉर्ड भी अपने नाम कर रही है.  सैकनिल्क के मुताबिक, इसने पेड प्रीव्यू से अब तक 18.78 करोड़ (ब्लॉक्ड सीटों को छोड़कर) कमा लिएए हैं वहीं ब्लॉक सीटों के साथ इसका पेड प्रीव्यू के लिए प्री टिकट सेल का कलेक्शन 23.99 करोड़ पहुंच चुका है.  देश भर में 8 हजार 31 शोज के लिए इसके 3 लाख 51 हजार 4 सौ 13 टिकट बिक चुके हैं.    धुरंधर 2 ने स्त्री 2 को पछाड़ बनाया नया रिकॉर्ड   बता दें कि कि 2024 में, राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर की स्त्री 2 ने इंडिया में पेड प्रीव्यू में 9.40 करोड़ की नेट कमाई करके नया माइलस्टोन हासिल किया था. लेकिन धुरंधर: द रिवेंज ने एडवांस बुकिंग में इससे कई गुना ज़्यादा सेल्स के साथ इसे धूल चटा दी है. इसकी के साथ .े बॉलीवुड के इतिहास में सबसे ज़्यादा प्रीमियर सेल्स का नया रिकॉर्ड अपने नाम भी कर चुकी है.    धुरंधर 2 के पवन कल्याण की OG को मात देने में छूटे पसीने   इन सबके बीच गौर करने वाली बात ये है कि धुरंधर 2 ने पेड पीव्यू के लिए प्री सेल्स में बेशक धमाकेदार कमाई कर ली हैं लेकिन इसका टारगेट इंडियन सिनेमा की सबसे बड़ी पेड प्रीव्यू कमाई का रिकॉर्ड अपने नाम करना है. दरअसल पवन कल्याण की दे कॉल हिम OG ने 21 करोड़ के बड़े नेट कलेक्शन के साथ किसी इंडियन फिल्म के लिए अब तक के सबसे ज़्यादा पेड प्रीव्यू अपने नाम किए हुए हैं. फिलहाल रणवीर सिंह स्टारर धुरंधर 2 के लिए इस रिकॉर्ड को तोड़ने में पसीने छूट रहे हैं. हालांकि अभी फिल्म के पेड प्रीव्यू शो में 6 दिन बचे हैं और इसे पवन कल्याण के रिकॉर्ड को मात देने से सिर्फ 3 करोड़ के करीब पीछे है. इसलिए पूरी उम्मीद है कि  धुरंधर 2 इस उपलब्धि को हासिल कर इतिहास रच सकती है.      

MP के विकास को मिली गति! गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी

MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे.  Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है.   रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे   इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्‍यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे.   गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा   करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.  

बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय, कब होगा नई सरकार का गठन? बड़ा अपडेट

  Bihar New CM: नीतीश कुमार के बाद अब बिहार में बीजेपी का सीएम बनना लगभग तय है. सूत्रों ने बताया कि नीतीश कुमार 10 अप्रैल तक सीएम पद पर बने रहेंगे, वो तुरंत पद से इस्तीफा नहीं देंगे.   बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय, कब होगा नई सरकार का गठन? जानिए पूरा राजनीतिक घटनाक्रम   बिहार की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है। लगभग दो दशकों तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने हाल ही में राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया है, जिसके बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे और राज्य में नई सरकार का गठन होगा।   नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है—क्या राज्य को पहली बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मुख्यमंत्री मिलेगा? क्या एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन बदलने वाला है? और आखिर नई सरकार का गठन कब होगा? इन सभी सवालों पर सियासी गलियारों में तेजी से चर्चा चल रही है।     नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना क्यों बड़ा फैसला माना जा रहा नीतीश कुमार वर्ष 2005 से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे हैं और वे कई बार मुख्यमंत्री बने। हाल ही में 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को बड़ी जीत दिलाने के बाद उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।   लेकिन अब उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला कर लिया है। यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बिहार की सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम एनडीए के भीतर एक नई रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें बीजेपी अब सीधे राज्य की कमान संभालना चाहती है।   नीतीश कुमार ने स्वयं कहा है कि वे राज्य में बनने वाली नई सरकार को पूरा सहयोग और मार्गदर्शन देंगे। इसका मतलब यह है कि वे सक्रिय रूप से बिहार की राजनीति से पूरी तरह दूर नहीं होंगे, लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी किसी और नेता के हाथ में होगी।     नई सरकार का गठन कब होगा?   राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगे। बताया जा रहा है कि वे लगभग 10 अप्रैल तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं और उसके बाद नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होगी।   दरअसल, राज्यसभा का नया कार्यकाल अप्रैल से शुरू होने वाला है। इसी वजह से यह माना जा रहा है कि उसी समय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होगी। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक बिहार में नई सरकार के गठन की औपचारिक घोषणा हो सकती है।   इस दौरान एनडीए के शीर्ष नेताओं के बीच कई दौर की बैठकों का सिलसिला भी चल रहा है। इन बैठकों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और नए मंत्रिमंडल की रूपरेखा पर चर्चा की जा रही है।     क्या बिहार को पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री मिलेगा?   अगर नीतीश कुमार पद छोड़ते हैं और बीजेपी का नेता मुख्यमंत्री बनता है तो यह बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा। अभी तक राज्य में बीजेपी सहयोगी दल के रूप में सत्ता में रही है, लेकिन मुख्यमंत्री पद उसके पास कभी नहीं रहा।   विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा और पार्टी अब राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है। इसलिए यह संभावना काफी बढ़ गई है कि अगला मुख्यमंत्री बीजेपी से ही होगा।     संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन-कौन?   नीतीश कुमार के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं। इनमें बीजेपी और एनडीए के कई वरिष्ठ नेता शामिल हैं।   1. सम्राट चौधरी सम्राट चौधरी वर्तमान में बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं और बीजेपी के बड़े ओबीसी चेहरों में गिने जाते हैं। संगठन और राजनीति दोनों में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।   2. नित्यानंद राय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय भी संभावित उम्मीदवारों में शामिल हैं। वे लंबे समय से बीजेपी के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और बिहार में पार्टी के प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं।   3. कोई नया चेहरा राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि बीजेपी किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है। इससे सामाजिक समीकरण साधने और आगामी चुनावों की रणनीति मजबूत करने की कोशिश हो सकती है।     एनडीए के भीतर सत्ता संतुलन कैसे बदलेगा?   अगर बीजेपी मुख्यमंत्री पद संभालती है तो एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव होगा। अभी तक जेडीयू के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चल रही थी। नीतीश कुमार लंबे समय तक बिहार की राजनीति में ‘किंगमेकर’ की भूमिका में रहे हैं। लेकिन उनके राज्यसभा जाने के बाद बीजेपी की भूमिका और मजबूत हो सकती है। इसके साथ ही जेडीयू के भविष्य को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में जेडीयू और बीजेपी के बीच नए समीकरण बन सकते हैं।     विपक्ष की प्रतिक्रिया   इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि जनता ने जिस चेहरे पर वोट दिया था, वही मुख्यमंत्री पद छोड़ रहा है, जो लोकतांत्रिक नैतिकता के खिलाफ है। कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि बीजेपी ने राजनीतिक रणनीति के तहत सत्ता परिवर्तन की योजना बनाई है। हालांकि एनडीए के नेता इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं।     बिहार की राजनीति पर संभावित असर   नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो सकता है। लगभग 20 साल तक राज्य की राजनीति का केंद्र रहे नेता के हटने से सत्ता संरचना पूरी तरह बदल सकती है।   इसके कई संभावित प्रभाव हो सकते हैं:   बीजेपी का प्रभाव बढ़ेगा जेडीयू की भूमिका बदल सकती है विपक्ष नई रणनीति बना सकता है सामाजिक समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है   क्या नीतीश कुमार की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका बढ़ेगी? नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद उनकी भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। वे पहले भी केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर उनका अनुभव काफी लंबा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि संसद में उनकी उपस्थिति एनडीए के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकती है।     बिहार में सत्ता परिवर्तन क्यों अहम है? बिहार भारत के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है। यहां होने वाला कोई भी बड़ा राजनीतिक बदलाव राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करता है। अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है तो यह पार्टी के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, क्योंकि अब तक बिहार उन कुछ हिंदीभाषी राज्यों में शामिल था जहां बीजेपी का मुख्यमंत्री नहीं रहा था।     आने वाले दिनों में क्या होगा? अगले कुछ सप्ताह बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। संभावित घटनाक्रम इस प्रकार हो सकते हैं: नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे एनडीए विधायक दल की बैठक होगी नए मुख्यमंत्री का चयन होगा नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होगा राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, अप्रैल के आसपास यह पूरी प्रक्रिया पूरी हो सकती है।  

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देशभर में शुरू होंगी 5 रीजनल एग्रो-क्लाइमेटिक कॉन्फ्रेंस, राजस्थान से हुआ ऐतिहासिक आगाज़

  भारत में कृषि सुधार की नई पहल: रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस की शुरुआत राजस्थान से   केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा हाल ही में किया गया एक महत्वपूर्ण ऐलान देश के कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Twitter (अब X) पर जानकारी देते हुए बताया कि भारत के अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन, विविध जलवायु, मिट्टी की संरचना, मौसम की परिस्थितियों और फसलों की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए अब देशभर में पाँच रीजनल एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। इन कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर किसानों की समस्याओं को समझना, समाधान खोजना और कृषि क्षेत्र को अधिक सशक्त बनाना है। इस पहल की शुरुआत राजस्थान की पवित्र भूमि से की गई है, जिसे कृषि नवाचारों और पारंपरिक खेती के संगम के रूप में देखा जा रहा है।   भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में कृषि केवल एक पेशा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। अलग-अलग राज्यों में जलवायु, मिट्टी की गुणवत्ता और वर्षा के पैटर्न में भारी अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में गेहूं और धान की खेती प्रमुख है, जबकि दक्षिण भारत में चावल, नारियल और मसालों की खेती अधिक होती है। इसी तरह, पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में बाजरा और दालें उगाई जाती हैं। ऐसे में एक समान कृषि नीति या रणनीति पूरे देश पर लागू करना प्रभावी नहीं हो सकता। यही कारण है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने क्षेत्रीय स्तर पर कॉन्फ्रेंस आयोजित करने का निर्णय लिया है।   इन रीजनल कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और अन्य संबंधित हितधारकों को एक मंच पर लाना है, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकें और क्षेत्र विशेष की चुनौतियों का समाधान खोज सकें। इन सम्मेलनों में जल प्रबंधन, मिट्टी की उर्वरता, आधुनिक तकनीक का उपयोग, फसल विविधीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसके अलावा, सरकार की विभिन्न योजनाओं और नीतियों के बारे में भी किसानों को जागरूक किया जाएगा, ताकि वे इनका अधिकतम लाभ उठा सकें।   राजस्थान से इस पहल की शुरुआत करना भी एक रणनीतिक निर्णय माना जा रहा है। राजस्थान का अधिकांश हिस्सा शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु वाला है, जहां जल संकट और मिट्टी की उर्वरता बड़ी चुनौतियां हैं। इसके बावजूद यहां के किसानों ने अपने अनुभव और नवाचारों के जरिए खेती को सफल बनाया है। ऐसे में यहां आयोजित पहली कॉन्फ्रेंस से अन्य क्षेत्रों के लिए भी सीखने का अवसर मिलेगा।   विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की क्षेत्रीय कॉन्फ्रेंस से न केवल कृषि उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। जब नीतियां स्थानीय जरूरतों के अनुसार बनाई जाती हैं, तो उनका प्रभाव अधिक होता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में पानी की कमी है, तो वहां सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। वहीं, जहां पानी की उपलब्धता अधिक है, वहां उच्च उत्पादकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा सकता है।   इसके अलावा, इन कॉन्फ्रेंस के जरिए कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों और नवाचारों को भी बढ़ावा मिलेगा। आज के दौर में ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कृषि में तेजी से बढ़ रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से किसान अपनी फसल की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकते हैं और समय पर सही निर्णय ले सकते हैं। सरकार इन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से किसानों को इन नई तकनीकों से परिचित कराने की योजना बना रही है।   जलवायु परिवर्तन भी आज कृषि के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्तर पर समाधान खोजना बेहद जरूरी हो गया है। इन कॉन्फ्रेंस में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उपायों पर भी विशेष जोर दिया जाएगा, जैसे कि जल संरक्षण, फसल बीमा और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना।   किसानों के लिए बाजार तक पहुंच और उचित मूल्य मिलना भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई बार किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है। इन कॉन्फ्रेंस में कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन, ई-नाम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग और वैल्यू एडिशन पर भी चर्चा की जाएगी, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके।   सरकार की इस पहल को देश के कृषि क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल किसानों की समस्याओं का समाधान होगा, बल्कि कृषि क्षेत्र में नवाचार और विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। आने वाले समय में यह पहल भारत को कृषि के क्षेत्र में और अधिक मजबूत बना सकती है।   अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक ज़ोन, जलवायु, मिट्टी, मौसम और अलग-अलग फसलों के लिए हमने यह तय किया कि अब रीजनल कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। पूरे देश में ऐसी पाँच रीजनल कॉन्फ्रेंस होंगी। यह हमारा सौभाग्य है कि इनका शुभारंभ राजस्थान की इस पवित्र धरा से हो रहा है। pic.twitter.com/D7qDrM7xkP— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) April 7, 2026

Metroheadlines अप्रैल 7, 2026 0

रायसेन में 11–13 अप्रैल 2026 तक लगेगा राष्ट्रीय कृषि मेला, आधुनिक तकनीकों से किसानों की आय बढ़ाने पर फोकस

यूपी में आज से शुरू MSP पर गेहूं की खरीद, यहां रजिस्ट्रेशन करें किसान

गर्मी, युद्ध और अब बार‍िश-ओलावृष्ट‍ि से खतरे में खेती, ट्र‍िपल अटैक से बेहाल क‍िसान

गर्मी, युद्ध और अब बार‍िश-ओलावृष्ट‍ि से खतरे में खेती, ट्र‍िपल अटैक से बेहाल क‍िसान

  देश के किसानों को इस साल फरवरी-मार्च में तीन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. अचानक बढ़ी गर्मी से गेहूं की पैदावार में कमी, पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण कृषि उत्पादों के निर्यात में बाधा, और बेमौसम बारिश से तैयार फसलों को भारी नुकसान.     देश के किसानों पर एक ही महीने में तिहरी मार पड़ी है. मौसम में अचानक आए उतार-चढ़ाव, पश्चिम एशिया में जारी जंग का असर और बेमौसम बारिश—इन तीनों ने मिलकर  लगभग हर प्रमुख फसल को प्रभावित कर दिया है. स्थिति ऐसी है कि अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां और बागवानी सभी फसलें किसी न किसी मोर्चे पर गंभीर दबाव में हैं. पूरे हालात से स‍िर्फ क‍िसान ही परेशान नहीं हैं बल्क‍ि केंद्र सरकार की भी टेंशन बढ़ गई है. पूरे हालात की समीक्षा के ल‍िए सरकार बैठक पर बैठक कर रही है. लेक‍िन सवाल यह है क‍ि इतने बड़े संकट को झेल रहे क‍िसानों के जख्म पर मरहम कौन लगाएगा?    सबसे बड़ी चिंता गेहूं को लेकर है. फरवरी-मार्च का समय गेहूं की भरपूर पैदावार के लिए बेहद अहम माना जाता है, लेकिन इस बार तापमान में अचानक वृद्धि ने हीट स्ट्रेस की स्थिति बना दी. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में उपज में कमी आने की आशंका है.   दूसरा बड़ा झटका पश्चिम एशिया की जंग से लगा है. इस संघर्ष के चलते समुद्री रूट डिस्टर्ब हो गए हैं और भारत के कई प्रमुख कृषि उत्पादों का निर्यात लगभग ठप हो गया है. बासमती चावल, प्याज, केला और अंगूर जैसे उत्पाद, जिनकी रमजान के दौरान पश्चिम एशिया में भारी मांग रहती है, इस बार उस बाजार तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं. शिपिंग बंद होने से किसानों और निर्यातकों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.   तीसरी और सबसे ताजा मार बेमौसम बारिश की है. देश के कई हिस्सों में अचानक हुई तेज बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाया है आलू, सरसों, प्याज और दालें—जो कटाई के बिल्कुल करीब थीं—अब खराब होने के खतरे में हैं. इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ सकता है.   कुल मिलाकर, इस साल  की शुरुआत किसानों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है. मौसम, अंतरराष्ट्रीय हालात और प्राकृतिक मार के मिलेजुले प्रभाव ने देश की कृषि व्यवस्था को झकझोर दिया है.   फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी का गेहूं पर असरफरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी को लेकर करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (IIWBR) के पूर्व डायरेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह ने 'किसान तक' से कहा, पूरे हरियाणा में कोई नुकसान नहीं है और आगे भी किसी नुकसान की आशंका नहीं है.   देश के अन्य राज्यों की बात करें तो अक्तूबर अंत से दिसंबर अंत तक गेहूं की बुआई होती है. इस अलग-अलग स्टेज में मौसम के मुताबिक गेहूं की खेती होती है. अभी तक रात का तापमान अच्छा रहा है जो गेहूं की खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसलिए, गेहूं के उत्पादन को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है. सबकुछ ठीक रहेगा.   बिहार में गेहूं की खेती पर क्या असर होगा? इसके जवाब में पूसा, बिहार के गन्ना अनुसंधान संस्थान के निदेशक डीके सिंह ने कहा, जिस गेहूं की बुआई 15 दिसंबर के बाद हुई है, उस पर बुरा असर पड़ेगा. 10 से 20 दिसंबर के बीच बोई गई फसल पर आंशिक असर और नवंबर की खेती पर कोई असर नहीं होगा. डीके सिंह ने कहा, बिहार के अधिकांश जिलों में 10 से 20 दिसंबर के बीच गेहूं की बुआई है, इसलिए उत्पादन पर आंशिक असर हो सकता है. हालांकि जिन खेतों में अभी नमी है, उसका उत्पादन प्रभावित नहीं होगा.    उत्तर प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही हाल रहेगा. बुंदेलखंड का इलाका गेहूं के लिए प्रमुख है, वहां गर्मी का असर देखा गया है. केवीके जालौन के अध्यक्ष और हेड डॉ. मोहम्मद मुस्तफा ने बताया कि बुंदेलखंड में इन दिनों तापमान में बढ़ोतरी हुई है. जालौन में तापमान 38 डिग्री तक पहुंच गया है जबकि झांसी में 40 डिग्री तक. ऐसे में बढ़ते तापमान का गेहूं के उत्पादन पर असर पड़ेगा.   लगातार 1 हफ्ते तक तापमान में बढ़ोतरी का असर गेहूं के बालियों के दानों पर पड़ता है. इससे दाने पतले हो जाते हैं. ऐसे में प्रति एकड़ उत्पादन में 5 से 7% गिरावट देखने को मिलेगी. जिन किसानों ने मार्च की शुरुआत में हल्की सिंचाई कर दी थी, उन पर असर कम दिखाई देगा.     गर्मी का सबसे अधिक असर पंजाब के मालवा क्षेत्र में देखा जा रहा है. संगरूर जिले के किसान हरजिंदर सिंह ने 'किसान तक' से कहा, फरवरी के अंतिम सप्ताह में तेज गर्मी पड़ी. अचानक बढ़ी गर्मी ने गेहूं को भारी नुकसान पहुंचाया है. गेहूं के दाने में बदलाव आ गया. उस दौरान मौसम कुछ ठंडा रहता तो गेहूं के दाने फूलते, लेकिन अचानक गर्मी से दाना कमजोर रह गया. ठंड से जहां दाना बढ़ता है, वहीं गर्मी से दाने सिकुड़ते हैं. इससे गेहूं का वजन कम हो गया.   संगरूर में 16 एकड़ की खेती करने वाले हरजिंदर सिंह ने बताया कि इस बार प्रति एकड़ 4-5 क्विंटल गेहूं का नुकसान होगा. यह असर केवल संगरूर तक सीमित नहीं नहीं बल्कि कई जिले चपेट में हैं. मानसा, पटियाला, बठिंडा, मलेर कोटला, मोगा और बरनाला जिलों में गेहूं को बहुत अधिक नुकसान है. मालवा पट्टी के जितने जिले हैं, जहां गेहूं की अधिक खेती होती है, वहां गेहूं का उत्पादन बड़े पैमाने पर कम रहेगा.    संगरूर जिले में लड्डी गांव के किसान जगतार सिंह ने बताया  पहले गर्मी ने गेहूं को नुकसान पहुंचाया और अब बारिश ने पूरा तबाह कर दिया. गेहूं की उपज में 30 फीसद तक गिरावट आ सकती है. प्रति एकड़ 4 क्विंटल तक कमी की आशंका है. जगतार सिंह ने कहा कि संगरूर जिले के लगभग सभी किसान गर्मी और बेमौसम बारिश से प्रभावित हुए हैं.    पंजाब से सटे हरियाणा में किसानों ने मिलीजुली प्रतिक्रिया दी. वे बताते हैं कि हीट स्ट्रेस जैसी कोई समस्या नहीं है, लेकिन अचानक हुई बारिश ने गेहूं को नुकसान पहुंचाया है. किसानों ने बताया कि फरवरी-मार्च की बढ़ी गर्मी से पहले ही गेहूं के दाने अपने फाइनल स्टेज में आ गए थे, इसलिए गर्मी का कोई असर नहीं नहीं होगा.   पश्चिम एशिया की लड़ाई किसानों पर भारी पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने भारत के निर्यात को बहुत प्रभावित किया है. बासमती चावल, प्याज, अंगूर, केला, आलू जैसी उपज का निर्यात ठप हो गया है. इसका सबसे अधिक नुकसान पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों को उठाना पड़ा है.    मिडिल ईस्ट भारत के कृषि निर्यात का बहुत बड़ा बाजार है. भारत से हर साल बड़ी मात्रा में बासमती चावल, प्याज, अंगूर, अनार और दालें खाड़ी देशों में भेजे  जाते हैं. ईरान, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात, इनमें प्रमुख बाजार हैं. लेकिन अब युद्ध के कारण समुद्री रास्तों में बाधा आ गई है. जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, कंटेनर बंदरगाहों पर फंस रहे हैं और लॉजिस्टिक संकट पैदा हो गया है.   पंजाब बासमती राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PBREA) के डायरेक्टर अशोक सेठी के अनुसार, मिडिल ईस्ट के देशों में बिरयानी की भारी लोकप्रियता के कारण भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यात इसी क्षेत्र में   होता है. यही वजह है कि यह इलाका भारतीय बासमती का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजार माना जाता है. लेकिन वर्तमान में इस क्षेत्र में चल रहे युद्ध ने पूरे बासमती कारोबार को गहरे संकट में धकेल दिया है.   सेठी बताते हैं कि अधिकांश निर्यात उधार पर होता है, जिसके चलते बड़ी मात्रा में भुगतान अटका हुआ है. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (ECGC) के माध्यम से व्यापारियों को भुगतान की गारंटी उपलब्ध कराई जाए.    उनके मुताबिक, यदि निर्यात पूरी तरह बंद हो गया या कम हुआ, दोनों ही स्थितियों में किसानों को बड़ा नुकसान होगा, क्योंकि निर्यात घटने से बासमती के दाम गिरेंगे और इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ेगा. भुगतान में अड़चनों के चलते कई सौदों के रद्द होने की आशंका भी बढ़ गई है.   राजस्थान के बूंदी को बासमती का कटोरा कहा जाता है. यहां से बड़ी मात्रा में चावल का निर्यात खाड़ी देशों, विशेष रूप से ईरान और आसपास के क्षेत्रों में होता रहा है. लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से निर्यात गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं. व्यापारियों के अनुसार, जैसे ही युद्ध की स्थिति बनी, विदेशी खरीदारों ने ऑर्डर रोक दिए और नए सौदों से दूरी बना ली.   बासमती से बुरा हाल महाराष्ट्र के प्याज, केला और अंगूर का हुआ है. बीच रमजान में इन उपजों की मांग ठप हो गई. पूरे पश्चिम एशिया के देश भारत के कृषि उत्पादों पर निर्भर हैं, लेकिन लड़ाई ने सबकुछ चौपट कर दिया. रमजान और ईद के दौरान खाड़ी देशों में बढ़ने वाली केला मांग ने हमेशा महाराष्ट्र के जलगांव और मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के किसानों को अच्छी कमाई दिलाई है, लेकिन इस बार हालात पूरी तरह उलट गए हैं.   ईरान–अमेरिकी लड़ाई के चलते खाड़ी देशों के रास्ते बंद होने, माल वापस लौट आने और जेबेल अली जैसे बड़े बंदरगाहों पर लोडिंग–अनलोडिंग रुक जाने से निर्यात प्रभावित हुआ है. हजारों टन केला खेतों, ट्रकों और कंटेनरों में फंसा है. कई खेप बीच रास्ते से वापस लौट रही है, जिससे किसानों पर भारी आर्थिक मार पड़ी है.   जुन्नर का नारंगा इलाका महाराष्ट्र में अंगूर का हब है. यहां से हजारों टन फल और सब्जियां दुनिया के कई देशों में एक्सपोर्ट होते हैं. हालिया घटनाक्रम के  बारे में किसान प्रकाश वाघ कहते हैं, रमजान का महीना है, लेकिन अंगूर किसानों में मायूसी है.   इस महीने अंगूर की सबसे अधिक सप्लाई पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के देशों में भेजी जाती है. मगर ईरान-अमेरिका की लड़ाई से सबकुछ ठप हो गया है. प्रकाश वाघ हर साल लगभग 50-60 क्विंटल अंगूर निर्यात करते हैं, लेकिन अभी तक 5-6 क्विंटल ही सप्लाई कर सके हैं. इस लड़ाई से उन्हें 50 लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता है.   बेमौसम बारिश से किसान और फसल तबाह जानकारों की मानें तो किसानों को जितना नुकसान हीट स्ट्रेस और लड़ाई से नहीं हुआ, उससे कहीं अधिक मार्च महीने की बेमौसम बारिश ने कर दिया. देश का लगभग हर क्षेत्र बारिश से प्रभावित है. हरियाणा में करनाल के रहने वाले कमलदीप बताते हैं कि हालिया बारिश से गेहूं और लहसुन को बहुत नुकसान हुआ है. 13 अप्रैल से गेहूं की खरीद शुरू होनी है, लेकिन कटाई के आसपास ही बारिश होने से फसल को क्षति हुई है. गेहूं की फसल गिर गई है और लहसुन के खेत में पानी भर गया है. इससे किसानों पर तगड़ी मार पड़ी है.   हरियाणा में ही रेवाड़ी के देशराज चौहान बताते हैं, बारिश से सरसों, गेहूं, चना और ग्वार की फसल पर असर है. जिन किसानों ने अपनी सरसों , गेहूं, चना और ग्वार की फसल पर असर है. जिन किसानों ने अपनी सरसों मंडी में बेच दी है, उन्हें तो फायदा होगा, लेकिन जिनकी उपज मंडी में अभी तुली नहीं है वे बहुत नुकसान में हैं. कई किसानों की सरसों मंडी में बह गई, अब उनकी लागत भी नहीं निकल पाएगी.   बारिश और तेज हवा से गेहूं की फसल गिर गई है जिससे दाने कमजोर होंगे और उत्पादन गिर जाएगा. देशराज कहते हैं, खेतों में गिरी फसल को काटने का खर्च भी बढ़ेगा. अब मजदूरों को गेहूं को सुलझा कर काटना होगा जिससे समय बढ़ेगा. मजदूर कटाई के लिए पहले 5 हजार रुपये प्रति किल्ले मांगते थे, लेकिन अब 10 हजार रुपये मांगेंगे. इससे किसानों को डबल नुकसान होगा.    महाराष्ट्र  में भी बारिश से बहुत नुकसान है. अमरावती में ओलावृष्टि का कहर देखा गया है. यहां गेहूं, संतरा, तरबूज, नींबू-प्याज सहित कई फसलें बर्बाद हो गई हैं. तेज हवा और बारिश के साथ ओले गिरे हैं जिससे कटाई की कगार पर खड़ी रबी फसल तबाह हो गई है. किसानों ने मुआवजे की मांग तेज कर दी है.   कुल मिलाकर, देश के कई राज्यों के किसानों पर इस समय तिहरी मार पड़ी है—हीट स्ट्रेस से गेहूं प्रभावित हुआ, पश्चिम एशिया की लड़ाई के कारण बासमती सहित कई कृषि उत्पादों का निर्यात ठप पड़ा, और ऊपर से बेमौसम बारिश ने तैयार फसलों को नुकसान पहुंचाया. इन तीनों संकटों का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है. 

Metroheadlines मार्च 20, 2026 0

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