हम अक्सर नाखूनों को सिर्फ सुंदरता या पर्सनैलिटी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार नाखून हमारे शरीर की अंदरूनी स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक भी होते हैं। हाथों के नाखून कई बार ऐसे संकेत देते हैं जो शरीर में चल रही किसी बीमारी या पोषण की कमी के बारे में पहले से चेतावनी दे सकते हैं। यही वजह है कि डॉक्टर नाखूनों के रंग, बनावट, आकार और मजबूती को देखकर कई स्वास्थ्य समस्याओं का अंदाजा लगा लेते हैं।
दरअसल नाखून केराटिन नामक प्रोटीन से बने होते हैं और ये लगभग 3 मिलीमीटर प्रति महीने की धीमी गति से बढ़ते हैं। इस धीमी वृद्धि के कारण नाखून शरीर में समय के साथ हो रहे छोटे-छोटे बदलावों को रिकॉर्ड करते रहते हैं। जब शरीर में पोषण की कमी, हार्मोनल असंतुलन, संक्रमण या किसी अंग से जुड़ी बीमारी होती है, तो उसका असर कई बार नाखूनों पर भी दिखाई देने लगता है। अगर नाखूनों का रंग बदल जाए, वे कमजोर होकर टूटने लगें, उनमें गड्ढे या धब्बे दिखाई दें या उनका आकार असामान्य हो जाए, तो यह शरीर के अंदर चल रही किसी समस्या का संकेत हो सकता है।
त्वचा विशेषज्ञों का कहना है कि नाखून हमारे शरीर की हेल्थ हिस्ट्री का छोटा सा रिकॉर्ड होते हैं। चूंकि नाखून धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इसलिए कई महीनों पहले हुई पोषण की कमी या बीमारी का असर भी इनमें दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि कई बार डॉक्टर मरीज के नाखून देखकर ही शुरुआती स्वास्थ्य समस्याओं का अंदाजा लगा लेते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि नाखूनों में दिखाई देने वाले बदलावों को नजरअंदाज करना सही नहीं है। कई बार ये मामूली पोषण की कमी का संकेत होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह गंभीर बीमारियों का भी संकेत दे सकते हैं।
अगर नाखून अंदर की ओर धंसे हुए या चम्मच के आकार के दिखाई दें, तो इसे मेडिकल भाषा में कोइलोनिकिया (Koilonychia) कहा जाता है। यह अक्सर शरीर में आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया का संकेत हो सकता है।
ऐसे नाखून पतले और कमजोर भी हो सकते हैं और उनमें बीच का हिस्सा धंसा हुआ दिखाई देता है। अगर किसी व्यक्ति के नाखून इस तरह के हो रहे हों और साथ ही थकान, चक्कर या कमजोरी महसूस हो रही हो, तो यह आयरन की कमी का संकेत हो सकता है। ऐसे में डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है।
नाखूनों का पीला पड़ना कई कारणों से हो सकता है। यह कभी-कभी फंगल संक्रमण के कारण भी होता है। फंगल संक्रमण होने पर नाखून मोटे, पीले और कमजोर हो जाते हैं और धीरे-धीरे टूटने भी लगते हैं।
कुछ मामलों में पीले नाखून येलो नेल सिंड्रोम का संकेत भी हो सकते हैं, जो फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं या लिंफेटिक सिस्टम से संबंधित बीमारी से जुड़ा होता है।
कई लोगों के नाखूनों पर छोटे-छोटे सफेद धब्बे दिखाई देते हैं। अक्सर लोग इसे कैल्शियम की कमी से जोड़ते हैं, लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि यह ज्यादातर मामूली चोट या जिंक की कमी के कारण हो सकता है।
अगर ये धब्बे लगातार बढ़ते जाएं या पूरे नाखून में फैल जाएं, तो यह किसी पोषण की कमी या स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है।
अगर नाखूनों का रंग नीला या बैंगनी दिखाई दे, तो यह शरीर में ऑक्सीजन की कमी का संकेत हो सकता है। ऐसा अक्सर फेफड़ों की बीमारी, अस्थमा, निमोनिया या हार्ट से जुड़ी समस्या में देखने को मिलता है।
नीले नाखून यह दर्शाते हैं कि शरीर के ऊतकों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच रही है। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है।
कुछ लोगों के नाखून मोटे और टेढ़े होने लगते हैं। यह कई बार लंबे समय तक चलने वाले संक्रमण या त्वचा रोग का संकेत हो सकता है।
इसके अलावा नाखूनों का ऊपर की ओर गोल और उभरा हुआ होना क्लबिंग कहलाता है, जो फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग या लिवर की समस्या से जुड़ा हो सकता है।
अगर नाखूनों पर काली या गहरे रंग की लंबी लाइन दिखाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में यह मेलानोमा (स्किन कैंसर) का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।
हालांकि हर काली लाइन कैंसर नहीं होती, लेकिन अगर नाखून का रंग अचानक बदल जाए या धब्बा फैलने लगे, तो डॉक्टर से जांच जरूर करानी चाहिए।
अगर नाखून बहुत जल्दी टूटने लगें या उनमें दरारें पड़ने लगें, तो यह शरीर में पोषण की कमी, थायराइड की समस्या या अत्यधिक केमिकल के इस्तेमाल का संकेत हो सकता है।
बार-बार नेल पॉलिश, नेल रिमूवर या डिटर्जेंट के संपर्क में आने से भी नाखून कमजोर हो सकते हैं।
नाखूनों को स्वस्थ रखने के लिए कुछ आसान आदतें अपनाई जा सकती हैं।
सबसे पहले संतुलित आहार लेना जरूरी है। शरीर को आयरन, प्रोटीन, बायोटिन, जिंक और विटामिन-बी की पर्याप्त मात्रा मिलनी चाहिए। इसके अलावा पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है।
नाखूनों को बहुत ज्यादा केमिकल से बचाना चाहिए। बार-बार नेल पॉलिश और रिमूवर का इस्तेमाल नाखूनों को कमजोर बना सकता है। इसके अलावा हाथों को साफ रखना और नाखूनों को बहुत ज्यादा लंबा न बढ़ाना भी जरूरी है।
अगर नाखूनों का रंग अचानक बदल जाए, उनमें दर्द हो, सूजन दिखाई दे या काले धब्बे तेजी से फैलने लगें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
इसके अलावा अगर नाखूनों के साथ शरीर में कमजोरी, सांस लेने में दिक्कत, चक्कर या अन्य लक्षण भी दिखाई दें, तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है।
MP News: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया-जबलपुर रेलवे लाइन दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है, जिससे बालाघाट, जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी और रोजगार बढ़ेंगे. Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि केंद्रीय कैबिनेट ने गोंदिया–जबलपुर रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने इसे महाकौशल क्षेत्र सहित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण सौगात करार दिया और इस निर्णय के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और केंद्रीय मंत्रिमंडल का हृदय से आभार माना उनका कहना है कि इस परियोजना से नक्सल समस्या से मुक्त बालाघाट जिले के साथ ही जबलपुर, मंडला और सिवनी में कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार, व्यवसाय और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. सेवातीर्थ में केन्द्रीय सरकार की पहली केबिनेट बैठक में गोंदिया से जबलपुर रेलवे लाईन दोहरीकरण को मंजूरी मिल गई है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे रामायण सर्किट से लेकर नार्थ से साउथ तक का एक महत्वपूर्ण कॉरीडोर बताया है. रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे इस दोहरीकरण का सबसे ज्यादा लाभ विकास के रूप में बालाघाट जिले मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गोंदिया–जबलपुर रेललाइन के दोहरीकरण को मंजूरी प्रदान करते हुए 5236 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है. इस कार्य के पूर्ण होने से मध्यप्रदेश के विकास को गति मिलेगी और रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे. गोंदिया–जबलपुर लाइन में ब्रिज और वन्यजीव सुरक्षा करीब 231 किलोमीटर के गोंदिया-जबलपुर रेलवे दोहरीकरण का काम 5236 करोड़ रूपए से 5 साल में पूरा होगा. जिससे महाराष्ट्र के गोंदिया और मध्यप्रदेश के जबलपुर, मंडला, सिवनी, बालाघाट को इसका लाभ मिलेगा. इस दौरान इस लाईन में आने वाले वन्यप्राणियों की सुरक्षा के लिए 450 करोड़ रूपए अंडरपास और फेसिंग में खर्च किए जाएंगे. साथ ही रेलवे दोहरीकरण के इस काम में नर्मदा नदी में एक बड़े ब्रिज के साथ ही मेजर और माईनर ब्रिज बनाए जाएंगे.
UP News In Hindi: सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार ने राज्य के शिक्षकों समेत लाखों को कर्मचारियों के लिए बड़े तोहफे का ऐलान कर दिया है. इसके लिए सरकार की तरफ से आदेश जारी किया गया है होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह पर्व सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को और रंगों की होली 4 मार्च को पड़ रही है। सामान्यतः सरकारी कर्मचारियों का वेतन महीने के अंतिम या अगले महीने के प्रारंभिक दिनों में जारी होता है, लेकिन इस बार त्योहार और अवकाश के कारण वेतन भुगतान की तिथि प्रभावित हो रही थी। रविवार (1 मार्च) को साप्ताहिक अवकाश तथा 2 मार्च को होलिका दहन होने के कारण नियमित प्रक्रिया से वेतन जारी करना संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए शनिवार (28 फरवरी) को ही वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय प्रशासनिक स्तर पर त्वरित समन्वय और संवेदनशीलता को दर्शाता है। शिक्षा विभाग की भूमिका स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक कार्यालय की ओर से 2 मार्च से पहले वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश जारी किए गए। यह आदेश उत्तर प्रदेश स्कूल शिक्षा महानिदेशक मोनिका रानी द्वारा जारी किया गया। आदेश में कहा गया कि सभी संबंधित अधिकारी और वित्तीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करें कि होलिका दहन से पहले शिक्षकों और कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंच जाए। शिक्षा विभाग राज्य का एक बड़ा विभाग है, जिसमें बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, राजकीय इंटर कॉलेज, सहायता प्राप्त विद्यालय और विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं। लाखों शिक्षकों और कर्मचारियों को समय से पहले वेतन देने के लिए विभाग को वित्तीय और तकनीकी स्तर पर व्यापक तैयारी करनी पड़ी। ट्रेजरी, बैंकिंग प्रणाली और जिला स्तर के शिक्षा अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित कर भुगतान प्रक्रिया को तेज किया गया। वित्त विभाग ने भी इस संबंध में शासनादेश जारी किया। आदेश में स्पष्ट किया गया कि अवकाश के कारण नियमित तिथि पर वेतन भुगतान संभव नहीं था, इसलिए विशेष अनुमति के तहत अग्रिम भुगतान का निर्णय लिया गया है। इस फैसले को राज्यपाल Anandiben Patel की मंजूरी प्राप्त होने के बाद लागू किया गया। राज्यपाल की स्वीकृति का उल्लेख इस बात का संकेत है कि यह निर्णय केवल विभागीय स्तर का नहीं बल्कि उच्च प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया है। इससे आदेश की वैधता और गंभीरता स्पष्ट होती है। प्रशासनिक समन्वय और कार्यान्वयन राज्य सरकार की ओर से सभी जिलाधिकारियों और विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया कि वे अपने-अपने विभागों में तैनात कर्मचारियों का वेतन 28 फरवरी तक हर हाल में जारी करें। साथ ही आदेश के पालन को लेकर सख्त हिदायत दी गई। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रकार की लापरवाही या देरी को गंभीरता से लिया जाएगा। वेतन भुगतान की प्रक्रिया में निम्नलिखित स्तरों पर कार्य हुआ: वेतन बिलों की समयपूर्व तैयारी – संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) को समय से पहले वेतन बिल तैयार करने के निर्देश दिए गए। ट्रेजरी की सक्रियता – कोषागार कार्यालयों को अतिरिक्त समय तक कार्य कर बिल पास करने को कहा गया। बैंकिंग समन्वय – बैंकों के साथ समन्वय कर यह सुनिश्चित किया गया कि भुगतान समय से कर्मचारियों के खातों में पहुंचे। डिजिटल प्रक्रिया का उपयोग – ई-भुगतान प्रणाली के माध्यम से प्रक्रिया को त्वरित और पारदर्शी बनाया गया कर्मचारियों में खुशी की लहर इस निर्णय के बाद सरकारी कर्मचारियों में व्यापक खुशी देखी गई। त्योहारों के समय परिवारों की जरूरतें बढ़ जाती हैं—नए कपड़े, मिठाइयां, रंग-गुलाल, बच्चों के लिए उपहार, रिश्तेदारों के यहां आने-जाने का खर्च आदि। ऐसे समय यदि वेतन में देरी हो जाए तो असुविधा होती है। सरकार द्वारा समय से पहले वेतन जारी करने से कर्मचारियों को आर्थिक रूप से राहत मिली है। विशेष रूप से शिक्षकों ने इस फैसले का स्वागत किया है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षक अक्सर स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उनके पास वेतन आने से स्थानीय बाजारों में भी रौनक बढ़ती है। आर्थिक प्रभाव राज्य के लाखों कर्मचारियों को एक साथ वेतन जारी होने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा। होली के अवसर पर खरीदारी बढ़ने की संभावना है, जिससे व्यापारियों और छोटे दुकानदारों को भी लाभ होगा। वस्त्र, मिठाई, रंग-गुलाल, घरेलू सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि हो सकती है। यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने वाला भी माना जा सकता है। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से छोटे व्यापारियों की आय में वृद्धि होती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधि में तेजी आती है। राजनीतिक और सामाजिक संदेश Yogi Adityanath की सरकार का यह निर्णय कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है। त्योहारों के समय इस प्रकार के निर्णय कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाते हैं और सरकार के प्रति सकारात्मक भावना उत्पन्न करते हैं। सरकारी कर्मचारी किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि वे संतुष्ट और प्रेरित हों तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से होता है। समय पर वेतन भुगतान कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान भी है। पहले भी मिल चुकी हैं ऐसी सौगातें पिछले वर्षों में भी त्योहारों से पहले बोनस या अग्रिम वेतन जैसी घोषणाएं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की जाती रही हैं। हालांकि हर बार परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इस बार अवकाश और त्योहार की तिथियों के कारण यह निर्णय आवश्यक हो गया था। यह भी उल्लेखनीय है कि समय से पहले वेतन देने का निर्णय प्रशासनिक कुशलता का परिचायक है, क्योंकि इसमें बजटीय प्रबंधन और नकदी प्रवाह का संतुलन बनाए रखना होता है। संभावित चुनौतियां हालांकि आदेश जारी कर दिया गया है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि किसी विभाग में तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजी कमी या बैंकिंग समस्या उत्पन्न होती है तो कुछ कर्मचारियों को असुविधा हो सकती है। इसलिए संबंधित अधिकारियों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। कर्मचारियों की अपेक्षाएं इस निर्णय के बाद कर्मचारियों में यह अपेक्षा भी बढ़ी है कि भविष्य में भी त्योहारों के समय इसी प्रकार की संवेदनशीलता दिखाई जाएगी। साथ ही वे नियमित वेतन भुगतान, महंगाई भत्ता, पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से संबंधित मुद्दों पर भी सरकार से सकारात्मक रुख की आशा रखते हैं। UP NEWSYogi AdityanathHoli 2026
Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमत आज घटी या बढ़ी? जानें 28 फरवरी को दिल्ली से मुंबई तक क्या हैं ताजा भाव सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज का ताजा भाव क्या है? Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. वैश्विक अनिश्चितताओं, अमेरिका की टैरिफ नीति इत्यादि वजहों से बाजार में लगातार बदलाव हो रहा है. आइए जानते हैं, आज शनिवार 28 फरवरी के कारोबारी दिन सोने-चांदी का ताजा भाव क्या है? सोने के आउटलुक पर जेपी मॉर्गन का अपडेट वैश्विक बाजार में सोने को लेकर नई उम्मीदें जताई जा रही हैं. जेपी मॉर्गन ने अपना लॉन्ग-टर्म प्राइस टारगेट बढ़ाकर 4,500 डॉलर प्रति औंस कर दिया है. जबकि 2026 के अंत के लिए 6,300 डॉलर प्रति औंस का अनुमान पहले की तरह कायम रखा है. जेपी मॉर्गन के अनुसार निवेशकों के पोर्टफोलियो में स्ट्रक्चरल डायवर्सिफिकेशन का रुझान अभी जारी है. जिससे आगे भी सोने में तेजी की संभावना बनी रह सकती है. चांदी के ताजा भाव दिल्ली, मंबई, कोलकाता और चेन्नई में चांदी की कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है. दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में 10 ग्राम चांदी आज 2,950 रुपये की दर पर बिक रहा है. वहीं, 100 ग्राम चांदी खरीदने के लिए ग्राहकों को 29,500 रुपये खर्च करने होंगे. चेन्नई में 10 ग्राम चांदी की कीमत 3,000 रुपये चल रही है. आपके शहर में सोने का भाव (गुड रिटर्न के अनुसार) दिल्ली में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए मुंबई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए चेन्नई में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,65,820 रुपए 22 कैरेट - 1,52,000 रुपए 18 कैरेट - 1,30,100 रुपए कोलकाता में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए अहमदाबाद में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए लखनऊ में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,880 रुपए 22 कैरेट - 1,51,150 रुपए 18 कैरेट - 1,23,700 रुपए पटना में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,780 रुपए 22 कैरेट - 1,51,050 रुपए 18 कैरेट - 1,23,600 रुपए हैदराबाद में सोने के दाम (प्रति 10 ग्राम) 24 कैरेट - 1,64,730 रुपए 22 कैरेट - 1,51,000 रुपए 18 कैरेट - 1,23,550 रुपए
Causes Of Bloating And Gas: हम क्या खाते हैं, इसका हमारी सेहत पर काफी असर होता है. चलिए आपको बताते हैं कि किन फूड कॉम्बिनेशन से आपको बचना चाहिए और आयुर्वेद इसको लेकर क्या कहता है Which Foods Should Not Be Eaten Together: खाना खाते समय हमें कुछ चीजों का ध्यान रखने की जरूरत होती है. हम क्या खाते हैं और किन चीजों को साथ में मिलाकर खाते हैं, इसका सीधा असर हमारे डाइजेशन शक्ति पर पड़ता है. गलत फूड कॉम्बिनेशन पाचन को बिगाड़ सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक तत्व जमा कर सकते हैं. इसका नतीजा गैस, पेट फूलना, एसिडिटी, त्वचा संबंधी समस्याएं और लंबे समय में गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ सकता है. चलिए आपको आयुर्वेद के हिसाब से बताते हैं कि किन कॉम्बिनेशन से हमें बचना चाहिए. क्या कहता है आयुर्वेद? आयुर्वेद के बारे में जानकारी देने वाली संस्था kevaayurveda के अनुसार, आयुर्वेद मानता है कि हर व्यक्ति की वात, पित्त, कफ और पाचन क्षमता अलग होती है कुछ खानें की चीजें एक-दूसरे के विपरीत गुण रखते हैं. यदि इन्हें बार-बार साथ में खाया जाए तो डाइजेशन सिस्टम पर अतिरिक्त प्रेशर पड़ता है. इससे गैस, कब्ज, सीने में जलन, मुंहासे, कमजोर इम्यूनिटी और डाइजेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. किन फूड कॉम्बिनेशन से बचना चाहिए? kevaayurveda के अनुसार, कुछ प्रमुख गलत फूड कॉम्बिनेशन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है, उनमें सबसे पहले आता है दूध और मछली. आयुर्वेद के अनुसार दूध ठंडा और भारी होता है, जबकि मछली गर्म तासीर वाली मानी जाती है. दोनों को साथ लेने से पाचन गड़बड़ा सकता है और स्किन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसी तरह दूध के साथ खट्टे फल जैसे संतरा, नींबू या अनानास भी ठीक नहीं माने जाते, क्योंकि ये पेट में दूध को फाड़ सकते हैं और गैस या एसिडिटी बढ़ा सकते हैं. गरम भोजन के साथ शहद मिलाना भी आयुर्वेद में हानिकारक बताया गया है. शहद को गर्म करने से उसके गुण बदल सकते हैं और शरीर में टॉक्सिक प्रभाव पैदा हो सकता है. भारी भोजन के तुरंत बाद फल खाना भी उचित नहीं माना जाता, क्योंकि फल जल्दी पचते हैं और भारी भोजन के साथ पेट में फर्मेंटेशन शुरू कर सकते हैं. दही और चीनी का मेल भी पाचन के लिए अनुकूल नहीं माना जाता. दही पहले से ही खट्टा और ठंडा होता है, जबकि रिफाइंड चीनी शरीर में असंतुलन बढ़ा सकती है. रात में दही को फल या ठंडी चीजों के साथ लेना कफ बढ़ा सकता है, जिससे सर्दी-खांसी या साइनस की समस्या हो सकती है. बासी भोजन के साथ दूध लेना भी पाचन के लिए सही नहीं माना गया. किन चीजों का सेवन करना चाहिए? आयुर्वेद सलाह देता है कि मौसमी आहार लें, जरूरत से ज्यादा न खाएं और अदरक, जीरा, सौंफ जैसे मसालों का उपयोग करें, जो डाइजेशन को मजबूत बनाते हैं. सही फूड कॉम्बिनेशन अपनाने से डाइजेशन मजबूत रहती है, न्यूट्रिशन तत्वों का ऑब्जर्वेशन बेहतर होता है और शरीर संतुलित रहता है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए यह नियम और भी लाभकारी माने जाते हैं.
रश्मिका-विजय के रिसेप्शन में बिना चप्पल-जूते पहने पहुंचे रामचरण, वजह जान हो जाएंगे हैरान Ramcharan: हैदराबाद में हुए ग्रैंड रिसेप्शन में रश्मिका और विजय ने खूब चर्चा बटोरी. हालांकि सबसे ज्यादा ध्यान राम चरण के अलग अंदाज ने खींचा, जहां वो काले कपड़ों और नंगे पैर में नजर आए. साउथ फिल्म इंडस्ट्री के पॉपुलर कपल रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा इन दिनों लगातार सुर्खियों में है. 4 मार्च को हैदराबाद में दोनों ने एक भव्य रिसेप्शन का आयोजन किया गया, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े सितारे शामिल हुए. इस खास मौके पर जहां हर कोई कपल को बधाई देने पहुंचा, वहीं एक्टर राम चरण अपने अनोखे अंदाज की वजह से सबसे ज्यादा चर्चा में आ गए. नंगे पैर रिसेप्शन में आए रामचरण रिसेप्शन में राम चरण अपनी पत्नी उपासना के साथ पहुंचे थे. उन्होंने सिर से पैर तक काले रंग के कपड़े पहने हुए थे. लेकिन लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा इस बात ने खींचा कि वो बिना जूते-चप्पल के, यानी नंगे पैर ही कार्यक्रम में आए थे. उन्हें इस तरह देखकर कई लोग हैरान रह गए और सोशल मीडिया पर भी उनकी तस्वीरें तेजी से वायरल होने लगीं. लेकिन इसके पीछे एक खास धार्मिक वजह है. राम चरण इन दिनों 'अयप्पा दीक्षा' का पालन कर रहे हैं. ये भगवान अयप्पा के भक्तों द्वारा किया जाने वाला एक कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है. इस व्रत के दौरान भक्तों को कुछ नियमों का सख्ती से पालन करना पड़ता है. 41 दिन की दीक्षा ले रहे रामचरण व्रत में काले या नीले रंग के कपड़े पहनना, सादगी से रहना और 41 दिनों तक नंगे पैर रहना शामिल होता है. इसी कारण राम चरण रिसेप्शन में भी बिना जूते के नजर आए. अयप्पा दीक्षा को अनुशासित और कठिन माना जाता है. इस बीच भक्तों को पूरी तरह ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है. साथ ही मांसाहारी भोजन, शराब से दूर रहना और बाल या दाढ़ी भी नहीं कटवाना होता है. ये व्रत सबरीमाला मंदिर की यात्रा से पहले किया जाता है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब राम चरण इस तरह नंगे पैर नजर आए हों. इससे पहले 2023 में ऑस्कर समारोह में शामिल होने से पहले भी वह अयप्पा दीक्षा का पालन करते हुए दिखाई दिए थे.
Fruit Juice vs Whole Fruits: जूस की बजाय फल खाना क्यों है ज्यादा फायदेमंद?जानिए ब्लड शुगर और सेहत पर असर अक्सर डॉक्टर और न्यूट्रिशन एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि जूस पीने के बजाय सीधे फल खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. कई लोग यह सोचते हैं कि जूस भी फल से ही बनता है, इसलिए दोनों का फायदा समान होगा. लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार ऐसा नहीं है. कई वैज्ञानिक रिसर्च और न्यूट्रिशन स्टडीज में यह पाया गया है कि पूरे फल शरीर को ज्यादा संतुलित पोषण देते हैं, जबकि जूस में कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व कम हो जाते हैं. खासतौर पर फाइबर की कमी के कारण जूस का असर शरीर पर अलग तरीके से पड़ता है. फाइबर है सबसे बड़ा कारण डॉक्टरों के अनुसार पूरे फल खाने का सबसे बड़ा फायदा उनमें मौजूद फाइबर है. फाइबर पाचन तंत्र के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व माना जाता है. फाइबर के मुख्य फायदे: पाचन प्रक्रिया को बेहतर बनाता है आंतों की गतिविधि को नियमित रखता है कब्ज की समस्या से बचाता है लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराता है जब फल का जूस बनाया जाता है तो उसमें मौजूद अधिकांश फाइबर अलग हो जाता है. जूस में सिर्फ मीठा तरल बचता है, जिसमें प्राकृतिक शुगर ज्यादा होती है लेकिन फाइबर बहुत कम होता है. जूस से क्यों बढ़ सकता है ब्लड शुगर हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि जूस पीने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है. 2013 में प्रकाशित एक रिसर्च, जो Harvard School of Public Health द्वारा की गई थी और BMJ जर्नल में प्रकाशित हुई, उसमें पाया गया कि रोजाना एक सर्विंग फ्रूट जूस पीने से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा लगभग 21% तक बढ़ सकता है. इसका मुख्य कारण जूस का उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स है. ग्लाइसेमिक इंडेक्स क्या करता है? ग्लाइसेमिक इंडेक्स यह बताता है कि कोई भोजन शरीर में कितनी तेजी से ब्लड शुगर को बढ़ाता है. जूस में फाइबर कम होता है इसलिए शुगर तेजी से खून में पहुंचती है इससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है कुछ समय बाद यह अचानक गिर भी सकता है ब्लड शुगर में इस तरह के उतार-चढ़ाव से लंबे समय में डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है. पूरे फल खाने से क्या फायदे मिलते हैं रिसर्च यह भी बताती है कि फलों के छिलके और गूदे में कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व होते हैं. उदाहरण के लिए: सेब के छिलके में फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट अधिक होते हैं नाशपाती के छिलके में विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं संतरे के गूदे में पाचन के लिए जरूरी तत्व होते हैं लेकिन जूस बनाते समय अक्सर छिलका और गूदा हटा दिया जाता है, जिससे कई पोषक तत्व कम हो जाते हैं. फल खाने से शरीर को मिलता है संतुलित पोषण पूरे फल खाने से शरीर को कई तरह के पोषक तत्व मिलते हैं, जैसे: विटामिन मिनरल फाइबर एंटीऑक्सीडेंट ये सभी तत्व मिलकर शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत बनाते हैं और कई बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं. वजन नियंत्रण में भी मददगार पूरे फल खाने का एक और बड़ा फायदा यह है कि यह वजन नियंत्रित रखने में मदद करता है. फाइबर की वजह से फल खाने के बाद लंबे समय तक भूख नहीं लगती. इससे ओवरईटिंग कम होती है और वजन बढ़ने का खतरा कम हो सकता है. इसके विपरीत जूस जल्दी पच जाता है और पेट जल्दी खाली महसूस होने लगता है, जिससे ज्यादा खाने की संभावना बढ़ जाती है. बच्चों और डायबिटीज मरीजों के लिए खास सलाह डॉक्टर विशेष रूप से बच्चों और डायबिटीज के मरीजों को जूस कम पीने की सलाह देते हैं. बच्चों में ज्यादा जूस पीने से मोटापा बढ़ सकता है डायबिटीज मरीजों में ब्लड शुगर अचानक बढ़ सकता है इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि जूस पीना हो तो सीमित मात्रा में और बेहतर है कि फल ही खाए जाएं. कब पी सकते हैं जूस? हालांकि जूस पूरी तरह नुकसानदायक नहीं है. कुछ परिस्थितियों में यह फायदेमंद भी हो सकता है. जैसे: बीमारी के दौरान जब ठोस भोजन खाना मुश्किल हो डिहाइड्रेशन की स्थिति में सीमित मात्रा में और बिना अतिरिक्त चीनी के लेकिन रोजाना जूस पीने के बजाय फल खाना ज्यादा बेहतर विकल्प माना जाता है.
Brain Fog Symptoms: 30 की उम्र में भूलने लगे हैं छोटी-छोटी बातें, कहीं आपके दिमाग पर 'ब्रेन फॉग' तो नहीं छा रहा? Can Stress Cause Brain Fog: उम्र का एक पड़ाव होता है, जिसमें इंसान चीजों को भूलने लगता है. हालांकि, 30 साल की उम्र में इस तरह की दिक्कत नहीं होती है. अगर आपको हो रही है, तो सावधान होने की जरूरत है. 30 की उम्र में भूलने की समस्या होने की वजह क्या? Why Do I Feel Mentally Slow In My 30s: तीस की उम्र में याददाश्त कम होना आम बात नहीं है. लेकिन कई लोग एक अलग तरह की परेशानी महसूस कर रहे हैं जैसे कि दिमाग में धुंध-सा छाया रहना, सोचने की रफ्तार धीमी पड़ जाना, मीटिंग में ध्यान न टिक पाना, या बात करते-करते साधारण शब्द भूल जाना. जो काम पहले आसानी से हो जाते थे, अब बोझ जैसे लगते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह किन कारणों के चलते हो रहा है और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है. क्यों होती है इस तरह की दिक्कत? न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि यह डिमेंशिया नहीं, बल्कि 'ब्रेन फॉग' है. इसमें मेंटल थकान, उलझन और एकाग्रता में कमी की दिक्कत का सामना करना पड़ता है. एक्सपर्ट के अनुसार, लगातार तनाव, नींद की कमी, पोषण की कमी, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और कुछ मामलों में कोविड के बाद की रिकवरी इसकी बड़ी वजहें हैं. यानी दिमाग जवाब नहीं दे रहा, वह संकेत दे रहा है कि उसे संभालने की जरूरत है. क्या यह कोई बीमारी है? ब्रेन फॉग कोई आधिकारिक बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का मेल है जिसमें मानसिक सुस्ती, छोटी-छोटी बातें भूलना, मल्टीटास्किंग में दिक्कत और दोपहर तक थकावट शामिल होती है. दिमाग शरीर की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा इस्तेमाल करता है. जब नींद अधूरी हो, तनाव ज्यादा हो या पोषण कम मिले, तो सबसे पहले सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है. ब्रेन बंद नहीं होता, बस लो पावर मोड में चला जाता है. क्यों होती है इस तरह की दिक्कत? तीस की उम्र बॉयोलॉजिकल रूप से मेंटल क्षमता का अच्छा दौर माना जाता है, लेकिन लाइफस्टाइल बदल चुकी है. काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, बच्चों की परवरिश, सोशल मीडिया की तुलना और लगातार डिजिटल एक्सपोजर तनाव बढ़ाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन बताते हैं कि लंबी कार्य अवधि और कम नींद ध्यान और वर्किंग मेमोरी को कमजोर करती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, एक तिहाई एडल्ट पर्याप्त नींद नहीं ले पाते, जबकि नींद के दौरान ही दिमाग खुद को रिपेयर करता है. आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? पोषक तत्वों की कमी भी अहम कारण हो सकती है. विटामिन B12, विटामिन D3 और आयरन की कमी से एकाग्रता और एनर्जी घटती है. इसके साथ में थकान, झुनझुनी, बाल झड़ना या पीली त्वचा जैसे संकेत मिलें तो ब्लड टेस्ट कराना जरूरी है. नींद, नियमित व्यायाम और पानी की पर्याप्त मात्रा, ये तीन चीजें अक्सर नजरअंदाज होती हैं. रोज 30 मिनट हल्का-फुल्का एक्सराइज ब्लड फ्लो बढ़ाता है और ध्यान सुधारता है. हल्का डिहाइड्रेशन भी फोकस बिगाड़ सकता है. संतुलित आहार और स्क्रीन से दूरी भी मददगार है. अगर भूलने की समस्या रोजमर्रा के काम या नौकरी को प्रभावित करे, या अचानक भ्रम, तेज सिरदर्द, बोलने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.
Wheat Side Effects: क्या रोज रोटी खाना आपकी सेहत के लिए ठीक है, जानें एक्सपर्ट का क्या है कहना? डाइट में सबसे खराब चीज अगर कोई है, तो वह गेहूं हो सकता है. ज्यादातर लोग मिठाइयां रोज नहीं खाते, कुछ तो बिल्कुल भी नहीं खाते. यहां तक कि चीनी का सेवन भी हर किसी के लिए समान रूप से समस्या नहीं बनता. रोटी लंबे समय से भारतीय खानपान का अहम हिस्सा रही है खासतौर पर उत्तर भारत में लोग इसको एक टाइम के भोजन में जरूर शामिल करते हैं. इसे हल्का, संतुलित और पचने में आसान माना जाता है. सादगी और परंपरा से जुड़ी यह डिश लोगों के लिए फेवरेट भी है. लेकिन क्या रोटी वाकई उतनी ही बेफिक्र होकर खाने लायक है, जितना हम मानते आए हैं?. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इसको लेकर एक्सपर्ट की क्या राय है. क्या कहते हैं एक्सपर्ट? गुरुग्राम, हरियाणा के ऑर्थोपेडिक और आर्थ्रोस्कोपी एक्सपर्च डॉ. मनु बोरा ने अपने साझा किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस पर अलग नजरिया रखा. उनका कहना है कि गेहूं का नियमित और अधिक मात्रा में सेवन, खासकर उन लोगों के लिए जो वजन और मेटाबॉलिक हेल्थ को लेकर सतर्क हैं, छिपे हुए जोखिम पैदा कर सकता है. डॉ. बोरा के अनुसार "डाइट में सबसे खराब चीज अगर कोई है, तो वह गेहूं हो सकता है. ज्यादातर लोग मिठाइयां रोज नहीं खाते, कुछ तो बिल्कुल भी नहीं खाते. यहां तक कि चीनी का सेवन भी हर किसी के लिए समान रूप से समस्या नहीं बनता. लेकिन जो लोग रोजमर्रा के भोजन में लगातार गेहूं लेते हैं, उनके लिए यह नुकसानदायक हो सकता है. पुराने समय में इंसान प्राकृतिक रूप से गेहूं का सेवन नहीं करते थे." क्यों सेहत के लिए फायदेमंद नही है? उनका तर्क यह है कि जिस चीज को हम सामान्य और सुरक्षित मानते हैं, वह भी अगर जरूरत से ज्यादा ली जाए तो शरीर पर असर डाल सकती है. खासकर आज के समय में जब गेहूं अक्सर प्रोसेस्ड या रिफाइंड रूप में इस्तेमाल होता है, तो उसके प्रभाव और भी बढ़ सकते हैं. डॉ. बोरा बताते हैं कि ज्यादा प्रोसेस्ड गेहूं से बने उत्पाद शरीर में सूजन, वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक गड़बड़ी जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे सकते हैं. जब इन्हें बड़ी मात्रा में और नियमित रूप से खाया जाता है, तो यह धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं. यही वजह है कि वे संतुलन और संयम पर जोर देते हैं. क्या रोटी नहीं खानी चाहिए? इसका मतलब यह नहीं कि रोटी पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए, बल्कि यह समझना जरूरी है कि मात्रा और गुणवत्ता दोनों मायने रखती हैं. साबुत अनाज का चयन, सीमित मात्रा में सेवन और संतुलित डाइट अपनाना ज्यादा समझदारी भरा कदम हो सकता है. उनके अनुसार, रोजमर्रा की थाली में शामिल खाद्य पदार्थ भी बिना सोचे-समझे खाने के बजाय समझदारी से चुने जाने चाहिए. हेल्दी डाइट सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप क्या खा रहे हैं, बल्कि इस पर भी कि कितना और किस रूप में खा रहे हैं.